Happy 5 th Birthday …

Thanks to my friend Pamir Harvey whose similar activity for his blog inspired me that I should also take care of my own blog, while I do other activity and contributions to other blogs.

So here is wishing my dear blog ‘SAMAJ SHILPI’ (‘the Social Architect’) a very very HAPPY BIRTHDAY today.

It was through a conscious thought process that the date ‘5 th June’ was selected to launch this lovely creative blog.
As today 5 th also happens to be the ‘World Environment day’ every year.

To bring ‘environmental awareness’ is one of the core objective of this blog.

On this occasion today I wish to thank my founding members’ friends Ashish Tilak, Bharat Bhatt and my younger daughter Ashwini for their constant support and encouragement to me.
While Ashwini has also been the major contributor for her posts since she was studying in Std VII th, and to some extent could not devote much time due to her board exams since last year. (Though in between she contribute some posts)
As her exams are over I hope her posts would be coming regularly now.

Back to ‘Samajshilpi’,
He will continue to fight for the ‘right’ and to bring ‘positive change’ in the society.

Many things happen regularly around us that shake up our conscience and the current socio-political scenario had posed many serious threats for all the human beings who love peace and believe in ‘live and let live’. Crime against women and children are continuing as if there is no fear of ‘law’ for those who commit these crimes and carry on anti social activities. Corruption has damaged the total social fabric and everything seems to be ‘fixed’ in favor of the ‘wrong’.

“We continue to tolerate the ‘wrong’ at the cost of the ‘right’, (that is what my favorite writer/poet Gulzar saab express recently speaking on the occasion of the release of the 3 rd edition of his ‘dyodhi’. )

Samajshilpi, is closely watching them all, observing them & feeling them all. He do feel ‘sad’ and ‘helpless’ at times, but then the hope for the ‘positive change’ keeps him ‘optimistic’ and motivates to carry his role further ….

Wishing all readers and well wishers of this blog very happy ‘Environment day’ today, I leave all of your with the following thought provoking ‘tweet’ shared recently by my another good friend Raja Swaminathan –

“The day people respect facts more than opinion, we will become a more objective society, and the media could help by leading”

‘घोटालों’ का ‘नव-युग’ आया . . .

मन में उमड़ रहा
‘घोटालों’ का ‘गुबार’ हैं
आओ यारों गाएं हम
खुशी के गीत
झूमे गाकर अपना राग,
अपनी लय, अपनी ताल,
और अपना संगीत,

देश भी अपना
माल भी अपना
अपनी ही सरकार
अरे मौज उडाओं यारों
किस चीज़ कि है दरकार,

‘म न रे गा ‘ तू भ्रष्टाचार के गीत,
‘छेड़’ घपलों कि ‘तान’ तू
कभी होना न विचलित
‘शहरीकरण’ के इस दौर में,
क्यों रहे ‘स्वास्थ्य’ भी ‘ग्रामीण’
लूट तरंगे ‘टू-जी’ की तू
और बन जा ‘रंगीन’

काला रंग क्यों तुझे
अरे नहीं हैं भाता,
‘काला’ ‘कोयला’ ही तो हैं
सुख-समृद्धि लाता,
हैरान हैं ‘पशु-प्राणी’ बेचारे
क्यों ‘चारा’ खा गए ‘नेता’

‘खेल’ निराले, ‘ढंग’ निराले,
हैं ‘गेहूं-चावल’ में भी ‘घोटालें’

‘अंतरिक्ष’ और ‘देव-आवास’ (या अन्त्रिक्स-देवास?)
में भी हमारे ही चर्चें हैं
हमारी ‘कामन-वेल्थ’ पे तो
‘कुबेर’ भंडारी कि भी नज़रें हैं,
‘आदर्श’ हमारे घोटालें हैं
या ‘घोटालों के हम ‘आदर्श’ हैं ?
?
इस ‘प्रश्न-चिन्ह’ के साथ आपको
छोडना नहीं चाहते,
पर चाहकर भी ‘इतनी जल्दी’
किसी ‘कन्क्लूजन’ पे,
हम पहुंचना नहीं चाहते,

हेलिकॉप्टर आया
हेलिकॉप्टर आया
ऊंची उड़ान वाला
हेलिकॉप्टर आया

‘नोट’ बरसाया,
धुल उडाया,
‘कमीशन’ कि ‘खुशबू’ फैलाया
सात समंदर पार लहराया,
नव-वर्ष कि शुभ-शकुनी बेला पर
देख यह नव-प्रभात आया
‘घोटालों’ का ‘नव-युग’ आया !
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प्रजा से अभी भी कोसों दूर – ‘सत्ता’,‘तंत्र’ !

