जन गण मन !!!

आज प्रधानमंत्री ने किसानों से अपने मन कि बात कही. विशेष कर उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून सम्बन्धी कुछ ‘भ्रम’(जो चर्चा में है) दूर करने कि कोशिश कि और किसानों से आग्रह किया कि वे उन पर विश्वास करें और इस कानून का समर्थन करें.
ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री जी ने केवल यही बात की. उन्होंने हाल ही में हुयी बे-मौसमी बारिश और ओला वृष्टि से हुयी फसल कि बर्बादी को लेकर भी चिंता जताई एवं अपने सम्बंधित मंत्रीयों से इस बारे में कही गयी कारवाई का भी हवाला दिया.
लेकिन, कुछ प्रमुख टीवी समाचार चैनलों पर जिस तरह कि चर्चाएं इस ‘मन कि बात’ को लेकर हुयी और उसमे जो किसानों कि प्रतिक्रियाएं आयी, उससे साफ़ हो गया कि इस ‘मन कि बात’ को लेकर लोगों में और विशेष कर किसानों में निराशा का माहौल बना दिया.
या तो प्रधानमंत्री को सबसे पहले अभी जो फसल कि बर्बादी हुयी है और इससे जो किसानों का नुकसान हुआ है उस पर ज्यादा जोर देना चाहिए था या उनको आश्वस्त करना चाहिए था इस मामले में भी युद्धस्तर पर कदम उठाये जायेंगे. मगर ऐसा होता नहीं है.
क्यों?
क्योंकि या तो प्रधानमंत्री तक ज़मीनी हालात कि सही जानकारी उनके सम्बंधित मंत्री और पार्टी के लोग पहुंचाते नहीं है और न ही राज्य स्तर पर उनकी पार्टी के मुख्य मंत्री, अन्य मंत्री,सांसद, विधायक और नेता कोई ऐसे कदम उठाते है जिससे लोगों को लगे कि उनकी बात ज़रूर सुनी जायेगी. और जब ऐसा नहीं होता है तो प्रधानमंत्री कितना भी कहे कि ‘आप मुझ पर विश्वास कीजिये’, लेकिन बात बनती नहीं है.
ये बात भी सही है कि लोकसभा चुनाओं में तमाम जनता ने अकेले उनकी ही बात पर उनकी पार्टी को प्रचंड बहुमत से जिताया, मगर इसके बाद एक एक कर जो जनता के साथ छलावा हो रहा है उससे लोगों का विश्वास अब डगमगा गया है.
ये भी सही है कि प्रधानमंत्री लाख चाहे तो भी हर काम वे अकेले नहीं कर सकते. और उनकी तमाम योजनाएं तभी सफल हो सकती है जब खुद उनके मंत्री, सांसद, विधायक और कार्यकर्ता उतनी ही गंभीरता और संजीदगी से हर काम को अंजाम दे और ज़मीनी समस्याओं को समझ कर सरकार और लोगों के बीच एक सकारात्मक ‘सेतु’ का काम करे.
सरकार को कई मुद्दों पर नए तरीके अपनाने होंगे और समय समय पर जो मुद्दे उभर के आते है जो कि जन-मानस से जुड़े हुए होते है, ऐसे मामलों में सरकार को एक नयी पहल कर युद्ध-स्तर पर निर्णय लेने चाहिए और जनता के बीच ‘विश्वास’ का सन्देश पहुँचाना चाहिए.
जैसे कि बलात्कार, देश कि सीमा पर हमला, आतंकवादी हमला, कोई बड़ी दुर्घटना और सबसे महत्वपूर्ण कोई प्राकृतिक आपदा जैसे मामलों में युद्धस्तर पर करवाई करनी होगी. ऐसे मामलों में और विशेष कर जहां किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहें हो, उनके ऊपर क़र्ज़ बढ़ रहा हो और फसलें बर्बाद हो रही हो वहाँ तो आपको हर हाल में युद्धस्तर पर करवाई कर लोगों का हौसला बढ़ाना होगा और उनकी समस्याओं को दूर करना होगा.
लेकिन आज तक कोई भी सरकार न ऐसा करते आयी है न करना चाहती है. लेकिन ‘बदलाव’ कि जिस हवा का हवाला देकर यह सरकार बनी है उसे आज के ‘सोशल मिडिया’ वाले दौर में लोगों कि भावनाओं को समझ कर, हवा का रुख देख कर, राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर उचित कदम उठाने होंगे ही और यह सब जल्दी भी करना होगा.
‘रिपोर्ट आएगी तब देखेंगे’ वाला रवैया बदलना होगा !!
यह बात भी सही है कि लोगों को अपनी बात कहने का मौका भी प्रधानमंत्री जी ने ही दिया है. आजतक किसी प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन कि बात’ इतनी बार लोगों से कि नहीं है.
लेकिन जब आप कुछ अच्छा करना चाहते है तो उसे संपूर्ण समर्पण से करना होगा और लोगों के ताने भी झेलने पड़ेंगे. अगर इस चर्चा को और ‘संवादात्मक’ बनाया जाता तो अच्छा होता. या किसानों को ही उनके द्वारा नियुक्त किये गए ‘प्रतिनिधि मंडल’ को इस चर्चा में शामिल किया जाता तो अच्छा होता.

