बाज़ार, व्यापार और गणतंत्र !

हम एक ‘गणतंत्र’ है
हमारा ‘अपना’ एक ‘मंत्र’ है,
हमारी अपनी ‘संस्थाओं’ के प्रति
हमारी ‘बेरूखी’ ‘अनोखी’ है,
इसीलिए देश में जो कुछ होता है
उसमे ‘अपने बाप का क्या जाता है’
‘होने दो जो होता है’
‘कौन किसके लिए रोता हैं’
‘यार सब चलता हैं’…

‘आबादी’ बढती है
‘नए शहर’ ‘पैदा’ होते हैं
‘ज़मीन’ के भाव कुलांचे मारते है
‘कंक्रीट-जंगल’ के दलाल खुश होते है,
‘रंग-बिरंगी’ सपने और
‘खोखली-जगमगाहट’ के ‘काम्प्लेक्स’ में
‘पर्यावरण’ और ‘प्रदुषण’ जैसे मुद्दे
‘फाइलों’ कि तरह गायब हो जाते है,
‘राजनीति’ इसीको ‘विकास’ कहती है

पर ‘कुदरत’ कहाँ
‘भेद’ करती है,
‘आपदा’ आती है
‘शहर’ डूब जाते हैं
‘इंसानियत’ ढूँढने से नहीं मिलती और
‘नीति-मूल्यों’ कि रूहें कांपती है,
‘लाचारी’ कों ‘बाज़ार’ निगलता है
रोते-बिलखते ‘मासूम’ ‘बिसात’ पर है
‘जिंदगी’ दम तोड़ रही है,
‘शेयर-बाजार’ में ‘सूचकांक’ बढ़ रहा है …

टक टकी …

क्यों हमसे इस कदर रूठा है तू भला,
और फेर ली है हमसे निगाहें अपनी,
क्या नहीं है परवाह तुझे उन मासूमों की भी,
जिन्होंने अभी अभी होश संभाला है,
और वे जिन्हें, तेरे होने पर –
तुझसे भी ज्यादा ‘यकीन’ है,

माना कि, की है बेवफाई हमने,
तेरे उसूलों से, और,
भटक गए हैं तेरी बताई हुई राह से हम,
फेर लिया है मुंह कुछ इस तरह से हमने ,
कि ‘जानकर’ बन गए है ’अनजान’
अपने ‘अंजाम’ से हम,

पर हम बेबसों कि तू सुनता रहा है सदा,
लगाये बैठे हैं टक टकी तेरी ओर,
हे परवर दिगार तुम दयालु ‘सरकार’
तेरा ही चलता रहा हुक्म हर बार,
तेरे बस में हैं सब भंडार
सूखी,बंजर,बिखरती ज़मीन को
तेरे ‘रहमो-करम’ का है इंतज़ार

जनसंख्या विस्फोट

आज विश्व पर्यावरण दिवस पर जन्मे समाजशिल्पी को ढेर सारी शुभकामनायें…
पर्यावरण प्रदुषण और उससे जुडी सारी समस्याओं का मुख्य कारण जनसँख्यामें हुई वृद्धि है. आज हमने अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए भौतिक सुविधा के साधन जुटा रखे है. पर इसमें हमने प्रकृति के नैसर्गिक तंत्र को खतरा पहुँचाया है. मनुष्य की आबादी बढ़ने के साथ साथ प्राकृतिक संसाधनों की कमी बढती जा रही है. आज हम प्रकृति के कितने करीब है ये याद दिलाने के लिए कुछ प्रश्न लिखे है:

कब यह सब महसूस किया था साथी जीवन में तुमने?
प्यार प्रकृति का पाकर कब जीवन धन्य किया तुमने?

सुबह सवेरे मुर्गे की कब बांग सुनी थी? बचपन में?
चहकती चिड़िया को सुनकर कब महक उठे थे मधुबन में?
बना ही रहता बड़ी देर तक मुह में कड़वापन सारा,
ऐसे बता कब होंठ तले दातुन दबाया था तुमने?

तृप्त हुआ कब चक्की के आटे की वह रोटी खाकर?
या फिर घर के पिछवाड़े की ताज़ी सब्जियाँ बनवाकर?
आज जो कुछ खाया उसको बोते, उगते, बढते देखा?
या फसलों को काटके ले जाते कब देखा था तुमने?

कब देखा था आसमान उस रात निराला – तारों भरा?
या देखा ढलते सूरज को? लहलहाता घास हरा?
चाँद चौदवीं का वह देख के साथ लिए और पहला प्यार
पार चलें इस दुनिया के कब ऐसा सोचा था तुमने?

छैल छबीले यारों के संग उड़ता होली का वह रंग,
या हो दीवाली की खुशियों में जब पुरे परिवारका संग,
कभी अष्टमी, ईद कभी तो, सारे मनाये मिलजुल कर,
कौन सा धर्म है, क्या है जाति, कब ऐसा पूछा तुमने?

आज प्रदुषण फैलाता है, और शांति का भंग करे,
औद्योगिक कचरे फैलाकर, वनसंपति का नाश करे,
और अस्तित्व के संघर्ष में तु नैतिकता को भूल चूका,
जनसंख्या विस्फोट का क्या होगा अंजाम सोचा तुमने?