देश आज ६४ वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. इन ६४ सालों में निश्चित तौर पर हमने प्रगति की है. विकास हुआ हैं. लेकिन साथ ही साथ हमने ‘मूल्यों’ को खो भी दिया हैं. इनका जतन करने कि बात तो दूर, दिन ब दिन होते उनके पतन को रोकने तक कि कोशिश करना भी हमने छोड़ दिया. हमारी सभ्यता, हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति, हमारे आदर्श, हमारे विचार, हमारे उद्देश्य सब हमें चिढ़ा रहे हैं.
क्योंकि हमने चाहे विकास किया हो, चाहे हमने तकनीकीकरण और वैज्ञानिक क्षेत्र में नयी उपलब्धियां हासिल की हो, हमारी गिनती भी विश्व के चुनिन्दा विकासशील राष्ट्रों में होती हो – पर हम अभी भी बुनियादी विकास से बहोत दूर है. हमने ‘मतदाता’ भी निर्माण करने में ‘विकास’ किया है, पर ‘अच्छे नागरिकों’ का निर्माण और ‘चरित्र-निर्माण’ से एक अच्छे ‘राष्ट्र’ का निर्माण अभी बाकी हैं. नीति-मूल्यों के विकास कि बात करना भी अब जरुरी हो गया है.

उदारीकरण, बाजारीकरण और वैश्वीकरण में तो हम आगे बढते दिखाई देतें हों, पर ‘आम’ आदमी से, जनता के सरोकार से हम बहोत दूर होते जा रहे हैं. कुछ मुट्ठी भर लोग जिनके हाथ में सत्ता हैं, या जो जन-प्रतिनिधि हैं, उनके सगे सम्बन्धी, उनके चाटुकार मित्र, उनके चेले चपाटे और जिन्हें सत्ता ने अपने रुतबे से खरीद लिया हैं बस उन्ही लोगों का राज चल रहा है, और सत्ता और पैसे के बल पर ये चुनिन्दा लोग ही अपनी अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं.