आज कल ज्यादातर टीवी चैनल पर जो चर्चा होती है उसमे मुख्य ‘मुद्दों’ को भुलाकर आपसी विवाद कि स्थिति पैदा हो जाती और हर पार्टी के प्रवक्ता अपनी बात और काम को सही ठहराने में लगे रहते है, इससे सच कहीं बातों में उलझ कर रह जाता है और राजनीती असल मुद्दों को खा जाती है. तो फिर ‘सच’ और ‘झूठ’ का फैसला कौन करे. और जनता कि भलाई चाहनेवाला पक्ष कौनसा है यह कौन तय करेगा.
या तो फिर ‘मिडिया’ को ही कड़े शब्दों में सच जनता के सामने रखना चाहिए, और मुद्दों को ‘गोल-गोल’ बातों में और ‘आंकड़ों’ के जाल में उलझाकर न रखते हुए, वास्तविकता को जनता के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए.
और सरकार को भी ये ध्यान में रखना चाहिए कि देश के न.१ चैनल पर अगर जनता से ये आवाज़ आती है कि ‘प्रधानमंत्री’ झूठ बोलते है और झूठ ही बोलते रहे है तो फिर कहीं न कहीं ये असंतोष भविष्य के ‘चुनावों’ में सामने आएगा ही.

Jan Gan Mangal Daayak Yaan _ जन गण मंगल दायक यान

(Sharing herewith my thoughts on India’s successful Mars Orbit Mission (MOM) on 24.09.2014)

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान
अमंगल हरता मंगल यान
जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान

जग को दिया शून्य का ज्ञान
धन्य है भारत का विज्ञान
पूर्वजों का है वरदान
अंतरिक्ष कि दूरी आसान
मंगल कक्षा में मंगल यान
मंगल बेला में किया प्रयाण
जय जय जय हो मंगल यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

जय जवान और जय किसान
जय जय जय जय जय विज्ञान
अंतरिक्ष में ली है उड़ान
लहराया है तिरंगा महान
लाल ग्रह पर अपने निशान
मंगल भुवन है मंगल यान

पुरुषार्थ का इनको है मान
अपने देश कि है ये शान
बढ़ाया भारत का सम्मान
कर्तव्य पूर्ति का है अभिमान
जन जन जिनका ऋणी हैं
ऐसे वैज्ञानिक महान
जन जन का ये स्वाभिमान

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

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Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan
‘Amangal’ hartaa mangal yaan
Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan

Jag ko diya shoonya ka gyaan
Dhanya hai Bharat ka vigyaan
Purvajon ka hai vardaan
Antariksh ki doori aasaan
Mangal kaksha mein Mangal yaan
Mangal bela mein kiya prayaan
Jai jai jai ho Mangal yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan

Jai jawaan aur jai kisaan
Jai jai jai jai jai vigyaan
Antariksh mein lee hai udaan
Lehraaya hai tirangaa mahaan
Laal grah par apne nishaan
Mangal bhuwan hai Mangal yaan

Purushaarth ka inko hai maan
Apne desh ki ye hai shaan
Badhaaya Bharat ka sammaan
Kartavya purti ka hai abhimaan
Jan jan jink wruni hain
Aise vaigyanik mahaan
Jan jan ka ye swaabhimaan

मंथन जारी हैं …

एक महीने का समय गुज़र गया . . . . .

