सपनों का भारत !!!

सपनों का भारत हमारे
कैसा हो
कैसा हो
चारों तरफ खुशहाली हो
और लहराता तिरंगा हो !!

सपने जो सब देखे थे
वीर अमर शहीदों ने
भगत, बापू,सुभाष ने
और सारे भारतवासियों ने
पूरा कर उन सपनों कों
अपना फ़र्ज़ निभाना हो !! १ !!

बदलाव जो देश में आया है
मौका सुनहरा लाया है
जोश फिजाओं में नया है
मौका नहीं ये गंवाना हाँ
सबक पुरानी गलतियों से लेकर
एक नया भारत बनाना हो !! २ !!

भेद-भाव, लूट-पाट,
जात-पात,
जोर-ज़बरदस्ती और
फिरकापरस्ती कों,
पहचान लो गद्दारों कों
मिटा कर इन दुश्मनों कों
अत्याचारों को न सहना अब
नया सवेरा लाना हो !! ३ !!

सपनों का भारत हमारे
अब ऐसा ही हो के
चारों तरफ खुशहाली हो
और लहराता तिरंगा हो !!

 

Jan Gan Mangal Daayak Yaan _ जन गण मंगल दायक यान

(Sharing herewith my thoughts on India’s successful Mars Orbit Mission (MOM) on 24.09.2014)

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान
अमंगल हरता मंगल यान
जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान

जग को दिया शून्य का ज्ञान
धन्य है भारत का विज्ञान
पूर्वजों का है वरदान
अंतरिक्ष कि दूरी आसान
मंगल कक्षा में मंगल यान
मंगल बेला में किया प्रयाण
जय जय जय हो मंगल यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

जय जवान और जय किसान
जय जय जय जय जय विज्ञान
अंतरिक्ष में ली है उड़ान
लहराया है तिरंगा महान
लाल ग्रह पर अपने निशान
मंगल भुवन है मंगल यान

पुरुषार्थ का इनको है मान
अपने देश कि है ये शान
बढ़ाया भारत का सम्मान
कर्तव्य पूर्ति का है अभिमान
जन जन जिनका ऋणी हैं
ऐसे वैज्ञानिक महान
जन जन का ये स्वाभिमान

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

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Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan
‘Amangal’ hartaa mangal yaan
Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan

Jag ko diya shoonya ka gyaan
Dhanya hai Bharat ka vigyaan
Purvajon ka hai vardaan
Antariksh ki doori aasaan
Mangal kaksha mein Mangal yaan
Mangal bela mein kiya prayaan
Jai jai jai ho Mangal yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan

Jai jawaan aur jai kisaan
Jai jai jai jai jai vigyaan
Antariksh mein lee hai udaan
Lehraaya hai tirangaa mahaan
Laal grah par apne nishaan
Mangal bhuwan hai Mangal yaan

Purushaarth ka inko hai maan
Apne desh ki ye hai shaan
Badhaaya Bharat ka sammaan
Kartavya purti ka hai abhimaan
Jan jan jink wruni hain
Aise vaigyanik mahaan
Jan jan ka ye swaabhimaan

मंथन जारी हैं …

एक महीने का समय गुज़र गया . . . . .

कहने का तात्पर्य यह है कि इस ‘ब्लॉग’ पर पिछला लेख ठीक एक महीने पहले १४ अगस्त को प्रकाशित हुआ था.
ऐसा नहीं है कि इस महीने भर में कोई घटना ऐसी नहीं हुयी जिसने ‘समाज-शिल्पी’ को नहीं छुआ हो या ‘आहत’ न किया हो.
और जिस ब्लॉग का उद्देश्य ही समाज कि ‘नव-रचना’ करने में योगदान देना हो, उसे तो हर रोज ही अपने आस-पास कि घटनाओं के बारे में या जिन मुद्दों ने उसे छुआ हो उसके बारे में टिपण्णी ज़रूर करनी चाहिए.
लेकिन कभी कभी लेखन प्रक्रिया में ऐसे पड़ाव आते हैं जब एक रचना से दूसरी रचना के बीच में कुछ अंतर आ जाता है.
अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल कर प्रकाशित नहीं कर पाने का दुःख तो है ही, मगर जो अच्छी-बुरी घटनाएं इस दौर में हुयी, उसने ‘विचारों’ कि प्रक्रिया को जारी रखा और ‘मंथन’ करने पर समय समय पर मजबूर किया.
इस लेख में हम मुख्य रूप से उन् सभी घटनाओंका जिक्र करेंगे, और आनेवाले लेखों में उन्ही मुद्दों का तार पकड़कर विस्तार से चर्चा करेंगे और नए मुद्दों को भी छुएंगे.

सबसे पहले तो बात हमारी बढती ‘संवेदनहीनता’ कि. दिल्ली में फिर हमारे गिरते मानवीय मूल्य और समाज में ‘गहरी पैठ’ बना चुकी ‘नपुंसकता’ का उदाहरण देखने को मिला जहां एक जख्मी को बीच बाजार में लोगों ने पानी नहीं पिलाया और उस इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘बलात्कार’ कि घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी और ‘गुंडे-बदमाश’ लगभग हर राज्य में ‘कानून’ कि धज्जियां उड़ाते फिर रहे है.
कुल मिलाकर नयी सरकार को अभी तक तो ‘क़ानून का राज्य’ स्थापित करने में उतनी सफलता नहीं मिली हैं जितनी उम्मीदें जनता को ‘सत्ता परिवर्तन’ के होने बाद इस नयी सरकार से थी.
‘क़ानून व्यवस्था’ के मामले तो लगता है कि जैसे अभी भी ‘युपीए’ का ही शासन चल रहा है.
और तो और जिन अपराधियों कों फांसी कि सज़ा दी जाती है पता नहीं क्यों उनकी फांसी कों बार बार मुल्तवी किया जाता है?