एक तरफ हम चाँद पर, मंगल पर खोज करने कि बात करते है. एक तरफ विकास के बड़े बड़े वायदे करते है. वहीँ दूसरी तरफ अभी भी ‘पीने’ के पानी कि समस्या, ‘बिजली’ कि कमी, गरीबी, भुखमरी, आवास-निवास, और पक्की सड़कों का न होना जैसी समस्याएँ मौजूद हैं. पिडीतोंको सालों साल तक न्याय नही मिलता. इन समस्याओंके अलावा देश में हर रोज हो रहे अपराध हमें सोचने पर मजबूर करतें हैं कि आखिर जिस धरती पर ऐसे महान धर्म एक साथ पलें, जिन्होंने इंसान को, इंसानियत को सबके ऊपर तरजीह दी, आज उसी धरती पर बेलगाम जुल्म ज़ारी है, महिलाओं और बच्चों, बुजुर्गों के खिलाफ ‘इंसानियत’ को शर्मसार करनेवाले अपराध ज़ारी है. हमें अपने आप पर घिन्न आने लगे इस हद तक या उससे ज्यादा हम अपनी नज़रों में गिर गए हैं. फिर भी हम जिंदा हैं. फिर भी हम बर्दाश्त करतें हैं.
क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाए, कुछ भी होता रहे हम ‘बर्दाश्त’ जरुर करतें है. हमारी ‘नपुंसकता’ को हमने अपनी ‘सहिष्णुता’ के नाम पर ढांक लिया हैं. इसीलिए कुल मिलाकर एक ‘अनुशासनहिन्’ समाज, एक ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था और एक ‘लोला पोला’ सरकार हमारे प्रतिक रूप बन गए हैं.
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश होगा जहाँ पर एक ‘शरीफ’, कायदा-कानून माननेवाले, उनका पालन करनेवाले, सच्चाई कि राह पर चलने वाले और ईमानदार लोगों के लिए , ऐसे नागरिकों के लिए, जीना उतना ही कठिन, और मुश्किलों भरा हैं जितना आसान वह गुंडे, बदमाश, दबंग, भ्रष्टाचारी, अपराधियों और आतंकवादियों के लिए है. अपराधी यहाँ छाती ठोक के अपराध करते हैं और आज़ाद घूमते हैं , निरपराध मारे जाते है, निर्दोष कि बलि दी जाती हैं. हर नये अपराध के साथ अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं क्योंकि ‘नपुंसक’ ‘व्यवस्था’ उसकी शरण में चली जाती है और कानून के ढीले ढाले पेंच उसके बचने कि राहें आसान करती हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा , जिसका पडोसी मुल्क छाती ठोक के उसके सैनिकों के सर कलम करता हैं और साथ ले जाता हैं, फिर सद्भावना के नाम पर ‘लज़ीज़’ पकवानों का ‘मजा’ लेने उसीके घर चला आता हैं. और हमें अपने सैनिकों कि जान से ज्यादा दुश्मन से ‘क्रिकेट’ खेलने में ज्यादा रस आता है, और ‘संबंधों को लचीला’ करने कि पहल के नाम पर खेल में ‘हार’ कि रूपरेखा को भी हम पहले से तैयार कर लेतें हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा जहां ‘शहीदों’ को उचित समान नही मिलता , यहाँ तक कि उनके परिवार वालों को आवंटित ‘पेट्रोल-पम्प’ तक दबंग कब्ज़ा कर लेतें हैं या उनमे भ्रष्टाचारी अपना हाथ साफ़ कर लेतें हैं.
देश में हालात इतने खराब हैं कि जिसकी जहां मर्ज़ी होती है वो वहीँ ‘बलात्कार’ कर देता है. इसको आप ‘बलात्कार’ के शब्दार्थ के रूप में लेंगे तो जल्द समझ पायेंगे.
गुंडई, दबंगई, हैवानियत इस कदर बढ़ गयी है कि अब संसद जैसी ‘पवित्र’ जगह पर भी लोग ‘बल’ का प्रयोग करतें हैं, जैसा कि पिछले दिनों समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने ‘आरक्षण’ बिल फाड़ने में किया. अब तो सत्ता में बैठें कुछ लोगों ने ‘आम’ जनता के साथ मानसिक ‘बलात्कार’ करना शुरू कर दिया है.
जैसा कि ‘अन्ना-आंदोलन’ और ‘दामिनी’ बलात्कार केस के सिलसिले में आये विवादास्पद बयानों से जाहिर होता है.
एक बहोत ही संगीन मामले को ‘ढुलमुल’ रवैयेसे कमज़ोर बनाकर ‘इंसानी’ ज़ज्बातों का गला घोटने कि सोची समझी साजिश के तहत ही ये सब होता है. ताकि थक हार कर जनता ‘सत्ता’ के सामने शरणागत बन जाए, उसके सामने झुक जाए और दोबारा फिर ऐसी घटना घटे तो भी वो ‘आयी-गयी’ बात बन के रह जाए.
‘शुभ संकेत’ के रूप में तस्सली देनेवाली बात इतनी हैं कि पिछले दो वर्षों में जो जनाक्रोश दिखाई दिया, जो जागरूकता लोगों में आयी हैं वो आनेवाले समय में भी बरक़रार रहे तो अच्छा वरना हमारी आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी, और हम जो गर्व महसूस करते थे कि ‘मैंने इस देश में जनम लिया’ उस बात पर कहीं हमें शर्मिंदा ना होना पड़े. इसके लिए अभी भी एक बड़े आंदोलन कि जरुरत हैं, जो ‘ज्वालामुखी’ बन कर मौजूदा व्यवस्था पर फूट पड़े, और हमारे ‘महामहिम’ ने जो कहा हैं कि ‘पिछले ६० वर्षों’ में जो बदलाव नहीं आया वो अगले ‘दस सालों’ में होगा उसे सही साबित करें !
हमें और हमारे वतन को अपने अंदर फिर से झाँकने कि जरुरत हैं …
अंत में फिर साहिर कि इन पंक्तियों के साथ आज कि बात यहीं खत्म करता हूँ …

“अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन, अपने ऐबों को मत ढांक मेरे वतन’ … (संपूर्ण गीत के इये इस कड़ी पर अवश्य जाएँ ..

http://atulsongaday.me/2012/01/22/apne-andar-zaraa-jhaank-mere-watan/

अब कोई गुलशन न उजड़े . . .

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पर दुनिया कायम हैं, हर परिस्थिति में इंसान को ‘आशावादी’ होना चाहिए. ‘अच्छा’ होने कि उम्मीद करनी चाहिए. इसीलिए नव वर्ष का या पहला लेख इसी उम्मीद और आशा के साथ कि ‘देश’ बदलें और हमारी ‘सोच’ भी.
‘बुराई’ का नाश हो, ‘अच्छाई’ आगे बढे, ‘सत्य’ कि ‘विजय’ हो और ‘अत्याचारियों’ को सज़ा मिले.

वैसे खुशी कि बात ये है कि देश के नागरिकों में जागरूकता आयी है. पिछले दो साल से जिस तरह के ‘धरना’, प्रदर्शन’, ‘आंदोलन’ और ‘व्यवस्था (सिस्टम)’ के खिलाफ आवाजें उठी है वो एक अच्छा संकेत माना जा सकता है.
हमारे देश में घट रही घटनाओं से हम सभी आहत हैं, व्यथित हैं, और ये सब चीजें खास कर कलम के हर सिपाही को भी बहोत ज्यादा आहत करती हैं और मजबूर करती है कि हम अपनी संवेदनाएं कलम के माध्यम से व्यक्त करें.
इसी कड़ी में जब दिल्ली में पिछले दिनों हुयी बलात्कार कि घटना और देश में बे-लगाम ज़ारी इस तरह कि घटनाओं को पढकर, उन बिखरे हुए परिवार वालों के बारें में सोचकर और उनके ऊपर क्या बीत रही होगी यह सोचकर मन में यही ख्याल आता रहा कि आज़ादी के ६५ साल बाद भी आम आदमी न्याय से मेहरूम है.
कहीं तो यह ‘अत्याचार’ का ‘जुल्म’ का सिलसिला रुके, कुछ तो अच्छा हो, …
अनायास ही मुझे साहिर कि लिखी ये पंक्तियाँ याद आयी कि ‘अब कोई गुलशन ना उजड़े , अब वतन आज़ाद है’, एक बहुत ही सुन्दर गीत, जिसका संगीत जयदेव जी ने तैयार किया था और ये १९६३ बनी फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का है, जिसमे मुख्य भूमिका में सुनील दत्त और वहीदा रहमान थे.
साहिर लुधियानवी जी सही मायनों में एक सच्चे ‘मानवतावादी’, सच्चे ‘धर्मनिरपेक्ष’ और एक ‘सच्चे इंसान’ थे. अपने गीतों में उन्होंने हमेशा इंसान को एक ‘प्यार मोहब्बत’ के अलावा सभी धर्मों का आदर एवं इंसानियत के प्रति सद्भाव रखने का सन्देश दिया. हर अन्याय, अत्याचार के खिलाफ साहिर ने आवाज़ उठाई. साहिर चूंकि अपनी माँ से बहोत प्यार करते थे और अपनी माँ कि तकलीफों को उन्होंने भली भांति देखा समझा था, उन्होंने नारी जीवन पर – उनके जीवन संघर्ष पर बहुत ही सटीक गीत भी लिखे हैं, जो हम सभी जानते हैं.
आज जिस गीत कि बात हो रही है, वो करीब ५० साल पहले लिखा गया था और जिन सपनों को पूरा करने कि इसमें बात कही गयी हैं, उसमे हम कितना सफल हुए हैं इस पर गौर कर, जो सपने अभी अधूरे हैं उन्हें पूरा करने कि जरुरत हैं, और उसके लिए सबको मिल कर प्रयास कर, संगठित होकर लड़ने कि भी जरुरत है,
मैं चाहूँगा कि पाठक इस गीत को बार बार सुने, उसमे लिखे गए शब्दों के जज्बातों को समझे और सब मिलकर इसका प्रयास करें कि देश में रचनात्मक बदलाव हो.
(इस गीत के लिए एक ‘कड़ी’ निचे दी गयी है, जहां पर पाठक इस गीत के बारें में हमारे मित्र श्री.राजा द्वारा लिखा गया लेख भी पढ़ सकते है )