कहने का तात्पर्य यह है कि इस ‘ब्लॉग’ पर पिछला लेख ठीक एक महीने पहले १४ अगस्त को प्रकाशित हुआ था.
ऐसा नहीं है कि इस महीने भर में कोई घटना ऐसी नहीं हुयी जिसने ‘समाज-शिल्पी’ को नहीं छुआ हो या ‘आहत’ न किया हो.
और जिस ब्लॉग का उद्देश्य ही समाज कि ‘नव-रचना’ करने में योगदान देना हो, उसे तो हर रोज ही अपने आस-पास कि घटनाओं के बारे में या जिन मुद्दों ने उसे छुआ हो उसके बारे में टिपण्णी ज़रूर करनी चाहिए.
लेकिन कभी कभी लेखन प्रक्रिया में ऐसे पड़ाव आते हैं जब एक रचना से दूसरी रचना के बीच में कुछ अंतर आ जाता है.
अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल कर प्रकाशित नहीं कर पाने का दुःख तो है ही, मगर जो अच्छी-बुरी घटनाएं इस दौर में हुयी, उसने ‘विचारों’ कि प्रक्रिया को जारी रखा और ‘मंथन’ करने पर समय समय पर मजबूर किया.
इस लेख में हम मुख्य रूप से उन् सभी घटनाओंका जिक्र करेंगे, और आनेवाले लेखों में उन्ही मुद्दों का तार पकड़कर विस्तार से चर्चा करेंगे और नए मुद्दों को भी छुएंगे.

सबसे पहले तो बात हमारी बढती ‘संवेदनहीनता’ कि. दिल्ली में फिर हमारे गिरते मानवीय मूल्य और समाज में ‘गहरी पैठ’ बना चुकी ‘नपुंसकता’ का उदाहरण देखने को मिला जहां एक जख्मी को बीच बाजार में लोगों ने पानी नहीं पिलाया और उस इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘बलात्कार’ कि घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी और ‘गुंडे-बदमाश’ लगभग हर राज्य में ‘कानून’ कि धज्जियां उड़ाते फिर रहे है.
कुल मिलाकर नयी सरकार को अभी तक तो ‘क़ानून का राज्य’ स्थापित करने में उतनी सफलता नहीं मिली हैं जितनी उम्मीदें जनता को ‘सत्ता परिवर्तन’ के होने बाद इस नयी सरकार से थी.
‘क़ानून व्यवस्था’ के मामले तो लगता है कि जैसे अभी भी ‘युपीए’ का ही शासन चल रहा है.
और तो और जिन अपराधियों कों फांसी कि सज़ा दी जाती है पता नहीं क्यों उनकी फांसी कों बार बार मुल्तवी किया जाता है?

जहाँ प्रधानमंत्री के विदेश दौरों ने हमारे देश कि गरिमा बढ़ाई और यह सन्देश भी जाते दिखा कि हमारा देश भी दूसरे देश से ‘आँख से आँख’ मिलाकर ही चलेगा.
प्रधानमंत्री के जापान दौरे के समय जब ‘स्मार्ट सिटी’ कि बात चली तो नयी आशाएँ जगी, लेकिन जिस रस्ते पर मैं हर रोज सफर करता हूँ उस ‘एन एच – ८ ए एक्सटेंशन’ और एस एच -४६ पर हर रोज बीच सड़क पर बैठा ‘मवेशियों’ का ‘झुंड’ इस बात कि याद दिलाता रहता है कि अभी तो ‘मंजिल’ दूर ही नहीं बहुत बहुत दूर है.
अभी तो राज्य परिवहन कि बस में सफर करते समय जब चालक कों अपनी गाडी बीच सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण ‘आडी-तिरछी’ करनी पड़ती है तो लगता है कि देश कि स्थिति भी ऐसी ही है, कहीं बहुत ज्यादा विकास हैं तो कहीं कुछ भी नहीं. और विकास अगर हुआ भी हैं तो उसका समतोल बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ रखा नहीं गया.
तभी तो वड़ोदरा जैसे शहर में लग-भग हर साल बाढ़ आती है और रिहायशी इलाकों में पानी भर जाता है.
सबसे दुखद त्रासदी ‘जम्मू-कश्मीर’ में आयी बाढ़ है, जहाँ का हाल समाचारों में देख-सुनकर कलेजा मुंह कों आता है.
इस त्रासदी से जहाँ हमारी ‘आपदा प्रबंधन प्रणाली’ कि खामियां सामने आयी, वहीँ ‘विकास’ कि दौड में प्रदुषण के खतरे और उसके दुष्परिणामों कों भांपने में हमारी नाकामयाबी का भी पता चलता है.
हर चीज़ पर ‘बाजारीकरण’ के बढते प्रभाव और पैसे कमाने कि होड में भागती दुनिया का सच हमारे सामने आता है.
विकास कि चकाचौंध में हम मानवीय मूल्य और इंसानी जिंदगी के साथ ही सौदा कर बैठे है. और हम लोगों कि जिंदगी इसीलिए हर समय ‘दांव’ पर है.
वर्षों से चली आ रही हमारी सोच के ‘अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘सरकार से हमें क्या लेना देना’, ‘सब चलता है’ ने ही हमें आज इस मकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ ‘प्रशासन’ हमारा ‘अपना’ नहीं बन सका और हम ‘जनता’ प्रशासन के लिए केवल वोट देनेवाली मशीन बन कर रह गए.
जम्मू-कश्मीर कि बाढ़ के कुछ समाचारों में हाल ही में कुछ व्यक्ति प्रधानमंत्री श्री.मोदी जी कों कोसते हुए दिखाए गए. क्या यह सही है?
भाई, इतने सालों से जिन लोगो ने तुम्हारे ऊपर ‘राज’ किया है, कुछ उनसे भी तो पूछो. मोदी जी कों आये तो अभी तीन महीने ही हुए है. फिर भी उन्होंने वो किया जो दस सालों में तुम्हारी चुनी हुई सरकार नहीं कर पायी.
और तो और जब घाटी में सारे नियम क़ानून ताक पर रखकर अंधाधुन्द निर्माण हुआ तब आप क्यों तमाशा देखते रहे? आपने क्यों नहीं मुलभुत सुविधाओं के निर्माण के लिए अपने आवाज़ बुलंद कि?
हाँ, एक बात ज़रूर सरकार कों (चुनाव आयोग से सिफारिश कर ) करनी चाहिए थी कि ‘उप-चुनावोंको’ कुछ समय बाद कराया जाता तो अच्छा होता.
इस बीच देश के कई हिस्सों में बदलते ‘मौसम’ का मिजाज़ पता चला और ‘पर्यावरण’ में होते बदलावों का भी एहसास हुआ. कहीं भयंकर गर्मी रही, तो कहीं बाढ़ और कहीं एकदम सूखा.
इससे हम को सबक लेकर अभी से चेतने कि जरूरत हैं.
और जो मैं इससे पहले भी कहता आया हूँ कि ‘हमारे बाप का कुछ गया हो या नहीं’ मगर ‘हमारे बच्चों का और आनेवाली पीढ़ियों’ का बहुत कुछ ‘दांव’ पर है…