जहाँ प्रधानमंत्री के विदेश दौरों ने हमारे देश कि गरिमा बढ़ाई और यह सन्देश भी जाते दिखा कि हमारा देश भी दूसरे देश से ‘आँख से आँख’ मिलाकर ही चलेगा.
प्रधानमंत्री के जापान दौरे के समय जब ‘स्मार्ट सिटी’ कि बात चली तो नयी आशाएँ जगी, लेकिन जिस रस्ते पर मैं हर रोज सफर करता हूँ उस ‘एन एच – ८ ए एक्सटेंशन’ और एस एच -४६ पर हर रोज बीच सड़क पर बैठा ‘मवेशियों’ का ‘झुंड’ इस बात कि याद दिलाता रहता है कि अभी तो ‘मंजिल’ दूर ही नहीं बहुत बहुत दूर है.
अभी तो राज्य परिवहन कि बस में सफर करते समय जब चालक कों अपनी गाडी बीच सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण ‘आडी-तिरछी’ करनी पड़ती है तो लगता है कि देश कि स्थिति भी ऐसी ही है, कहीं बहुत ज्यादा विकास हैं तो कहीं कुछ भी नहीं. और विकास अगर हुआ भी हैं तो उसका समतोल बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ रखा नहीं गया.
तभी तो वड़ोदरा जैसे शहर में लग-भग हर साल बाढ़ आती है और रिहायशी इलाकों में पानी भर जाता है.
सबसे दुखद त्रासदी ‘जम्मू-कश्मीर’ में आयी बाढ़ है, जहाँ का हाल समाचारों में देख-सुनकर कलेजा मुंह कों आता है.
इस त्रासदी से जहाँ हमारी ‘आपदा प्रबंधन प्रणाली’ कि खामियां सामने आयी, वहीँ ‘विकास’ कि दौड में प्रदुषण के खतरे और उसके दुष्परिणामों कों भांपने में हमारी नाकामयाबी का भी पता चलता है.
हर चीज़ पर ‘बाजारीकरण’ के बढते प्रभाव और पैसे कमाने कि होड में भागती दुनिया का सच हमारे सामने आता है.
विकास कि चकाचौंध में हम मानवीय मूल्य और इंसानी जिंदगी के साथ ही सौदा कर बैठे है. और हम लोगों कि जिंदगी इसीलिए हर समय ‘दांव’ पर है.
वर्षों से चली आ रही हमारी सोच के ‘अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘सरकार से हमें क्या लेना देना’, ‘सब चलता है’ ने ही हमें आज इस मकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ ‘प्रशासन’ हमारा ‘अपना’ नहीं बन सका और हम ‘जनता’ प्रशासन के लिए केवल वोट देनेवाली मशीन बन कर रह गए.
जम्मू-कश्मीर कि बाढ़ के कुछ समाचारों में हाल ही में कुछ व्यक्ति प्रधानमंत्री श्री.मोदी जी कों कोसते हुए दिखाए गए. क्या यह सही है?
भाई, इतने सालों से जिन लोगो ने तुम्हारे ऊपर ‘राज’ किया है, कुछ उनसे भी तो पूछो. मोदी जी कों आये तो अभी तीन महीने ही हुए है. फिर भी उन्होंने वो किया जो दस सालों में तुम्हारी चुनी हुई सरकार नहीं कर पायी.
और तो और जब घाटी में सारे नियम क़ानून ताक पर रखकर अंधाधुन्द निर्माण हुआ तब आप क्यों तमाशा देखते रहे? आपने क्यों नहीं मुलभुत सुविधाओं के निर्माण के लिए अपने आवाज़ बुलंद कि?
हाँ, एक बात ज़रूर सरकार कों (चुनाव आयोग से सिफारिश कर ) करनी चाहिए थी कि ‘उप-चुनावोंको’ कुछ समय बाद कराया जाता तो अच्छा होता.
इस बीच देश के कई हिस्सों में बदलते ‘मौसम’ का मिजाज़ पता चला और ‘पर्यावरण’ में होते बदलावों का भी एहसास हुआ. कहीं भयंकर गर्मी रही, तो कहीं बाढ़ और कहीं एकदम सूखा.
इससे हम को सबक लेकर अभी से चेतने कि जरूरत हैं.
और जो मैं इससे पहले भी कहता आया हूँ कि ‘हमारे बाप का कुछ गया हो या नहीं’ मगर ‘हमारे बच्चों का और आनेवाली पीढ़ियों’ का बहुत कुछ ‘दांव’ पर है…

इस दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि पहले तो हम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंटे हुए थे, मगर आज ‘ट्विटर’ का भारत अलग है, ‘फेसबुक’ का भारत अलग है, अंग्रेजी और हिंदी समाचार पत्र पढ़ने वालों का अपना भारत है. ‘व्हाट्स-एप’ का भारत इन सबका मिश्रण है और टीवी चेनलों कि प्राथमिकताएं ‘टीआरपी’ और अलग अलग ‘ब्रांडों’ के प्रायोजक है, या फिर ‘क्रिकेट’ है.
‘क्रिकेटरों’ कों हमारे देश में इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि उनके सामने देश पर मर मिटनेवाले शहीदों कों भी इतना सम्मान नहीं दिया जाता.
अपने आप कों ‘न.१’ कहने का दावा करनेवाले समाचार चेनल पर तो क्रिकेट के लिए विशेष समय (आधा घंटा) दिया जाता है. जब देश इतनी समस्याओं से घिरा हो तो क्रिकेट कि बात तो होनी भी नहीं चाहिए, या फिर सभी खेलों कों उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए. क्रिकेट कि हार जीत पर भी न तो ज्यादा हंगामा होना चाहिए और न ही ज्यादा उत्तेजना होनी चाहिए. क्योंकि हर क्रिकेट खेलनेवाले देश का फ़र्ज़ है कि जीत ने के लिए खेलना और खेल का अविभाज्य अंग है ‘हार’ या ‘जीत’ इसीलिए न तो क्रिकेट में एक हार पर दुनिया भर का गम लूटाने कि ज़रूरत है और न ही जीत पर क्रिकेट के खिलाड़ियों कों ज़रूरत से ज्यादा सर पर उठाने कि ज़रूरत है.

और सबसे सुखद रहा दस दिनों तक चला ‘गणेशोत्सव’, ‘बाप्पा’ आते हैं तो अपने साथ कई यादें भी लेकर आते हैं. ‘गणेश उत्सव’ कि वो यादें जो मेरे बचपन से जुडी है. हो सकता है कि आनेवाले दिनों में मैं अपना पहला ‘मराठी’ लेख (जो कि १९८० के बाद आएगा) ‘गणपति-बाप्पा’ कि यादों के साथ ही लिखूं.

हम राष्ट्र के ‘नव-निर्माण’ का संकल्प लें !!!

६८ वें स्वतंत्रता दिवस कि पूर्व संध्या पर देश में रहनेवाले एवं विदेश में रहनेवाले सभी भारतवासियों कों हार्दिक शुभकामनाएं !!

कल हम लोग १५ अगस्त का पावन पर्व – अपना ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मनायेंगें.

आज जो हम खुली फिजां में सांस ले रहे हैं तो जिस बलिदान के कारण हमें यह आज़ादी नसीब हुई हैं, उसे हमें नहीं भूलना चाहिए.
देश कों स्वतंत्र करने के लिए जिन लोगों ने अपना सर्वस्व त्याग दिया, उनके सपनों कों पूरा करके हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजली दे कर अपना कर्तव्य निभा सकते हैं.
देश के इन अमर शहीदों को आज हम याद कर उन्हें नमन करते हैं और उन्हें शत शत नमन करतें हैं !

लेकिन आज हमारे देश की जो हालत हैं उसे देख के इन शहीदों की आत्माओंको जरूर ठेस पहूँचती होगी.
चारों तरफ फैली अराजकता,हर क्षेत्र में फैले भ्रष्ट्राचार, माताओं, बहनों, बच्चों और बूढों पर हो रहे अत्याचार, धर्म और जाती के नाम पर दंगे, अपनी संस्कृति –विरासत कों भूलते लोग, समाज में बढती संवेदनहीनता,राजनीति में जारी ‘नपुंसकता’, शहीदों के नाम पर राजनीति करते ‘स्वार्थी’ तत्व, शहीदों के परिवार वालों का ‘अपमान’ सहता समाज, इत्यादि देखकर वे अत्यंत दुखी होते होंगे.
उनकी आत्मा बेहद शर्मसार भी होती होगी कि लोग स्वतंत्रता के मूल्य कों भूल गए हैं.