http://atulsongaday.me/2010/08/15/ab-koi-gulshan-na-ujde-ab-watan-aazaad-hai/

आज पूज्य स्वामी विवेकानंद जी कि जयंती मनाई जा रही है. इसी सिलसिले में हमारे मित्र श्री.आशीष द्वारा भेजे गए ‘समस’ (SMS) को पेश कर, अगले लेख में मिलने कि तैयारी करतें हैं;
“We are what our thoughts have made us; so take care about what you think. Words are secondary. Thoughts live; they travel far “– Swami Vivekananda

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देखो ये मेरे ‘बंधे हाथ’ …..

दिल्ली कि मुख्यमंत्री माननीय श्रीमती शीला दीक्षित जी ने एक ‘टीवी’ इंटरव्यू दिल्ली कि बिगड़ती कानून व्यवस्था को ठीक न कर पाने के कारणों का ब्यौरा जब दिया, और अपनी जो लाचारी, मजबूरी उन्होंने जाहिर कि तो मेरे जैसे ‘आम आदमी’ (नहीं उस पार्टी से मेरा कोई लेना देना नहीं है .. वैसे ‘आम आदमी’ पार्टी ने आंदोलन में शरीक होकर एक अच्छा संकेत दिया है) के मन में कई सवाल उठे.
और एक बात तो समझ में आयी कि शीला दीक्षित जी का ‘इंटरव्यू’ इस बलात्कार कि दुर्घटना का दुःख जताने से ज्यादा अगले साल दिल्ली में होनेवाले चुनाव के मद्देनज़र, बिगड़ती कानून व्यवस्था को सँभालने में अपनी नाकामयाबी को ढकने के प्रयास कि शुरुवात भर लग रहा है.
जरा सोचें के खुद मुख्यमंत्री कह रही है कि ‘मैं पिछले ग्यारह साल से इस बात का प्रयास कर रही हूँ के दिल्ली पुलिस हमारे अधीन कर दी जाए, लेकिन ये हो नहीं पाया’, ग्यारह साल (२००४ से पकडें तो आठ साल) एक मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी कि सरकार से- केंद्र सरकार- से एक महत्वपूर्ण और जरुरी काम नहीं करवा पायी, जिससे कि राज्य कि कानून व्यवस्था को वे सुधार पाती या फिर उनके कहे मुताबिक़ ऐसी घटनाएं न होने देती.

