The Waste Bin (From Garbage to Creativity…)

About a year back when I was in Mumbai and get a chance to travel through the ‘Meru-Cabs’, where in I find this ‘Self Discipline Instructions’ or we can say it  a ‘safe driving habits guidelines’ with the Driver.
These guidelines were available in a well laminated pamphlet inside the taxi.
I found it a very positive initiative (as I do not know how many other agencies or anyone other is also following this practice) on the part of the Travel Agency and hence noted these instructions.
They are good enough for all general public too, as it brings a sense of discipline, ownership, and also promotes good manners and etiquettes.
I am Happy to share this and hope we as an responsible individuals can also get this and put inside our vehicle to make us feel cheerful and attentive all the time and these ‘self discipline principles’ will keep acting as a gentle reminder for self controlling our behavior too.
1)    I WILL DRIVE CAREFULLY.
2)    I WILL NOT DRINK AND DRIVE..
3)    I WILL DRIVE WITHIN SPEED LIMITS…
4)    I WILL BE ALERT AT ALL TIMES….
5)    I WILL KEEP MY CAR CLEAN AND TIDY …..
6)    I WILL BE WELL GROOMED ……
7)    I WILL NOT SMOKE AND CHEW PAN /GUTKHA INSIDE MY CAR

The last point is regarding the hire charges, which I have given below;

1)    I WILL CHARGE THE CUSTOMER AS PER METER

Instead we can include – ‘I will be Honest and Integrated’…!!!

Do share with more peoples as possible!!!

कूड़ा – करकट (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनाओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं या यूं कहिये की बिगाड़ती है और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.
सार्वजनिक सुविधाओं को ज्यादा से ज्यादा खराब करना, उनका दुरुपयोग करना यह तो हमारे लिए आम बात है ही, ऊपर से फिर हर चीज़ के लिए प्रशासन को दोष देकर उसे कोसते रहते हैं .
शिष्टाचार या सभ्यता की बातें करें तो अभी कुछ उदहारण मैं यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, ये किस्से हमें सोचने पर मजबूर करते हैं की आखिर हमने कौनसा विकास किया है, कितनी प्रगति की है, और हम जा कहाँ रहे हैं? इंसानियत और सभ्यता का कैसा मापदण्ड हम स्थापित करना चाहते हैं,
‘एस टी बस में सफर करते हुए अक्सर मैं खिडकी के पास बैठना पसंद करता हूँ की जिससे हवा का आनंद भी लिया जाये और निसर्ग की सुंदरता का भी निरिक्षण किया जा सके. लेकिन सोचिये के आप आनंद यात्रा का लुत्फ़ उठा रहे हैं, और अचानक आपके चेहरे पर ‘थूक’ के छीटे आ जाये? या कोई ‘पान’ चबाकर खिडकी से ‘पान’ की पीक दे मारे और तेज चलनेवाली , बदन को सुकून देनेवाली सुहानी हवा उसे आपके कपड़ो के साथ साथ चेहरे पर भी बिखेरती हुए जाये तो?, या फिर सामने की सीट पर बैठा हुआ मुसाफिर बिना सोचे समझे चलती गाडी में बहार झांक कर उलटी कर दे और वह सब हवा के झोंके के साथ आपके ऊपर आ जाये तो?
तो?, तो समझ लीजिए के यही ‘भारत’ हैं, और आज़ादी के ६५ सालों में हमने यही विकास किया है,
कि हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता. ‘नागरिक-भावना’ या कहिये कि ‘सिविक-सेन्स’ अभी पर्याप्त रूप से विकसित नही हुआ है.