हमारी आज कि राजनीति इतनी नपुंसक हो गयी है कि ‘दलगत राजनीति’ से ऊपर उठकर कोई भी पक्ष देश कि आत्मा कों ‘एकात्म’ करना, देश कों एकजुट करना, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य कों जागृत करना जैसे कार्यों कों न तो खुद करतें हैं और न ही ऐसी चीज़ों कों बढ़ावा देतें हैं.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश को आज़ाद करने के लिए स्वतंत्रता सेनानियोंने, शहीदों ने किन किन मुसीबतों का सामना किया एवं क्या क्या यातनाएं सहन की. चाहते तो वो भी आसान राह चुन सकते थे. सोचो कि  वह क्या कर सकते थे ; सुभाष चंद्र बोस, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव,खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजो से माफ़ी मांगकर आराम कि जिंदगी बसर कर सकते थे, उन्हें भी हक था शादी कर अपना घर बसाने का. उनके पास भी माँ-बाप-भाई-बहन सभी तो थे – एक खुशहाल जीवन बिताने के लिए.
देश स्वतंत्र होने के बाद वे बड़ी राजनितिक हस्ती भी बन सकते थें.
स्वतंत्रता संग्राम में अपने कार्यों की बार बार दुहाई देकर राजनितिक कार्यों में हस्तक्षेप कर अपनी मन मानी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मुश्किल राह चुनी और अपने कर्तव्य को अंजाम दिया.
और याद कीजिये ऐसे अनगिनत देशभक्त जिनका हम नाम भी भूल गए या जिनके बलिदान के बारे में कभी किसी कों पता भी नहीं चला – वो अनाम – वो गुमनाम शहीद – न जाने कितने? ….

अब सोचो हमने क्या किया एवं क्या कर रहे हैं; जगह जगह इन महान नेताओं और शहीदों की मूर्तियां स्थापित कर फिर उन्हें दुर्लक्षित कर दिया.
मूर्तियों के साथ साथ दफना दिया उनके आदर्शों को और भूल गए उनके महान बलिदान को भी.
उनके विचार, उनके उद्देश्य उनकी कार्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा इन सभी को तिलांजलि देकर हम धन्य हो गए.

आज देश में पल रहे भ्रष्ट नेतओंको पदच्युत करने के लिए और राष्ट्र हित में कोई अच्छा कार्य करने के लिए सहमति बनाने में भी हम असमर्थ हो जाते हैं, क्यों ?, क्योंकि अपना हित सर्वोपरि हो गया है.
हमने अपने आस पास इतनी ऊंची ऊंची दीवारें खड़ी कर दी हैं कि हम अपने आप में से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

हमें यह निर्णय कर लेना चाहिए कि हम चाहते क्या हैं ?
किस तरह का हो हमारा समाज?
हमारा राष्ट्र इस बदलते दौर में किस तरह मजबूत होकर उभरें?
या फिर सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा?
देश कों एक नेता कि नहीं एक समाज –सुधारक कि भी ज़रूरत हैं.
जो समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ और वर्षों से चले आ रहे सड़े-गले रीती-रिवाजों के खिलाफ देश कि जनता कों जागृत करें.
भला क्यों बार बार, जब हम अपने देश कों ‘माता’ का दर्ज़ा देते हैं और फिर भी अपनी माताओं बहनों बच्चियों पर होते अत्याचारों कों ‘नपुंसक’ बनकर देखते रहते हैं?
क्यों नहीं हम सब मिलकर ऐसे ‘देश्द्रोहियोंको’ और ‘समाज-कंटकोंको’ उनके अंजाम तक पहुंचाते हैं? क्यों नहीं हम ‘गुनाहगारों’ कों सज़ा दिला पातें है?
क्यों हम बार बार ‘जात’, ‘धर्म’, ‘प्रांत’, या ‘भाषा’ के नाम पर आपस में ही लड़तें रहे?
क्यों हम तय नहीं कर पातें हैं कि ‘जो सत्य है वो सबके लिए एक जैसा हो, जो सही हैं वो सब के लिए सही हो, और जो जायज है वो सबके लिए जायज हों?
इतने विशाल ‘गण-तंत्र’ में क्यों कुछ ‘खास लोग’ अपनी मन-मानी करतें रहें?
क्या वजह हैं कि देश के कुछ हिस्सों में अभी भी ‘सत्ता’ कुछ गिने-चुने लोगों कि ‘बपौती’ बनी हुई हैं, और केवल यही लोग दिन-दुगुनी रात चौगुनी संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं और भ्रष्टाचार कर, किराए के ‘बाहुबल’ से अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ‘गरीब’, ‘अशिक्षित’ और भोली-भाली जनता कों बरगला रहें हैं?
क्या आज़ादी के ६८ साल बाद भी हम ये तय नहीं कर पा रहें कि कैसें हम ‘एक-जूट’ होकर, एक-समाज बन कर रहें?
हमें ये चीज़ भी समझ लेनी चाहिए कि हम जितने भी हैं हम सब एक हैं, हमारे बीच किसी भी प्रकार का और कोई भी भेदभाव नहीं है – और न होना चाहिए,  और हमें एकजुट होकर रहने में ही भलाई है. नहीं तो दुश्मन तो ताक में बैठा ही है.
दूसरी बात यह है कि हमारी खुशहाल जिंदगी और हमारा भविष्य, हमारी आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य हमारे ही हाथ में है. इसीलिए जो भी ‘गलत’ है उसके खिलाफ हम सब एक होकर लडें – फिर दुश्मन अंदरूनी हो या बाहर का.

हमें अपने देश कों अपनाना होगा, इससे प्यार करना होगा. यह केवल किताबी बातें करने का समय नहीं है. दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही रही और हम जो सदियों से अपने ‘महान’ होने का ढिंढोरा पीटकर अपने आप में ही ‘बे-वजह’ ‘खुश’ होतें हैं गर्त में जा रहे हैं.

हम अंदर ही अंदर खोंखले होते जा रहे हैं. हमारा समाज एक बेहद खोखला समाज बन गया हैं. जिसे जब चाहे तब कोई भी ताकत आसानी से नष्ट कर सकती हैं.
हम सबको मिलकर जो ‘गलत’ हो रहा है उसे रोकना होगा.इसके लिए हमें ‘जात-पात’,’धर्म’,’भाषा’, ‘प्रांत’ या ‘दल’ से ऊपर उठकर सोचना होगा.

हमारा ध्येय भारत कों एक सुखी, समृद्धशाली, शक्तिशाली, सुरक्षित, सौजन्यशील, शांतिप्रिय, विकासशील,प्रगतिशील, मानवता, भाई-चारा और संवेदनशीलता कों नयी ऊंचाई पर ले जानेवाला देश बनाना का होना चाहिए. यही हमारा धर्म और यही हमारा कर्म होना चाहिए.

