Zindagi

Har pal ek nayaa mod hain zindagi
Har Subah ki ek nayi kiran hain zindagi
Samundar mein behti lehron ki tarah
Behti huyee ek lehar hain zindagi

Deti hain kayee jakhm ye
Aur unhi jakhmon ko sina sikhaati hain
Tute huye rishte, bikhre huye palon ke saath
Unhe samet kar aage badhna sikhaati hain

Har pyaari muskaan mein basi hain zindagi
Har nazar ke liye alag hoti hain zindagi
Haath se fisalti ret ki tarah
Mehsoos hoti wo ret hain zindagi

Har pal ek nayaa mod hain zindagi
Har subah ki ek nayi kiran hain zindagi
______________________________

जिंदगी

हर पल एक नया मोड हैं जिंदगी
हर सुबह कि एक नयी किरण हैं जिंदगी
समंदर में बहती लहरों कि तरह
बहती हुयी एक लहर हैं जिंदगी

देती हैं कई जख्म ये
और उन्ही जख्मों को सीना सिखाती है
टूटे हुए रिश्ते,
बिखरे हुए पलों के साथ,
उन्हें समेट कर आगे बढ़ना सिखाती हैं

हर प्यारी मुस्कान में बसी हैं जिंदगी
हर नज़र के लिए अलग होती हैं जिंदगी
हाथ से फिसलती रेत कि तरह
महसूस होती वो रेत हैं जिंदगी
हर पल एक नया मोड हैं जिंदगी
हर सुबह कि एक नयी किरण हैं जिंदगी

हर दिन – होली हैं

प्रकृति के रंग अनेक
इंसानों के ढंग अनेक

सुख दुःख की होती
यहाँ आँख मिचौली हैं

जीवन के रंग मंच पर
तो भाई,
हर दिन – “होली हैं”

यहाँ जान की कोई ‘वेल्यु’ नहीं है

‘ कुछ लोग जो ज्यादा जानते है, इंसान को कम पहचानते है, ये पूरब है पूरबवाले हर जान कि कीमत जानते है – हर जान कि कीमत जानते है … (फिल्म – जिस देश में गंगा बहती है) एक मशहूर फ़िल्मी गीत कि यह कुछ पंक्तियाँ है . . . . . . . . . . . . . . . . . पर अब,

‘यहाँ जान की कोई ‘वेल्यु’ नहीं है’, यह शब्द दिल्ली की जूता फैक्ट्री में लगी आग में आजसे करीब सवा एक साल पहले मरनेवाले एक शख्स की पत्नी के है, जो आज तक मेरे कानों में गूँज रहें है, और जहाँ तक मैं समझता हूँ के, यह बात हर आम हिन्दुस्तानी के मन को कचोटती होगी और सोचने पर मजबूर करती होगी के आखिर ‘जिंदगी’ के प्रति हम इतने उदासीन, इतने निरुत्साही, इतने नीरस, और इतने लापरवाह क्यों है?, क्यों हम आखिर ‘जिंदगी’ का मोल नहीं समझ पा रहे है, और इसका सदुपयोग नहीं कर पा रहे है?, या इसे यूंही खत्म करने पर आमादा है.
यह बात मैं इसलिए रख रहा हूँ के जिंदगी गँवाने के या प्राणों को खो देने के कारणों को आप देखे तो समझ पाएंगे के हम भारतीय किन किन कारणों के लिए अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देते है या किसी कि जान भी ले लेते हैं. इनमे हम वाहनों कि दुर्घटनाओं को नहीं गिन रहे हैं, हालांके लापरवाही वहाँ भी होती है और कभी किसी एक कि लापरवाही कि वजह से दूसरों कि जान पर बन आती है.

अभी तक मैं जिन कारणों को संकलित कर पाया हूँ उनकी सूची कुछ इस प्रकार से है;
क्रिकेट जैसे खेल के मामूली झगडे को लेकर किसी कि जान ले लेना,
बोरेवेल में गिरकर छोटे छोटे बच्चों का जान गंवाना तो अब एक आम बात हो चली है,
खुले मेन-होल हो नालें या सीवर लाइन का मैन होल कवर खुला होना उसमे गिरकर बह जाना,
किसी कार्य के लिए रास्ते पर खुदा हुआ गढ्ढा जो कि खुला रह गया हो, भी मौत का कारण बन चूका है, तालाब में नहाने गए बच्चों कि मौत, हाल ही में कच्छ के मांडवी के समुद्रतट पर पानी में बह जाने से ६ लोग जिनमे युवा थे वह मौत का शिकार हो गए. सोचो कितने घरों के आशाओं के दीप बुझ गए?

