आया मौसम ‘सीसीटीवी’ का …

कूड़ा – करकट
(हमारे समाज का आइना)

… आया मौसम ‘सीसीटीवी’ का …

दोस्तों, यह लेख मैंने कई महीनों पहले लिखा था जब बार बार ‘सीसीटीवी’ कि चर्चा कुछ न कुछ बहाने से सुर्ख़ियों में थी. फिर कुछ कारणवश मैं इसे पोस्ट नहीं कर पाया.
तब ऐसी घटना घटी थी जब एक इंसान ने खुदकशी कि और वक्त रहते अगर सुरक्षा कर्मी ‘सीसीटीवी’ कि ‘फूटेज’ कि निगरानी कर रहे होते तो शायद इस शख्स को बचाया भी जा सकता था.

यह लेख भी मैंने अपने तरीके से सरल भाषा में लिखा है ताकि सामान्य जनता पर या ‘आम –आदमी’ पर इससे कोई और अधिक ‘बोझ’ न बढे !! क्योंकि आम आदमी अपनी रोज़मर्रा कि जिंदगी से ही इतना थक जाता है कि उसके बाद के समय में वह कोई भी अतिरिक्त कार्य (चाहे वह देशहित में ही क्यों न हो, करने हा हौसला नहीं जुटा पता है).

अब देश में फिर से ‘सिसिटीवी’ का ‘मौसम’ उफान पर है. कई जगह ‘सीसीटीवी’ लगाए जा रहे है. कई जगहों पर लगाने का विचार हो रहा है – केंद्र स्तर पर- दिल्ली में- अलग अलग राज्यों में – जहाँ नयी सरकारें आयी है वहाँ पर, इत्यादि.
(इसका मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि ‘करोड़ों’ रुपयों का बजट इसके लिए आवंटित किया गया होगा, निविदाएँ मंगाई गयी होंगी, ठेके (?) दिए जा रहे होंगे या ठेकों कि नीलामी कि जा रही होंगी, या फिर ‘ऑन-लाइन’ प्रक्रिया चल रही होंगी. हम चाहे तो कुछ भी कयास लगा सकते है)

हमने ऐसा भी देखा है कि कभी-कभी ‘सीसीटीवी’ का जिक्र होता है तो आँखों के सामने एक नाकाम ‘कैमरे’ कि तस्वीर उभर आती है. क्योंकि हर समय यही सुनने को मिलता है कि ‘सीसीटीवी’ तो लगा हुआ था पर वह काम नहीं कर रहा था! तो क्या सीसीटीवी को भी ऑफिस-ऑफिस जैसी कोई बीमारी लग गयी है कि वह कुछ लेन-देन के बाद ही काम करेगा. या फिर हमने हजारों – लाखों रुपये खर्च कर इन कैमरों को लगवाया ही क्यों है?
इस सीसीटीवी को मुए को शर्म भी नहीं आती है, लोग जान से चले जाते है, पर यह हिलता ही नहीं है, देश कि सुरक्षा तक खतरे मे पड़ जाती है आम आदमी कि तो बात ही क्या?
और हम केवल सीसीटीवी के भरोसे है, अगर कोई इसे जान-बूझकर’ चलने नहीं देता है तो भी इसे अपने आप कभी कभार एक चमत्कार के रूप में काम करने में क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि इसमें कैद हुई तस्वीरों से ही तो हमें कुछ सुराग मिलेंगे वर्ना दिखावे के लिए तो हमारी पुलिस झूठ-मूठ कुछ तो छापेमारी करेगी ही,
वैसे भी पहले जब सीसीटीवी नहीं था तो क्या मामले सुलझते ही नहीं थे, हाँ यह अलग बात है कि ज्यादातर मामलों में बाहरी ताकतों के होने का तर्क दिया जाता था और अगर कोई गुनाहगार पकड़ा भी जाए तो क्या? कानून के ढीले ढाले पेंच उसकी सलामती के कई रास्ते अपने आप खोल देते है ताकि गुनाह करनेवालों के हौंसले और बुलंद हो और वो संगीन से संगीन अपराध करने कि हिमाकत कर सके, इसी का नाम तो भारतीय लोकतंत्र है, और ‘टालरेंस’ भी हमारा गज़ब का है , हर चीज बर्दाश्त कर लेते है…
हाँ हाँ , वही… सहिष्णुता , फर्गिवेनेस .. क्षमा.. ‘क्षमादान सबसे ऊपर है’,
यह सब सब कहते सुनते ही तो हमने गांधीजी के ‘तीन बंदरों’ को अपनी नाकामी कि ढाल बना दिया है, कैसे? ..
ऐसे जनाब- हर गुनाह से , सामाजिक बुराइयों से हमने आँख मूंद ली है- चाहे हमारे सामने कितना भी बुरा घटित हो रहा हो- ‘ हम कुछ देखते ही नहीं है’- मैंने देखा नहीं’ ,
विकास और वैश्वीकरण के शोर मे किसी कि चीख पुकार भी हमें सुनाई नहीं देती है- मैंने सुना नहीं’, और अन्याय चाहे कितना भी हो रहा हो, हमारे में अब बोलने कि हिम्मत रही ही नहीं – सब चलता है, अपने बाप का क्या जाता है, मजबूरी का नाम … हम है- जी हाँ – एक आम भारतीय आदमी, किसी और का नाम बदनाम करने से क्या फायदा?,
तो यह है हमारा तीसरा पहलु- ‘मैंने बोला नहीं’