आज पर्यावरण दिन पर इस जनविस्फोट के प्रदुषण की भौतिक सुविधाओं को तुष्ट के बजाए आबादी को नियंत्रित करने का संकल्प करें और आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण की छाया का सुख प्रदान करें.

‘आबोहवा’ बदल गयी हैं ! ( The ‘Climate’ is ‘changing’ )

आसमान के सीने को चीरता हुआ
यह धुंआ उसके फेफड़ों को तड़पा रहा हैं
दम इंसान का घुट रहा हैं
हमारी बढती बेचैनी और
घबराहट कि वजह यही तो नहीं

धरती कि धमनियों मे
मिला दिया किसने
प्रदूषित जल ये
उसकी रक्त शिराओं से
अब विष के झरने फुट रहे

फिजां कि बाहों में
अनगिनत जहरीलें ‘वायु’
आज घुल रहे
के हवा भी ‘रंग बदलने’ लगी हैं

ऋतू चक्र को किसकी नज़र लग गयी
मौसम भी इंसानों कि तरह हो गया हैं
बारिश में अब ‘बरसात’ नहीं होती
और ‘गर्मी’ के दिन
‘आये दिन’ होते हैं

‘कलंकित’ सारा परिमंडल हैं
शोर चारों तरफ हैं
‘विकास’ कि ‘जद्दोजेहद’ में
‘जिंदगी’ दांव पर हैं
‘मशीनी जिंदगी’ में
‘इंसानी’ ‘कल-पुर्जे’ हैं
‘जिंदा’ लाशों के ‘जंगल’ में
अब ‘कुदरत ‘ भी ‘दम ‘ तोड़ रही हैं
देख के ‘इंसान’ कि ‘फितरत’ को
अब ‘मौसम’ बदल रहा हैं
‘मौसम’ अब ‘बदल’ गया है
और
‘आबोहवा’ बदल गयी हैं

‘Hamaara Paryaavaran- Hamaara Jeewan’

Hare Ped
Shuddh Jal Vaayu
Paawan Van-Upvan
Inse Hain Banaa
Prakriti ka Santulan

Karo Inkaa Jatan
To Rahe Prasann
Chitt Apna Aur,
Pavitra Mann
Sadaa Rahe Prafullit
Yah Sundar Paryaavaran

Ye Hi To Hain Srot
Prerna Aur Utprerna Ka
Bal Ka Saadhan
Jeene Ka Sansaadhan
Urjaa Apne Kartavya Ki,
Aur
Apne ‘Jeewan’ ka
‘Jeewan’

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‘हमारा पर्यावरण – हमारा जीवन’

हरे पेड
शुद्ध जल वायु
पावन वन-उपवन
इनसे हैं बना
प्रकृति का संतुलन

करो इनका जतन
तो रहे प्रसन्न
‘चित’ अपना और
पवित्र मन ,
सदा रहे प्रफुल्लित
यह सुंदर पर्यावरण

ये ही तो हैं
स्रोत प्रेरणा और
उत्प्रेरणा का ,
बल का साधन ,
जीने का संसाधन
उर्जा अपने कर्त्तव्य की
और
अपने ‘जीवन’ का
‘जीवन’

Happy 5 th Birthday …

Thanks to my friend Pamir Harvey whose similar activity for his blog inspired me that I should also take care of my own blog, while I do other activity and contributions to other blogs.

So here is wishing my dear blog ‘SAMAJ SHILPI’ (‘the Social Architect’) a very very HAPPY BIRTHDAY today.

It was through a conscious thought process that the date ‘5 th June’ was selected to launch this lovely creative blog.
As today 5 th also happens to be the ‘World Environment day’ every year.

To bring ‘environmental awareness’ is one of the core objective of this blog.

On this occasion today I wish to thank my founding members’ friends Ashish Tilak, Bharat Bhatt and my younger daughter Ashwini for their constant support and encouragement to me.
While Ashwini has also been the major contributor for her posts since she was studying in Std VII th, and to some extent could not devote much time due to her board exams since last year. (Though in between she contribute some posts)
As her exams are over I hope her posts would be coming regularly now.

Back to ‘Samajshilpi’,
He will continue to fight for the ‘right’ and to bring ‘positive change’ in the society.

Many things happen regularly around us that shake up our conscience and the current socio-political scenario had posed many serious threats for all the human beings who love peace and believe in ‘live and let live’. Crime against women and children are continuing as if there is no fear of ‘law’ for those who commit these crimes and carry on anti social activities. Corruption has damaged the total social fabric and everything seems to be ‘fixed’ in favor of the ‘wrong’.

“We continue to tolerate the ‘wrong’ at the cost of the ‘right’, (that is what my favorite writer/poet Gulzar saab express recently speaking on the occasion of the release of the 3 rd edition of his ‘dyodhi’. )

Samajshilpi, is closely watching them all, observing them & feeling them all. He do feel ‘sad’ and ‘helpless’ at times, but then the hope for the ‘positive change’ keeps him ‘optimistic’ and motivates to carry his role further ….

Wishing all readers and well wishers of this blog very happy ‘Environment day’ today, I leave all of your with the following thought provoking ‘tweet’ shared recently by my another good friend Raja Swaminathan –

“The day people respect facts more than opinion, we will become a more objective society, and the media could help by leading”