उम्मीद

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पे दुनिया कायम हैं,
इसलिए है उम्मीद तुझसे ही मेरी, कि जैसे है,
सृष्टि को नियम से,
नियम को परिश्रम से,
तपिश को ठंडक से,
रेगिस्तान को हरियाली से,
क्षुधा को खुराक की,
तृषा को जल से ,
लहर को किनारेसे,
निराशा को है आशा से,
धरती को सूरज से,
अग्नि को वायु से,
इंसान को इंसानियत से,
आत्मा को परमात्मा से,
और रिश्तों को ‘विश्वास’ की है उम्मीद !
यह रिश्ता टूट न जाये कभी,
बंधी रहे डोर पंचतत्व की इस जीवन से,
चलता रहे कारवां जिंदगी का यूँही,
यही सोचकर,
आज,
फिर ‘उम्मीद’ के ‘बादल’ घिर आये है,
और छायी है ‘घटा’ ‘विश्वास’ की,
लुटा दे हम पर तेरी ‘दया’ का ‘सागर’,
……… बरस जा अब तो !

(This poem was earlier posted on  nai-aash.in  and somehow it missed here, so re-blogged today with a hope that all these prayers reach to the God and he showers his blessing on us – on all of us)

अब कोई गुलशन न उजड़े . . .

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पर दुनिया कायम हैं, हर परिस्थिति में इंसान को ‘आशावादी’ होना चाहिए. ‘अच्छा’ होने कि उम्मीद करनी चाहिए. इसीलिए नव वर्ष का या पहला लेख इसी उम्मीद और आशा के साथ कि ‘देश’ बदलें और हमारी ‘सोच’ भी.
‘बुराई’ का नाश हो, ‘अच्छाई’ आगे बढे, ‘सत्य’ कि ‘विजय’ हो और ‘अत्याचारियों’ को सज़ा मिले.

वैसे खुशी कि बात ये है कि देश के नागरिकों में जागरूकता आयी है. पिछले दो साल से जिस तरह के ‘धरना’, प्रदर्शन’, ‘आंदोलन’ और ‘व्यवस्था (सिस्टम)’ के खिलाफ आवाजें उठी है वो एक अच्छा संकेत माना जा सकता है.
हमारे देश में घट रही घटनाओं से हम सभी आहत हैं, व्यथित हैं, और ये सब चीजें खास कर कलम के हर सिपाही को भी बहोत ज्यादा आहत करती हैं और मजबूर करती है कि हम अपनी संवेदनाएं कलम के माध्यम से व्यक्त करें.
इसी कड़ी में जब दिल्ली में पिछले दिनों हुयी बलात्कार कि घटना और देश में बे-लगाम ज़ारी इस तरह कि घटनाओं को पढकर, उन बिखरे हुए परिवार वालों के बारें में सोचकर और उनके ऊपर क्या बीत रही होगी यह सोचकर मन में यही ख्याल आता रहा कि आज़ादी के ६५ साल बाद भी आम आदमी न्याय से मेहरूम है.
कहीं तो यह ‘अत्याचार’ का ‘जुल्म’ का सिलसिला रुके, कुछ तो अच्छा हो, …
अनायास ही मुझे साहिर कि लिखी ये पंक्तियाँ याद आयी कि ‘अब कोई गुलशन ना उजड़े , अब वतन आज़ाद है’, एक बहुत ही सुन्दर गीत, जिसका संगीत जयदेव जी ने तैयार किया था और ये १९६३ बनी फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का है, जिसमे मुख्य भूमिका में सुनील दत्त और वहीदा रहमान थे.
साहिर लुधियानवी जी सही मायनों में एक सच्चे ‘मानवतावादी’, सच्चे ‘धर्मनिरपेक्ष’ और एक ‘सच्चे इंसान’ थे. अपने गीतों में उन्होंने हमेशा इंसान को एक ‘प्यार मोहब्बत’ के अलावा सभी धर्मों का आदर एवं इंसानियत के प्रति सद्भाव रखने का सन्देश दिया. हर अन्याय, अत्याचार के खिलाफ साहिर ने आवाज़ उठाई. साहिर चूंकि अपनी माँ से बहोत प्यार करते थे और अपनी माँ कि तकलीफों को उन्होंने भली भांति देखा समझा था, उन्होंने नारी जीवन पर – उनके जीवन संघर्ष पर बहुत ही सटीक गीत भी लिखे हैं, जो हम सभी जानते हैं.
आज जिस गीत कि बात हो रही है, वो करीब ५० साल पहले लिखा गया था और जिन सपनों को पूरा करने कि इसमें बात कही गयी हैं, उसमे हम कितना सफल हुए हैं इस पर गौर कर, जो सपने अभी अधूरे हैं उन्हें पूरा करने कि जरुरत हैं, और उसके लिए सबको मिल कर प्रयास कर, संगठित होकर लड़ने कि भी जरुरत है,
मैं चाहूँगा कि पाठक इस गीत को बार बार सुने, उसमे लिखे गए शब्दों के जज्बातों को समझे और सब मिलकर इसका प्रयास करें कि देश में रचनात्मक बदलाव हो.
(इस गीत के लिए एक ‘कड़ी’ निचे दी गयी है, जहां पर पाठक इस गीत के बारें में हमारे मित्र श्री.राजा द्वारा लिखा गया लेख भी पढ़ सकते है )

http://atulsongaday.me/2010/08/15/ab-koi-gulshan-na-ujde-ab-watan-aazaad-hai/

आज पूज्य स्वामी विवेकानंद जी कि जयंती मनाई जा रही है. इसी सिलसिले में हमारे मित्र श्री.आशीष द्वारा भेजे गए ‘समस’ (SMS) को पेश कर, अगले लेख में मिलने कि तैयारी करतें हैं;
“We are what our thoughts have made us; so take care about what you think. Words are secondary. Thoughts live; they travel far “– Swami Vivekananda

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Every day…

(a new beginning, a new hope)

Every day new thinking,
Every day a new thought

Every day a new picture,
In mind to be caught

Every day a new way,
Thinking of many sorts

Every day a new day,
And things to enjoy a lot

Every day a new poem,
A new story to write

Every day new lesson,
Gives us a new sight,

Every day brings different feelings,
Every day is of different kind

Every day is a mix of happiness and sorrow,
Every day is of new things to find and borrow