पिछले कई वर्षों से समाज में ‘अनुशासनहीनता’ बढ़ी है, ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था हावी रही है, और जो सरकारें आयी उनकी ‘लोला-पोला’ कार्यशैली ने राष्ट्र कि आत्मा कों कमज़ोर बनाने का कार्य किया.
अब लगता हैं कि एक मजबूत सरकार केंद्र में स्थापित हुई हैं (शायद ये कहना जल्दबाजी भी हो सकती हैं ), लेकिन जनता कि भागीदारी के बिना ये सरकार भी कुछ नहीं कर पाएगी, इसीलिए हर भारतवासी कों राष्ट्र के ‘पुनः निर्माण’ में अपना योगदान देना ज़रूरी है. और सब मिलकर एकजुट होकर राष्ट्र में एक नयी चेतना – एक नयी ऊर्जा का निर्माण करने का संकल्प करना चाहिए. अगर ये अब नहीं हो पाया तो फिर कभी नहीं हो पायेगा.
हम सब राष्ट्र के नव-निर्माण का संकल्प लें !!!

एक जूनून – एक जज़्बे कि तलाश में हैं देश!

देश कल ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है !
हम सब के लिए एक पावन दिन और उत्सव मनाने का दिन.
साथ ही साथ इन ६८ वर्षों में हमने क्या पाया इसका मंथन भी इस दिन हमें कर लेना चाहिए. देश कों मजबूत बनाने के लिए हमने क्या रास्ता अपनाया और विविधता में एकता साधने के प्रयास में हम कितने सफल हुए इसका भी आकलन करना चाहिए.
अपने समाज कों एकात्म बनाने के लिए हमने क्या प्रयास किये और आगे भी इसे बरकरार रखें के लिए, इसमें एक नया जोश और एक नयी उमंग भरने के लिए हम सबको साथ मिलकर काम करने कि ज़रूरत अब पहले ज्यादा है. क्योंकि देश के दुश्मन फिराक में है कि कब इसको तबाह किया जाए. इसमें देश कों अंदर से खोखला करनेवाले अपराधी-असामाजिक तत्व भी देश के दुश्मन ही है.
ऐसे में १२० करोड कि जनता महज़ एक भीड़ के रूप में नज़र आये ये हम लोगों के लिए सबसे बड़ी शर्म कि बात है.

हमारे देश में भीड़ कि कोई कमी नहीं है. चारों तरफ, जिधर देखो, भीड़ ही भीड़ है.
कुछ दिन पहले, भीड़ द्वारा एक चोर कों पिट-पिट कर मार देने कि घटना हुई. हमारे देश में समय समय पर ऐसी घटना होती रहती है और खबरें आती रहती है.
भीड़ चाहे तो कुछ भी कर सकती है. हमारे देश में जैसे लोक तंत्र या प्रजा तंत्र, ‘घूस-तंत्र’, ‘परिवार-वादी-सत्ता-तंत्र’ या और भी कई ‘यन्त्र-तंत्र’ काम करते हैं, उसी प्रकार से ‘भीड़ तंत्र’ की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका समय समय पर सामने आती है, और भीड़ अपनी तरीके से कई मामलों में फैसले करती रहती हैं.
लेकिन ज्यादातर गंभीर मामलों में या समाज से सरोकार रखने वाले मामलों में भीड़ खामोश रहती है और जब-जब हमें लगता है कि अब तो ‘जनता ‘ जरूरू कुछ करेगी या एक ‘जन-सैलाब’ जैसे उमड़ेगा या फिर वह निर्णायक घडी अब आ गयी है – अब ‘क्रांति’ होनेवाली है, तब-तब ऐसा नही होता है, और मेरे वतन कि १२० करोड की भीड़ का तब पता ही नही चलता है, तब उसके ‘अस्तित्व’ का एहसास ही नहीं होता है. यह एक बहुत ही गंभीर विषय है और इस पर चर्चा ज़रूरी है. जिन मुद्दों पर हम सबको मिलकर लड़ने कि ज़रूरत है, वो मुद्दे तय होने चाहिए और उनको लागू करने के लिए समाज हित युद्ध स्तर पर काम होना चाहिए.

हमारे देश में भीड़ चाहे तो बहुत ही छोटी से छोटी बात पर ‘इंसान’ की जान तक ले सकती है, पर गंभीर से गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साधे खामोश भी रह सकती है और कभी कभी तो ऐसे भी लगने लगता है कि हमारे शरीर में खून बहता भी है या नहीं?
क्योंकि जब उसे उबलना चाहिए या यूँ कहे कि खौलना चाहिए तो वैसा होता नहीं है.

भीड़ चाहे तो मामूली चोरी या छोटे से छोटा जुर्म करनेवाले आदमी को , या ‘बटुआ’ उडाकर भागते हुए चोर को पकड़कर पीट पीट मार सकती है, साईकिल चोर को पकड़कर पिट पिट कर अधमरा तक कर देती है, पर यही भीड़ ‘नाकारा’ और ‘नालायक’ राजनेताओं को कुर्सी से उतार नहीं सकती.
यहाँ तक कि पुलिस भी एक छोटे बदमाश कों तो सड़क पर घुमा घुमा कर पिटती है लेकिन बलात्कारियों कों ‘मुंह’ ढांक कर बहुत ही सुरक्षा के साथ चुपके से ले जाती है, और पीड़ित जनता हाथ पे हाथ रखकर अपनी बर्बादी का तमाशा लाचारी से देखती रहती है.

‘भीड़’ बच्चों पर जुल्म ढाने वालों को भी बक्श देती है. ईमानदार अफसरों को जिन्दा जलानेवालों के खिलाफ, भ्रष्ट अफसरों या नौकरशाहों के खिलाफ भीड़ की आवाज़ दब जाती है.
देश लुटता रहता है तो भीड़ की परछाई भी नज़र नहीं आती.

हमारा देश, हमारा समाज , हमारी संस्कृति पर धब्बा लगाने वाली कई घटनाएं हर रोज होती रहती है, पर भीड़ खामोश रहती है.
जिस देश में देवी की पूजा होती हैं वहीँ हर रोज बलात्कार की कई वारदातें होती है, यहाँ तक कि नारी के टुकड़े टुकड़े कर मार दिया जाता है, उसे सरे बाज़ार नंगा कर घुमाया जाता है, भीड़ खामोश रहती है,
बड़ी बड़ी डकैती होती है, लोगों को गाडियों के निचे कुचला जाता हैं, निरपराध बालकों को बलि चढ़ाया जाता हैं, भीड़ सुस्त रहती है,
इस भीड़ का जोश तो तभी कुलांचे मारता है जब कोई साईकिल चोर पकड़ में आये या फिर कोई कमजोर पकड़ में आये, नहीं तो सरेआम होते जुर्म को देखने वाले तमाशबीन हमारे यहाँ कम नहीं है.

पिछली कई घटनाओंको लीजिए, ऐसे कई उदहारण दिन प्रतिदिन हमारे यहाँ हैं.

‘गैर जरुरी’ और ‘विध्वंसक’ मामलों में भीड़ अपनी भूमिका जरुर निभाती हैं, बजाय इसके कि कोई रचनात्मक कार्यों में या कोई सकारात्मक गतिविधि में ‘मानव-उर्जा’ का उपयोग किया जाये.
जब चुनाव आतें हैं तो भीड़ घरों में सिमट कर रह जाती है, (अभी हाल के चुनावों में ज़रूर मतदान के प्रतिशत में वृद्धि हुई जो एक अच्छा संकेत है, लेकिन अभी भी एक जूनून कि कमी हैं ).

ये जूनून ज़रूरी है. देश में एक सामाजिक क्रान्ति जगाने के लिए ‘जूनून’ बहुत ज़रूरी है.