इस दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि पहले तो हम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंटे हुए थे, मगर आज ‘ट्विटर’ का भारत अलग है, ‘फेसबुक’ का भारत अलग है, अंग्रेजी और हिंदी समाचार पत्र पढ़ने वालों का अपना भारत है. ‘व्हाट्स-एप’ का भारत इन सबका मिश्रण है और टीवी चेनलों कि प्राथमिकताएं ‘टीआरपी’ और अलग अलग ‘ब्रांडों’ के प्रायोजक है, या फिर ‘क्रिकेट’ है.
‘क्रिकेटरों’ कों हमारे देश में इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि उनके सामने देश पर मर मिटनेवाले शहीदों कों भी इतना सम्मान नहीं दिया जाता.
अपने आप कों ‘न.१’ कहने का दावा करनेवाले समाचार चेनल पर तो क्रिकेट के लिए विशेष समय (आधा घंटा) दिया जाता है. जब देश इतनी समस्याओं से घिरा हो तो क्रिकेट कि बात तो होनी भी नहीं चाहिए, या फिर सभी खेलों कों उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए. क्रिकेट कि हार जीत पर भी न तो ज्यादा हंगामा होना चाहिए और न ही ज्यादा उत्तेजना होनी चाहिए. क्योंकि हर क्रिकेट खेलनेवाले देश का फ़र्ज़ है कि जीत ने के लिए खेलना और खेल का अविभाज्य अंग है ‘हार’ या ‘जीत’ इसीलिए न तो क्रिकेट में एक हार पर दुनिया भर का गम लूटाने कि ज़रूरत है और न ही जीत पर क्रिकेट के खिलाड़ियों कों ज़रूरत से ज्यादा सर पर उठाने कि ज़रूरत है.

और सबसे सुखद रहा दस दिनों तक चला ‘गणेशोत्सव’, ‘बाप्पा’ आते हैं तो अपने साथ कई यादें भी लेकर आते हैं. ‘गणेश उत्सव’ कि वो यादें जो मेरे बचपन से जुडी है. हो सकता है कि आनेवाले दिनों में मैं अपना पहला ‘मराठी’ लेख (जो कि १९८० के बाद आएगा) ‘गणपति-बाप्पा’ कि यादों के साथ ही लिखूं.