तो फिर से ‘सीसीटीवी’ कि कार्य प्रणाली पर लौटते है. सरकार ने जहां भी जनता का पैसा खर्च कर ये
‘सीसीटीवी’ लगाए हैं , जहां ये बंद पड़े हैं – उन्हें चालु कराया जाय, जहां चल रहे है वहाँ पर इनकी फूटेज कि निगरानी करने वालों को सतर्क किया जाए, क्योंकि कब कहाँ क्या होगा इसका अनुमान लगाया नहीं जा सकता इसलिए सतर्कता जरुरी है. और जिनके जिम्मे इसका पूरा कार्यभार है वहाँ पर जवाबदेही तय कर इसकी कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाया जाए और इसको सख्ती से लागू किया जाए.
लेखक कि प्रार्थना है कि सरकार लगाए गए ‘सीसीटीवी’ कि ‘कार्यप्रणाली’ निश्चित करें ताकि जनता को और सभी को इसका लाभ मिल सके. सभी जगहों पर ये सीसीटीवी बिना रुकावट के चलते रहे और कानून कि मदद करते रहे. और इन सीसीटीवी को लगाने पर जो ‘जनता’ का ‘पैसा’ लगाया गया है उसका लाभ ‘राष्ट्र’ को और ‘जनता’ को मिले. जान हानि को बचाया जाए, राष्ट्र और राष्ट्रीय राष्ट्रीय संपत्ति कि रक्षा कि जा सके.
और जनता भी अपनी जागरूकता से इन ‘सीसीटीवी’ कि रक्षा करे ताकि कोई असामाजिक तत्त्व इनको नुक्सान न पंहुचा सके और ‘राष्ट्रीय-संपत्ति’ कि हानि को टाला जा सके.

(नोट – सुर्ख़ियों में है कि कुछ जगहों पर ‘एल-ई-डी’ ‘बल्ब’ लगाने या बदलने के कार्य में भी कुछ अनियमितताएं पायी गयी है … जय हो !!)

नो स्मोकिंग प्लीज़..

This post is by Apeksha and is re-blogged from http://Nai-aash.in

जिस बेशर्मी से तुने सिगरेट उठाई,
ऐसा लगा जैसे खुद अपनी चिता जलाई।

तुझे क्या लगा? जो हवा में गया वो धुँआ है?
वो तो तेरी रूह ने टुकडो में ली तेरे जिस्म से बिदाई।

बड़ा सरल सा भविष्य है: फेफड़े का केन्सर!
पहले रोग को लगाने मे, फिर उसे मिटाने मे पूंजी उड़ाई।

ज़रा सोच के देख, अपनी पत्नी को बिधवा,
और बच्चे? उनकी खुशियों मे क्यों आग लगाई?

पर भूली मैं, तुझे खुद अपनी ही पड़ी नहीं है!
तूँ भला क्यों मिटाएगा बूढ़े माँ बाप की तन्हाई?

छोड़ दे सिगरेट और बचा ले अपनी बिखरती दुनिया,
बटोर ले वो जिंदगी जो तुने अब तक गँवाई।

(Link to the original post is http://nai-aash.in/2011/04/20/no-smoking-please/ )

मंथन जारी हैं …

एक महीने का समय गुज़र गया . . . . .

कहने का तात्पर्य यह है कि इस ‘ब्लॉग’ पर पिछला लेख ठीक एक महीने पहले १४ अगस्त को प्रकाशित हुआ था.
ऐसा नहीं है कि इस महीने भर में कोई घटना ऐसी नहीं हुयी जिसने ‘समाज-शिल्पी’ को नहीं छुआ हो या ‘आहत’ न किया हो.
और जिस ब्लॉग का उद्देश्य ही समाज कि ‘नव-रचना’ करने में योगदान देना हो, उसे तो हर रोज ही अपने आस-पास कि घटनाओं के बारे में या जिन मुद्दों ने उसे छुआ हो उसके बारे में टिपण्णी ज़रूर करनी चाहिए.
लेकिन कभी कभी लेखन प्रक्रिया में ऐसे पड़ाव आते हैं जब एक रचना से दूसरी रचना के बीच में कुछ अंतर आ जाता है.
अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल कर प्रकाशित नहीं कर पाने का दुःख तो है ही, मगर जो अच्छी-बुरी घटनाएं इस दौर में हुयी, उसने ‘विचारों’ कि प्रक्रिया को जारी रखा और ‘मंथन’ करने पर समय समय पर मजबूर किया.
इस लेख में हम मुख्य रूप से उन् सभी घटनाओंका जिक्र करेंगे, और आनेवाले लेखों में उन्ही मुद्दों का तार पकड़कर विस्तार से चर्चा करेंगे और नए मुद्दों को भी छुएंगे.