अभी हाल ही ऑस्ट्रेलिया में हुई एक घटना जिसमे कि रेल और प्लेटफोर्म के बीच फंसे एक व्यक्ति कों सब लोगों ने मिलकर बचाया यह बताने के लिए काफी है कि हम कहाँ हैं ! वहाँ का समाज कितना जिंदादिल हैं और हम कितने मुर्दादिल !
हमारे यहाँ दिल्ली में या फिर लगभग हर जगह मानवीय असंवेदनशीलता कि पराकाष्ठा कि कई घटनाएं है. जिनेह पढकर-सुनकर हमारा सर शर्म से झुक जाता है.

हम आपसी सद्भाव कों भूल गए है. सामाजिक सरोकार से कट चुके है. विकास कों हमने केवल भौतिक सुखों से जोड़ लिया है. संस्कृति, सभ्यता, समाज इन सबसे हमने किनारा कर लिया है, नहीं तो आये दिन बच्चियों पर हो रहे अत्याचारों कों देश यूं मूक-दर्शक बन कर न देखता रहता.
हमें तय करना चाहिए कि किस तरह का समाज, किस स्तर का जीवन हम जीना चाहते हैं.
हमारा जीवन स्तर क्या होना चाहिए, हमारे जीवन जीने का ‘गुणवत्ता स्तर’ क्या हो ?
पिछले दिनों देश हुई कई घटनाओं कों लीजिए और उनके गाम्भीर्य कों घटाती व्यवस्था कों देखेयी, ‘सामाजिक संवेदनहीनता’, ‘ मानवीय संवेदनशीलता’ कों भूलता, और एक ‘निष्क्रिय नपुंसकता’ कि तरफ बढ़ता हमारा देश साफ़ नज़र आएगा.

हमें तय करना चाहिए कि हम हमारी बर्दाश्त करने कि हद कहाँ तक होगी? हम कितना अत्याचार सहते रहेंगे और कब तक राजनेताओं के जाल में फंसकर आपस में लड़ते रहेंगे? नैतिक मूल्यों के प्रति, सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति हमारे कर्तव्य क्या हैं? कब तक हम घिसे-पिटे तरीके अपनाकर अपने आप कों बर्बादी कि गर्त में ले जाते रहेंगे? कब तक हम नाकारा व्यवस्था कों अपनी मन-मानी करने देते रहेंगे?

कब हम ‘जागरूक’ नागरिक’ अपनी ‘कुम्भकर्णी’ निद्रा से जागेंगे?
कब हम एक ‘तमाशा’ देखनेवाली भीड़ कि जगह एक ‘राष्ट्र’ कहलाने लायक बनेंगे?

Farmer Suicides in Gujarat – Facts

Background

Recently, Arvind Kejriwal (AAP) claimed that 5,874 farmers committed suicide in Gujarat in last 10 years. Whereas, the Gujarat government claims that only 1 farmer suicide in Gujarat was due to crop failure. The other suicides were not related to crop failures, and they were due other reasons such as family issues. The farmers do not show a greater tendency to commit suicide than the general population, particularly in Gujarat.  Let’s have a detailed look.

No. of farmers in Gujarat

There are 54.47 lakh cultivators and 68 lakh agricultural workers in Gujarat (2011 census). Hence,

Total no. As % of total population
Cultivators in Gujarat 5.447 million 9.0%
Cultivators + Agricultural laborers in Gujarat 5.447 + 6.8 million 20.3%

Farmer suicide statistics (as per Govt records)

NCRB classifies the suicides by employment categories. For Gujarat, the NCRB states that 564 people in the agricultural employment category committed suicide in 2012. 5,302 committed suicide during 2003-2012 (10-year period). 5,872 committed suicide during 2002-2012 (11-year period). Source: 1 2

Farmer suicides vs. non-farmer suicides

Source

 

State Farmer suicides as a % of total suicides
Maharashtra 23.50%
Andhra Pradesh 18.10%
Uttar Pradesh 16.80%
Karnataka 14.70%
Kerala 12.70%
Madhya Pradesh 12.00%
Assam 10.50%
Sikkim 10.50%
Haryana 9.80%
Jharkhand 9.00%
Bihar 9.00%
Arunachal Pradesh
Gujarat 7.90%

Conclusion

Despite being 9% of the total population of Gujarat, the farmers constitute only 7.9% of those who have committed suicide. This is assuming that NCRB has not counted farm laborers under the employment category “farming”. If that’s the case, the condition is even better: despite being 20% of the population, those involved in agriculture in Gujarat form only 7.9% of the people who committed suicide.

Thus, there is a good possibility that the Gujarat government’s claim is right.

Note: Some AAP supporters will try to use above data to claim that everyone, not just farmers, in Gujarat is committing suicide. For such people, here is a list of states/UTs with the highest suicide rates (suicide/population) in India (Source: NCRB)

 

State/UT Suicide rate (2012)
Puducherry 36.8
Sikkim 29.1
Tamil Nadu
Kerala 24.3
Andaman & Nicobar 23.6
Tripura 23
Chhattisgarh 22.9
Karnataka 21.2
Dadra & Nagar Haveli 17.6
Mizoram 17
Andhra Pradesh 16.6
West Bengal 16.5
Goa 15.8
Maharashtra 14
Madhya Pradesh 13.3
Daman & Diu 12.6
Odisha 12.2
Gujarat 11.8

This was posted on Reddit (could not find the exact link)

Deewaaron Ka Jungle – 3 – Gulzar

(Deewaaron ka Jungle – III)

Deewaron ka Jungle – I, Deewaaron ka Jungle – II

(Though the posts under this series ‘Deewaaron Ka Jungle’ are delayed posts, the issue discussed is still as much relevant to our society, social life and for ‘we the people of India’.
And it will be of utmost importance in the coming years too, till we rise as ‘one soul-one nation’.

So continuing with the balance posts in this series and sharing my thoughts with you…)

Moving to the 3rd part of this article, just to share – ‘when we watch these great peoples speaking about such social issues, listening to them is like an altogether different experience,

‘us ek ghante mein ham ek umr jee letein hain’,

‘Kitni gehraayee hoti hain unki baton, lagta hain poore jeewan ka anubhav samet liya hain un kuchh palon mein’.

And, when the person speaking, on such sensitive issue is none other than Gulzar Saab that is sure to happen. (Watching him and listening him … these lines repeatedly come to my mind – Vaishnav jan to tene kahiye je peed parayee jaane re….

It has been exactly a year now… (And coming to full circle of this thought process I had gone through)..
9 th March 2013 Gulzar Saab was speaking on the occasion of release of the ‘third’ edition of his ‘Dyodhi’ (on ABP Majha)

As the basis of this series of articles is a poem from one of the greatest ‘social’ poet or rather the ‘Peoples Poet’ of our country Sahir Saab, I thought it more appropriate to combine it with thoughts of another great poet Gulzar Saab.