और इस टीवी इंटरव्यू में उन्होंने शब्द भी ऐसे चुने जिससे कि आम आदमी कि दुखती रग पर हाथ डाला सके. जैसे कि ‘ मेरे हाथ तो बंधे हुए है…’
सोचो के अगर एक मुख्यमंत्री के हाथ अगर इतने बंधे हुए है तो आम आदमी कि क्या औकात है.
और इस आम आदमी को अपने हाथ किस हद तक खोलने कि जरुरत है . क्योंकि अभी जब आम आदमी ने अपना आक्रोश-विरोध जताया तब कहीं जाकर इन्होने ये कहने कि जहमत उठायी के ‘मेरे हाथ तो बंधे हुए है’. नहीं तो, ये तो बस इस वक्त को भी किसी तरह लीपापोती कर गुज़ार ही देते.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हैं कि , जब हम निम्न से निम्न स्तर के कर्मचारी से भी या अफसर से भी ‘अग्रसक्रियता’ (pro-activeness) कि उम्मीद करते हैं, जवाबदेही कि बातें करतें हैं, निरंतर सुधार कि बातें करतें है, उसके कार्य प्रदर्शन, कार्यक्षमता से उसकी तनख्वाह को जोड़ते है, तो क्या इन लोगों के लिए ऐसे नहीं करना चाहिए?, एक आम आदमी आज कि तनावभरी जिंदगी में दो जून कि रोटी के लिए जी-जान से मेहनत करता है, अपनी तरक्की के लिए अपनी कार्यक्षमता बढाने से लेकर अपने प्रदर्शन में सुधार करते रहता है, इस सब के लिए अपने मालिक कि या अपने अफसर कि बातें, उसका गुस्सा बर्दाश्त करता है, तो इतने ऊंचे ओहदे पर बैठे हुए इंसान से क्या यही उम्मीद रखी जाए कि उसे पता होने के बावजूद पिछले ग्यारह साल से इतने गंभीर मसले को हल नहीं करवा पाया.
जनता इस बात को सोचें इन ग्यारह सालों में कितने गुनाह हुए, कितने बलात्कार हुए, कितने बच्चे गायब हुए, कितने बुज़ुर्ग लोग क़त्ल कर दिए गए, बाकी चोरी चकारी, लूट-पाट और क्या क्या नहीं हुआ?

शीला मैडम का ये इंटरव्यू तो बस सहानुभूति बटोर कर २०१३ के दिल्ली चुनाव कि तयारी करने का प्रयास था. नहीं तो आज तक दिल्ली में दरिंदगी कि कितनी घटनाएं हुई , तब उन्होंने कहाँ कोई इंटरव्यू दिया. ये मजबूरी है जनाब के एक साल के बाद चुनाव सर पर होंगे.
और उनके इंटरव्यू के बाद उनके बेटे संदीप दीक्षित जी भी बचाव में कूद पड़ें, तो समझ लीजिए के वे विरासत सँभालने कि तैयारी में लग गए हैं.
दिल्ली में बलात्कार विरोधी आन्दोंलन में जब कुछ असामाजिक तत्व कि उपस्थिति पायी गयी तो यह भी सोचना चाहिए कि इसमें किसी राजनीतिक दल का ‘हाथ’ तो नहीं?

क्योंकि जब भी एक बड़ा आंदोलन खडा होता है तो सरकार को बेचैनी होती है. यही स्थिति अन्ना के और रामदेव जी के आंदोलन के समय भी देखी गयी. क्योंकि सामाजिक समस्याओंके के लिए लोग इक्कठे हो यह राजनीतिक दल बर्दाश्त नहीं कर पातें हैं. क्योंकि वो अच्छी तरह जानते हैं जहां लोगों में एकता आयी वहाँ उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.
हाँ, शीला मैडम के राज में बच्चों, महिलाओं , बुजुर्गों, विद्यार्थियों पर जो लाठीचार्ज हुआ उसका क्या?
और, ध्यान बटाने के लिए वो खुद ही इतनी मांगे कर रही है, तो फिर इन समस्याओं को सुलझायेगा कौन? और अगर वे नहीं सुलझा सकती तो इतने साल से मुख्यमंत्री बने रहने का क्या मतलब है?

(एक हमारे प्रधानमंत्री है जो कभी ‘डीपली डिसअप्पोइंटेड’ होते है तो कभी ‘डीपली सैड’ होते है, आपको भी ऐसा ही महसूस हो और जवाब न सूझे, तो आप भी १९७३ कि अमिताभ कि फिल्म ‘बंधे हाथ’ का किशोर का गाया गीत ‘देखो ये मेरे बंधे हाथ ..’ सुनकर या गाकर अपनी मजबूरी को बहला सकते हैं).

