टक टकी …

क्यों हमसे इस कदर रूठा है तू भला,
और फेर ली है हमसे निगाहें अपनी,
क्या नहीं है परवाह तुझे उन मासूमों की भी,
जिन्होंने अभी अभी होश संभाला है,
और वे जिन्हें, तेरे होने पर –
तुझसे भी ज्यादा ‘यकीन’ है,

माना कि, की है बेवफाई हमने,
तेरे उसूलों से, और,
भटक गए हैं तेरी बताई हुई राह से हम,
फेर लिया है मुंह कुछ इस तरह से हमने ,
कि ‘जानकर’ बन गए है ’अनजान’
अपने ‘अंजाम’ से हम,

पर हम बेबसों कि तू सुनता रहा है सदा,
लगाये बैठे हैं टक टकी तेरी ओर,
हे परवर दिगार तुम दयालु ‘सरकार’
तेरा ही चलता रहा हुक्म हर बार,
तेरे बस में हैं सब भंडार
सूखी,बंजर,बिखरती ज़मीन को
तेरे ‘रहमो-करम’ का है इंतज़ार

‘आबोहवा’ बदल गयी हैं ! ( The ‘Climate’ is ‘changing’ )

आसमान के सीने को चीरता हुआ
यह धुंआ उसके फेफड़ों को तड़पा रहा हैं
दम इंसान का घुट रहा हैं
हमारी बढती बेचैनी और
घबराहट कि वजह यही तो नहीं

धरती कि धमनियों मे
मिला दिया किसने
प्रदूषित जल ये
उसकी रक्त शिराओं से
अब विष के झरने फुट रहे

फिजां कि बाहों में
अनगिनत जहरीलें ‘वायु’
आज घुल रहे
के हवा भी ‘रंग बदलने’ लगी हैं

ऋतू चक्र को किसकी नज़र लग गयी
मौसम भी इंसानों कि तरह हो गया हैं
बारिश में अब ‘बरसात’ नहीं होती
और ‘गर्मी’ के दिन
‘आये दिन’ होते हैं

‘कलंकित’ सारा परिमंडल हैं
शोर चारों तरफ हैं
‘विकास’ कि ‘जद्दोजेहद’ में
‘जिंदगी’ दांव पर हैं
‘मशीनी जिंदगी’ में
‘इंसानी’ ‘कल-पुर्जे’ हैं
‘जिंदा’ लाशों के ‘जंगल’ में
अब ‘कुदरत ‘ भी ‘दम ‘ तोड़ रही हैं
देख के ‘इंसान’ कि ‘फितरत’ को
अब ‘मौसम’ बदल रहा हैं
‘मौसम’ अब ‘बदल’ गया है
और
‘आबोहवा’ बदल गयी हैं