In this conversation he speaks on various issues affecting our social existence. When he was asked ‘how do you feel about the current issues in our society?’
(Link of this is available here)

Gulzar Saab on release of 3rd edition of ‘Dyodhi’

‘Geetkar ki baat ham alaahida rakhe, lekjn shaayar ko kaisa lagta hain aaj ka vaastav, jo iird gird uske mandra rahaa hain wo yatharth wo jo reality dekh rahaa hain shaayar usko kaisa lagta hain

Use chotein lag rahi hain,
Ji
Chotein lag rahi hain

Main yun kahoon,
Thode thodese ehsaas hain jaise

Kaagaz par girte hi phutee hain labz kayee, (maaf kijiyega, main kavita par aa gaya)
Kaagaz par girte hi phutate hain labz kayee
Kuchh dhuaan uthha, chingaariyaan kuchh, ek nazm ko phir se aag lagi,
Kaagaz par girte hi phutate hain labz kayee
Kuchh dhuaan uthha, chingaariyaan kuchh, ek nazm ko phir se aag lagi
Jalte shehar mein baithha shaayar isse zyada kare bhi kya, lafzon se aag nahin bujhti,
Nazmon se jakhm nahin bharte(ye, yoon mahsus karta hain kavi). Aapke chaaron taraf dekhte hue, to bebasi to hain, kabhi use bayaan kar letein hain jo ho raha hain…

Baat kahin khalti to hain andar jaake; par aap kya karenge;

Main cigarette to nahin peeta hoon, magar aanewaale se main itna pooch leta hoon ke maachis hain?
Main cigarette to nahin peeta magar aannewaale se bas itna poonchh leta hoon ke maachis hain?
Bahot kuchh hain jise main phoonk dena chaahta hoon,
Magar himmat nahin hoti…..meri himmat nahin hoti

How long can we remain isolated from the society? How long can we ignore the social circumstances?

What other Gulzar Saab said in this talk is summarized in the following points;

We need to be social conscious!
Cinema cannot bring revolution!!
It is a recorder and reminder!
On women issues he says;
We do not respect children and women in society.
We are callous!
We continue to tolerate the ‘wrong’ at the cost of ‘right’, we continue to tolerate!

बेबस को दोषी ठहराए
इस जंगल का न्याय
सच की लाश पे कोई न रोये
झूठ को सीस नवाए
पत्थर की इन दीवारों में
पत्थर हो गए राम
बाहर से चुप-चुप लगता हैं
अंदर हैं कोहराम
दीवारों का जंगल जिसका
आबादी हैं नाम

We do not revolt, and if at all it is only little crawling here and there, so the overall view seems to be ‘all is well’, collective revolt to shake up overall is necessary!

(Note: I had earlier read about Gulzar Saab’s ‘Dyodhi’, but this book was not available at the leading ‘online’ store.
Before concluding this post I thought it would be better if I get it and finally on searching I got the publishers website and get this book directly from them.

Now ‘Dyodhi’ is with me …)

(To …… Deewaaron ka Jungle – IV)

Deewaaron Ka Jungle – 2 – Nana Patekar

(Deewaaron ka Jungle-II)

Deewaaron ka Jungle-1

बहुत घुटन है कोई सूरते बयाँ निकले
अगर सदा न उठे, कम से कम फूगां निकले
–    साहिर लुधियानवी

As a human being we cannot remain isolated to what is happening in our surroundings and day to day life. Sometimes we are hurt, we are pained, we struggle, we fight back in our own individual way but we alone cannot make all right as we would like it to be.
We are confined to our comfort zone. And it is very difficult for us to come out of it.
Ultimately we are compelled to confine ourselves to our own priorities, we have our own personal problems and in our own way we are attached to it. Even if somehow we want to do something for a social cause we are unable to do so and we could not carry our fight for others for longer.

We cry, we weep, we keep wailing for some time and then back to square one we are back to the only cause of our ‘do joon ki roti’.

And then there is this ‘chhodo yaar, ae sab to chalta hi rahega, apne baap ka kya jaata hai’

But believe me, though not much may have gone of our Fathers but everything of our children is at ‘stake’.

Take for instance the ‘Nithari’ killings of innocent children years before… what has happened?
The ‘Satan of Patans’, the continuous rape in PTC college of Patan in Gujarat?
It is more heinous act than terrorism.
It is only who lost their near and dear ones those suffer.

And the others will continue to suffer some other day because we have all accepted it now as a routine and the ‘bench-mark’ has been set and achieving to ‘new heights’ of ‘heinousness’- thanks to the people of this country – because for rest of them it is all ‘sab chalta hai’, ‘chhod na yaar’, ‘apne baap ka kya jaata hai, ‘bhool ja ..’ , and happily the ‘republic’ goes on, moving further, marching to ‘mars’ and going down with ‘humanity, values, ethics, moral, civic sense, social commitment, social responsibility, and moral and social responsibility’;
(Yesterday there was news about a Son of Leader (of the party in power) in UP, beating a Ladies Officer on duty- where are the ‘woman rights activists’ or ‘human rights activists’ and so called NGOs?)

Deewaaron ke is jungle mein
Bhatak rahe insaan
Apne apne uljhe daaman
Jhatak rahe insaan
Apni vipadaa chhod ke aaye
Kaun kisi ke kaam

Here I would like to share with all what the great film personality Nana Patekar had said about in a interview with IBN Lokmat editor Mr.Nikhil Wagle few months back.
This discussion held then is very much in line with our topic of this article and hence I feel it is essential to share it with all of you (those it has been almost ten months now when this interview was held)

On 3rd march there was an interview of Nana Patekar on ‘IBN- Lokmat’ where the editor of the news channel Mr. Nikhil Wagle discussed about his latest film – the attacks of 26/11-and the prevailing socio-political situation in the country. I missed some earlier part of this discussion, but thanks to YT, it is available on it. Nana talks about many current socio-political issues in this talk and very less about his new film. As we know about Nana he is socially active and do many things ensuring that there is no ‘publicity’ about it.
Nana is worried about the current scenario, the way life has changed, that he watched through his journey of life from his childhood days to now.

‘Hamne ek dusre ke prati vishwas kho diya hain’

About the vulnerability of life nowadays he says ‘one cannot ensure that the person who left his house in the morning will be back in evening (as it is) to home or not?’
Nana also speaks on the deteriorating social values in our society.
But he is optimistic that the new generation will be able to shake up the current system and bring a change.
Something needs to be done. If I do not express I get suffocated. Cinema is the medium.

As mentioned above while watching this on 3rd March I had missed some earlier part, but very soon I find it on YT and please note what note it start –
Nana is walking in his farms followed by the editor and his crew, and the editor and what Nana said – ‘mumbai mein kuchh nahin hain, sirf ‘deewaarein’ hain! It’s suffocating in Mumbai behind the ‘four walls’.
(Deewaaron ka Jungle-II) …

Deewaaron Ka Jungle – 1

(Deewaaron ka Jungle-1)

All of us read news or watch them on TV. And as we read or hear the happenings in our society and around us, we are shaken, heartbroken at some times, depressed, dejected and helpless…

I am again reproducing text of some news for the incidents that we all know have taken place around us, and on the same land where we ‘the people of India’ live in and moving forward, waiting for some more ‘ghastly’ to happen …

New Delhi, Jan 8 (IANS) at an age when most children cherish their books, clothes and toys, a 12-year old girl is silently suffering the pain of a brutal gang-rape which has forced her to undergo 19 surgeries till now. The victim is now waiting for her 20th surgery at the premier AIIMS here.
Gang-raped by six men in Sikar in Rajasthan more than a year ago, the girl has undergone both mental and physical trauma and has been waging a silent battle against all odds since the time the men left her on the roadside to die after brutally raping her.
When this IANS correspondent met the victim in the All India Institute of Medical Sciences (AIIMS), she was lying on the hospital bed with her face covered with the sheet, while her sister and 65-year-old widowed mother sat near her – hoping that the next round of medical treatment will help her regain her health.