शिंदे साहब, शीला मैडम ! सोनिया जी कि चिट्ठी मिली क्या?

मित्रों, पिछले दिनों दिल्ली में हुई बलात्कार कि घटना के संदर्भ में जब सोनिया जी ने, कांग्रेस अध्यक्षा के नाते, अपनी ही पार्टी के केंद्रीय गृह मंत्री और एक राज्य – दिल्ली – कि मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी तो मेरे मन में स्वाभाविक रूप से कुछ विचार आये जो आपके समक्ष रखता हूँ. इसमें कोई दुर्भावना नहीं है, भावना यही है कि ‘बलात्कार’ जैसे अपराधिक मामलों में कडा कानून बने और उनका निपटारा – आरोपियों को सज़ा दिलवाना – जल्द से जल्द हो.

‘चिट्ठी’ इस शब्द से मुझे बचपन से ही बहोत आकर्षण रहा है, और आज भी जब कभी मैं अपने कार्यालय से या बाहर से घर बात करता हूँ, तो ये जरूर पूछता हूँ के ‘आज कोई डाक आयी क्या?’.

लेकिन जब सोनिया जी ने एक गंभीर घटना को लेकर चिट्ठी लिखी तो, सबसे पहले तो ये विचार आया के आज के ‘समस’, ईमेल, मोबाइल या ‘ब्लैक-बेरी’ के ज़माने मे उन्होंने चिट्ठी क्यों लिखी. वैसे पिछले कई सालों से कई मामलों में वे चिट्ठियाँ लिखती आ रही हैं, अब सवाल ये है कि आजतक उन्होंने जो भी चिट्ठियाँ लिखी वो सामनेवाले को मिली क्या? अगर मिली, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? , क्योंकि जिसको चिट्ठी लिखी जाती है वो कभी बताता नहीं कि ‘हाँ, मुझे मैडम जी कि चिट्ठी प्राप्त हुई , और मैंने इस पर ये कदम उठाया या मैंने ये अमुक अमुक चीजें कि जो कि समस्या का समाधान करेंगी, या फिर समस्या को कम करेंगी, या फिर समस्या से छुटकारा दिलाएगी!’
अगर कारवाई हुई है तो ये हमारे लिए सौभाग्य कि बात है, और नहीं हुई तो कहीं ऐसा न हो कि आज तक उन्होंने कितनी चिट्ठियाँ लिखी और उन चिट्ठियों का क्या क्या हुआ , इसकी भी जानकारी कहीं हमें ‘आर टी आई’ से ना लेनी पड़े?
आशा है कांग्रेस वाले अपनी पार्टी अध्यक्षा कि ‘चिट्ठी/या चिट्ठियों’ पर जल्द से जल्द कुछ ‘फीडबैक’ भारतीय जनता को देंगे और जनता को अपने (इन चिट्ठियों से सम्बंधित) किये गए कार्यों कि जानकारी देंगे.

वैसे इस सब माहौल में आशा कि किरण यही है कि अब जनता जागरूक हो गयी है और अपना विरोध दर्ज करने लगी है, वरना तो कई ऐसे मामले है जहां हर रोज इज्ज़त तार तार होती है और आम इंसान कीड़े मकौडों कि तरह मसला जाता है.

( अरे ….‘आरुशी हत्याकांड’ मामला सुलझ गया क्या?…., और वो जो बच्चों के नर कंकाल मिले थे उसमे किसी को सज़ा हुई क्या?, मुंबई में एक लड़की को बचाने में एक युवक कि जान गयी , उसमे गिरफ्तार लोगों को सज़ा होगी क्या?, पंजाब में एक पिता ने अपनी बेटी को बचाने में अपनी जान गंवाई वहाँ अपराधियों को सज़ा होगी क्या, उत्तर प्रदेश में लड़की को ज़िंदा जलाया था – दोषियों को सज़ा हुई क्या?, लड़कियों पर तेज़ाब फेंकने वाली कितनी घटनाओं में अपराधियों को सज़ा हुई?
…. सॉरी ! मैंने उन सभी जगह चिट्ठी (?) नहीं भेजी है ! )