इसी तरह शिवकासी में पटाखे बनानेवाली फैक्ट्री में हुए विस्फोट में कई जाने गयी. पश्चिम बंगाल में बांकुरा में बारिश के पानी से लबालब पूल को पार करते हुए एक बस के पानी में बह जाने से भी कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

रेल कि छतों पर बैठकर सफर करना , या समय समय पर लगते ‘मेलों’ या धार्मिक कारणों के लिए निर्धारित संख्या से ज्यादा लोगों का रेल या बस में सफर करते समय दुर्घटना का शिकार बनना ,
मोबाइल के हेड फोन लगाकर रेलवे लाइन पार करते समय रेल के निचे कट जाना, या फिर कभी वैसे ही रेल कि पटरी पार करते हुए जान गंवाना, मानव रहित रेलवे क्रोस्सिंग पर स्कूल बस का गुज़रना,
लोकल ट्रेन के ऊपर बैठकर जाते समय बिजली के तार मेन उलझकर मर जाना, या फिर लोकल ट्रेन कि भीड़ में ट्रेन से गिरकर मौत, चलती ट्रेन से यात्री को फ़ेंक देना,
कभी कार के अंदर कैद होकर दम घुटकर मर जाना,ट्रेन में सीट के निचे बच्चे का दबकर मर जाना,
स्कूल बस कि खिडकी से बाहर झांकते हुए बच्चे का सर खम्भे से टकराकर जान गंवाना,
विवाह समारोह के दौरान की जानेवाली फायरिंग या फिर चुनाव के जुलुस हो या चुनाव जीतने की खुशी के जुलुस में होनेवाली फायरिंग में जान गंवाना,
टोल टैक्स की पर्ची फाड़ने से लेकर हुई बहस में किसी कि जान ले लेना (सोचो के सवाल कितने पैसे का होता है और उसका मुआवजा क्या देना पड़ता है)
पिछले दिनों में सीवर मे १०० रूपए निकलने गए ४ लोगों ने अपनी जान गंवायी – क्या इसका मतलब है एक आदमी कि जान कि कीमत २५ रुपये?
मंदिरों में होनेवाली भगदड़ में जान गंवाना, (इस विषय पर तो एक एक पूरा लेख अलग से लिखना पड़ेगा क्योंकि इस प्रकार कि घटनाओं में जो इजाफा हुआ है वह हमारी लापरवाही और बद-इन्तजामी कि दास्तान खुद ब खुद बयां करती हैं).
इसके बाद इलाज के बिना मरनेवाले, भूख के कारण मरनेवाले!

जिंदगी का मोल हम क्यों नहीं समझते हैं ये सोचनेवाली बात है, क्या इसका कारण हमारी बहोत ज्यादा आबादी है?

पानी कि टंकी में गिरने से मौत, इमारत ढहने से हुई मौतें (इमारतों के जर्जर होने या खतरे कि सुचना के बावजूद उसमे निवास करना और फिर दुर्घटना का शिकार होना ),
खड़ी हुई गाडी के पीछे सो जाना और फिर ड्राईवर का उसी गाडी को बैक करना और उसी गाडी के क्लीनर कि अपनी ही गाडी के निचे मौत हो जाना.
मंत्रालय में लगी आग में जान गंवाना….
क्या हमारी जान इतनी सस्ती है कि किसी भी प्रकार से गंवाने में हमें कोई हिचक नहीं होती?

प्रधान मंत्री का काफिला निकलने के दौरान लगाये प्रतिबंधों के कारण किसी शख्स को इलाज कि सुविधा से वंचित होकर या अस्पताल तक पहुंचना मुश्किल होने कि वजह से हुई मौत,
रेलवे स्टेशन पर नेता कि स्वागत में जुटी हुई भीड़ द्वारा कि गयी फायरिंग के दौरान किसी निर्दोष के जान गंवाने या ऐसी ही घटना में किसी बच्चे कि जान जाने कि भी घटनाएं हमारे देश में हो चुकी है,
रास्ते से जाते हुए जुलुस के दौरान पुलिस और जुलुस में शामिल हुए लोगों कि बीच हुई फायरिंग के कारण किसी अनजान निर्दोष कि जान चली जाती है,

लापरवाही से होनेवाली ना जाने कितनी मौतें!
सड़क पर तडपते हुए हमारी आँखों के सामने आदमी दम तोड़ देता है लेकिन उसे बचाने के लिए हम कुछ भी नहीं करते. आखिर क्यों? क्या हम इतने संवेदना हिन् हो गए है?
और भी कई ऐसे कारण हो सकते है कि जब हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हो कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? एक बेशकीमती जान हमें क्यों गंवानी पड़ी? क्योंकि एक बार जाने के बाद तो किसीको वापिस लाया नहीं जा सकता, फिर जो लोग अपने करीबियों को खो देते है उन पर क्या गुज़रती होगी?
और सोचें कि बिना कारण गँवाई गयी यही बहुमूल्य जिंदगी चाहे तो कुछ भी कर सकती, यही मानव उर्जा अगर हम सकारात्मक कार्यों या मानवता मे लगा पाते तो ? या मानवता के हित में इसका इस्तेमाल किया जाता तो? तो जरुर समाज का, देश का, और इस मानवजाति का कुछ तो भला होता ही… या इससे भी अच्छा होता कि यह जाने देश सेवा के लिए देश पर न्योछावर हो जाती!

आप कहेंगे कि यह सब तो होगा ही, होनी को कौन टाल सकता है? , सही बात है, जो चीज़ें होनी है या जिनपर हमारा बस नहीं चलता उसमे तो तो हम कुछ नहीं कर सकते. पर जहाँ अगर थोड़ी सतर्कता बरतने से या सावधानी से या फिर संवेदनशीलता से अगर मनुष्य जान हानि होने से बचायी जाए तो उसका प्रयास हमें करना चाहिए….

(This special article written for ‘Yuvadastak’.com has been published on 29.09.2012 at ‘Yuvadastak’.com and link is http://yuvadastak.com/new/?p=6064 , interested readers can visit this blog also to have more reading about contemporary issues).