Bhubaneswar, Jan 6 (IANS) A teenaged girl who was sexually molested by a boy of her age while returning after a bath in a nullah (drain) in Odisha’s Jajpur district committed suicide by hanging herself at home, police said Monday.
The 17-year-old girl was reportedly molested by Rajan Bhoi..
Ashamed and apprehensive of the response from other villagers, the girl hanged herself to death from the ceiling of her home, police said.

Few days back a 16 year old is gang raped and burnt to death as the ‘nation’ ‘silently’ watched on…
It has been in news recently that around 50 children have died in the relief camp housing at Muzzafarnagar (U.P) and the deaths still continue whereas the government is engaged in partying, touring and celebrating ‘mahotsavs’!
How can we tolerate this?
And how long are we going to tolerate this nonsense?
Some time back three persons were killed while saving a girl from eve-teasers, among the three one was the girl’s father and two were her Uncle. (Well, naturally as it happens in our country, the goons escape safely).
Coming to the daily news of Molestations and Rape and even Rape and Murder, now it has become a daily routine and reduced to mere a ‘news’.
Following are some more excerpts of incidents that took place around us recently;
# a truck of onion triples down, its driver injured and crying for help, peoples gather there but only to pick up the onions leaving the ‘human being’ screaming for help and ultimately resulting in his death when he is taken for treatment.

# in a shocking case of public apathy, a man lay on the road crying for help inside a tunnel next to the bodies of his wife and infant daughter with nobody stopping by for around 40 minutes after a speeding truck hit his motorcycle.
Police said the injured husband kept crying for help for around 40 minutes but the motorists ignored their cries and every vehicle passed by without stopping delaying prompt medical treatment.
CCTV footages showed that the woman’s husband and his four-year-old son beseeched passers-by for help for almost 10 minutes. However, no one stopped to help them, police said.
No one stepped out for help as the man holding his son sat in the middle of the road while his wife and daughter lay in an unconscious state and without knowing their fate.
#3 two women were tonsured and garlanded with shoes in a Jharkhand village after they resisted a molestation attempt, police said Thursday. According to police, four youths forcibly entered their house and misbehaved with them. When they resisted, they were tonsured and garlanded with shoes.

Police have registered a complaint against four people but no arrests have been made as yet.

# Bangalore: Senior citizen beaten to death by teenagers. … in Bangalore has died after he was allegedly assaulted by two men who were eve-teasing his niece.
# a senior citizen who opposed a group of eve teasers in Delhi’s harsh….
# Two boys in the prime of their youth killed for defending the honor of their women

Anger has erupted in Mumbai and across cyberspace over the killing of two young men after they tried to defend their female friends from a man who allegedly hassled the women on a night out.
They were allegedly stabbed to death by a group of men after they objected to the indecent behavior of one of the men toward their female friends.
“The problem of eve teasing in the country is getting out of hand. Women everywhere, at least once in their lifetime, have either been groped or pinched or had to bear lewd remarks from men,” she said in an interview.
Early last month, also in Mumbai, a girl was stabbed for resisting an assault.
Sarmishtra Neogy wrote on the page’s wall, “At 11pm in a crowded place how can these goons have so much of courage to openly commit such a crime? They were confident that the Police will anyways do nothing to them and they will get away with it…When can we roam around freely? And when will there be a stop to all the brutality?”
Sympathy tweets poured in for the victims as people demanded justice. Nikhil Chinapa, a DJ and MTV anchor, wrote:, “Why can’t our legal system fast-track these cases? Isn’t it in everyone’s best interest to conduct a swift trial?”

Music director Vishal Dadlani wrote, “Keenan and Reuben, killed for standing up to eve-teasers. What has our city, our home, become? WE, who live here, must stop this, NOW!!”

“Yuva Satta,” a youth organization that works for good governance and political reforms is planning a campaign for awareness about eve teasing and the laws related to it.
“We are irritated and angry, but we have to channelize the emotions into something constructive to tackle the bigger issue of eve teasing and the stigma attached to it,” Mr. Mascarenhas added.
“The incident is definitely shocking because we don’t hear so much of it in Mumbai,” she told India Real Time. “But it isn’t going to stop me and my girl friends to enjoy and lead our lives as we want to.”

#Acid was flung on Preeti, 25, by some unknown people as she got off the New Delhi-Mumbai Garib Rath Express at Bandra Terminus May 2 morning to begin work as a nurse at the army hospital here.
She was on a ventilator for the past two weeks as her right lung had collapsed and the left one was only partly functional.
According to doctors attending to Rathi, her survival chances were as slim as five percent, given the extent of internal injuries, damage to vital organs and bleeding following the attack.
Acid had entered her oesophagus, windpipe and trachea.
She was initially treated for burns and other complications at the Masina Hospital in Byculla and then shifted to Bombay Hospital, New Marine Lines, May 18 for advanced medicare.
Doctors prioritised efforts to keep her alive and attempted corrective surgery on her, but abandoned the operation at the last minute due to internal bleeding.
Amar Singh had petitioned Maharashtra Home Minister R.R. Patil and state Director General of Police Sanjeev Dayal last fortnight, asking that the probe into the attack be taken away from the Government Railway Police (GRP).
“We want it to be handed over to either the state Crime Investigation Department of Central Bureau of Investigation as the GRP are not investigating it properly,” Amar Singh claimed in his petition.
He alleged that the GRP had wrongfully arrested a youth and was yet to track down the real culprit.
For the last three weeks, Amar Singh, his wife, their son and two nephews maintained a constant vigil by Rathi’s bedside as she battled for life.

#Woman blinded in acid attack in Mumbai. HT Correspondent, Hindustan Times Mumbai, May 03, 2013. First Published: 00:23 IST(3/5/2013) | Last Updated: …

And finally;
A 23-year-old woman, who died of injuries following an acid attack in Mumbai, was cremated with state … IANS New Delhi, June 3, 2013 | UPDATED 21:08 IST
Jun 1, 2013 – Delhi girl who suffered acid attack dies in Mumbai hospital – Delhi resident Preeti Rathi, who was … Updated: Wed, 16 Oct 2013, 19:43 IST.

But, we do not know if the real culprit has been arrested and even arrested, will he get the punishment he deserved?

I shall repeat here the below lines mentioned by my friend Shri.Raja in his tweets;

“Today we have millions of more educated people. So much more technology. Life has become easier in many ways. But still SOMETHING’s missing.”

– A collective outrage is missing
– Caring for each other is missing
– A collective fight is missing
– Rising above petty political differences and rising above caste, creed and religion is missing
– The Nation’s soul is missing

Going by the current incidences of crime against women, crime against children, the overall increasing crimes in the society, the vulnerability of human life, the problems faced by common man, inflation, hunger, corruption, lack of basic amenities all make us to think – is this the country our freedom fighter heroes have dreamt of ?

The situation is grimmer than we actually see it.

It seems that the social values had started declining since long time back and today it has reached its peak
We have made developments only in terms of ‘insensitivity’ and ‘callousness’.

‘Haal na poochhe Dard na baante
Is jungle ke log
Apna apna sukh hain sabka
Apna apna sog
Deewaaron ka jungle jiska
Aabaadi hain naam’

(Deewaaron Ka Jungle-1)

Dil fida karte hain, Qurbaan jigar karte hain…

‘Dil fida Karte Hain
Qurbaan Jigar Karten Hain
Paas Jo Kuchh Bhi Hai
Mata Ki Nazar Karte Hain

दिल फ़िदा करते हैं
कुर्बान जिगर करते हैं
पास जो कुछ भी हैं
माता कि नज़र करते हैं’

“Even if I have to face death a thousand times for the sake of my Motherland, I shall not be sorry. Oh Lord! Grant me a hundred births in ‘Bharat’. But grant me this, too, that each time I may give up my life in the service of the Mother land.’

These inspiring words come from none other than the great revolutionary and laureate Shri.Ramprasad ‘Bismil’.

Today is the 87th martyrdom day of Pandit Shri.Ramprasad Bismil. He was hanged to death in Gorakhpur Jail on 19th Dec 1927.

He was only 30 years old then.

He was born to Shri.Muralidhar and Smt.Moolmati at Shahjahanpur (U.P) on 11th June 1897.
He learnt Hindi and Urdu and also joined English medium school in spite of his Father’s disapproval. He also learned Sanskrit and Bengali.
In his School days he comes in contact with the ‘Arya Samaj’. Simultaneously he was also doing writing poetry and was very talented in writing poetry. He made Hindi translations of some Bengali books also. Some of this writings include ‘The Bolshevik Programme’, ‘A Sally of the Mind’, ‘Swadeshi Rang’, and ‘Catherine’.
All of his poems have the intense patriotic feeling.

Sukh jaaye na kahin

Paudha ye aazadi ka

Khoon se apne ise

Isliye tar karten hain

सुख जाए न कहीं
पौधा ये आज़ादी का
खून से अपने इसे
इसलिए तर करते हैं

He and his associates raised a revolutionary organisation to fight against the British Imperialism in India. To strengthen this organisation they require funds, for which they took up to loot government treasury which resulted in the famous Kakori Train Conspiracy. This jolted the British Empire and soon the Britishers were successful in arresting the key members of the Hindustan Republican Army except Chandra Shekhar Azad who remain un-caught till his end.
Ramprasad, Ashfaqullah, Roshan Singh and Rajendra Lahiri were awarded death sentence after court trial.
They were kept in Gorakhpur Jail, where Ramprasad wrote his autobiography and completed it just before three days of his hanging.

He was confident that the sacrifice by him and his friends would not go in vain and there will be many more to follow;

मरते ‘बिस्मिल’ ‘रोशन’ ‘लहरी’ ‘अशफाक’ अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैंकड़ों इनके रुधिर की धार से ॥

His last words addressed to fellow countrymen are also very much important and relevant forever;
“देशवासियों से यही अन्तिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिलकर करें और सब देश की भलाई के लिए करें । इसी से सबका भला होगा ।
“My last request to all countrymen is that whatever they do, do collectively and in the interest of the Nation. This will be beneficial for all”

‘Koi maata ki ummeedon pe

Na daale paani

Zindagi bhar ko hamen

Bhej de kaale paani

कोई माता कि उम्मीदों पे
न डाले पानी
जिंदगी भर कों हमें
भेज दे काले पानी

Ham bhi aaram uthha sakte thhe

Ghar par reh kar

Hamko bhi paala thha

Maa Baap ne dukh seh seh kar

हम भी आराम उठा सकते थे
घर पर रह कर
हमको भी पाला था
माँ बाप ने दुःख सह सह कर …

Years have passed by since these revolutionaries sacrifice their life for our freedom.
Today we breathe in this free air of an Independent country and our freedom has completed 67 years now. Lot of changes have taken place in our status as a Country.
Lot of scientific and technological advances have taken place since the colonial rule.
The globalisation and other international compulsions have affected our political as well as social life. Media and Social media, other than the entertainment industry are playing huge role in capturing the minds of the young generation. It is essential that this young generation go in detail of the lives of those people who suffered a lot and lot only for our happiness and a free life.

‘Dar o deewaar pe

Hasrat se nazar karten hain

Khush raho ahle watan

Ham to safar karten hain

दर ओ दीवार पे
हसरत से नज़र करते हैं
खुश रहो अहले वतन
हम तो सफर करते हैं
खुश रहो अहले वतन
हम तो सफर करते हैं ‘

Though our Priorities as a Nation have changed, the basic problems related with development and overall social development still remains to be a distant dream.

At this juncture it is essential for us to reconcile our goals and objectives as a nation, and took a stand collectively to lead this country to fulfil the dreams of our founding fathers and these great revolutionaries who made the highest sacrifices to see ourselves free. And more importantly all we have to do is in the ‘National Interest’ and not for satisfying the personal goals of some people.

I could only glance through few pages of the digital version of his autobiography and would like to mention few key points which can be a source of inspiration all of us;
– Ramprasad’s family suffered a lot when he was a child, and later on the young Ram Prasad also suffered a lot as he grow and fight with the British Empire still against all odds he continue his struggle and made this highest sacrifice for the nation.
– He has mentioned in his autobiography about how he overcome his bad habits and the several distractions coming in his way. Also how he took up ‘bramhacharya’ (celibacy) and practices it.
– He has highest regards for his Mother who according to him teach him, inspire him and made him what we know him today.
– He has mentioned his gratitude for all his ‘Gurujans’ and all who helped him and motivate him for good and all those who influenced his life for betterment.
– In his biography consisting of five blocks and the respective chapters therein he has given the details of his life from his childhood to landing in jail. Three days before his hanging he had completed the autobiography and given to his Mother and his friend Shiv Verma in the lunch box which they had brought for him.

A digital wiki version of the printed book of his autobiography in Hindi, prepared by Shri.Dayanand Deswal, is available on the domain as Ram Prasad Bismil Ki Aatma Katha
Info on wiki is available at – Ram Prasad Bismil

A documentary published by I & B Ministry – ‘A Tribute to Ram Prasad Bismil’ is also available on YT and uploaded just 06 months back.

There is also a wiki page which gives details of his notable works (books and poems) named as Author Ram Prasad Bismil
The introductory para from this page is given below;
“An Indian poet, laureate and revolutionary, who was executed in 1927 by the then British Empire.
Ram Prasad Bismil (11 June 1897 – 19 December 1927) was an Indian revolutionary who participated in the Mainpuri (1918) and Kakori (1925) conspiracy cases against British Empire. He was also a patriotic poet who wrote with the pen names of Ram, Agyat and Bismil in Urdu and Hindi but became popular with the name ‘Bismil’. Ram Prasad Bismil was one of the founder members of the Indian revolutionary organisation Hindustan Republican Association. Bhagat Singh praised him as a great poet-writer of Urdu and Hindi. Several inspiring patriotic poems including the famous poem Sarfaroshi Ki Tamanna is popularly attributed to him.”

Our Tributes to this GREAT PATRIOT and FIERCE revolutionary of INDIA..!!!