सबसे पहले तो बात हमारी बढती ‘संवेदनहीनता’ कि. दिल्ली में फिर हमारे गिरते मानवीय मूल्य और समाज में ‘गहरी पैठ’ बना चुकी ‘नपुंसकता’ का उदाहरण देखने को मिला जहां एक जख्मी को बीच बाजार में लोगों ने पानी नहीं पिलाया और उस इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘बलात्कार’ कि घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी और ‘गुंडे-बदमाश’ लगभग हर राज्य में ‘कानून’ कि धज्जियां उड़ाते फिर रहे है.
कुल मिलाकर नयी सरकार को अभी तक तो ‘क़ानून का राज्य’ स्थापित करने में उतनी सफलता नहीं मिली हैं जितनी उम्मीदें जनता को ‘सत्ता परिवर्तन’ के होने बाद इस नयी सरकार से थी.
‘क़ानून व्यवस्था’ के मामले तो लगता है कि जैसे अभी भी ‘युपीए’ का ही शासन चल रहा है.
और तो और जिन अपराधियों कों फांसी कि सज़ा दी जाती है पता नहीं क्यों उनकी फांसी कों बार बार मुल्तवी किया जाता है?

जहाँ प्रधानमंत्री के विदेश दौरों ने हमारे देश कि गरिमा बढ़ाई और यह सन्देश भी जाते दिखा कि हमारा देश भी दूसरे देश से ‘आँख से आँख’ मिलाकर ही चलेगा.
प्रधानमंत्री के जापान दौरे के समय जब ‘स्मार्ट सिटी’ कि बात चली तो नयी आशाएँ जगी, लेकिन जिस रस्ते पर मैं हर रोज सफर करता हूँ उस ‘एन एच – ८ ए एक्सटेंशन’ और एस एच -४६ पर हर रोज बीच सड़क पर बैठा ‘मवेशियों’ का ‘झुंड’ इस बात कि याद दिलाता रहता है कि अभी तो ‘मंजिल’ दूर ही नहीं बहुत बहुत दूर है.
अभी तो राज्य परिवहन कि बस में सफर करते समय जब चालक कों अपनी गाडी बीच सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण ‘आडी-तिरछी’ करनी पड़ती है तो लगता है कि देश कि स्थिति भी ऐसी ही है, कहीं बहुत ज्यादा विकास हैं तो कहीं कुछ भी नहीं. और विकास अगर हुआ भी हैं तो उसका समतोल बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ रखा नहीं गया.
तभी तो वड़ोदरा जैसे शहर में लग-भग हर साल बाढ़ आती है और रिहायशी इलाकों में पानी भर जाता है.
सबसे दुखद त्रासदी ‘जम्मू-कश्मीर’ में आयी बाढ़ है, जहाँ का हाल समाचारों में देख-सुनकर कलेजा मुंह कों आता है.
इस त्रासदी से जहाँ हमारी ‘आपदा प्रबंधन प्रणाली’ कि खामियां सामने आयी, वहीँ ‘विकास’ कि दौड में प्रदुषण के खतरे और उसके दुष्परिणामों कों भांपने में हमारी नाकामयाबी का भी पता चलता है.
हर चीज़ पर ‘बाजारीकरण’ के बढते प्रभाव और पैसे कमाने कि होड में भागती दुनिया का सच हमारे सामने आता है.
विकास कि चकाचौंध में हम मानवीय मूल्य और इंसानी जिंदगी के साथ ही सौदा कर बैठे है. और हम लोगों कि जिंदगी इसीलिए हर समय ‘दांव’ पर है.
वर्षों से चली आ रही हमारी सोच के ‘अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘सरकार से हमें क्या लेना देना’, ‘सब चलता है’ ने ही हमें आज इस मकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ ‘प्रशासन’ हमारा ‘अपना’ नहीं बन सका और हम ‘जनता’ प्रशासन के लिए केवल वोट देनेवाली मशीन बन कर रह गए.
जम्मू-कश्मीर कि बाढ़ के कुछ समाचारों में हाल ही में कुछ व्यक्ति प्रधानमंत्री श्री.मोदी जी कों कोसते हुए दिखाए गए. क्या यह सही है?
भाई, इतने सालों से जिन लोगो ने तुम्हारे ऊपर ‘राज’ किया है, कुछ उनसे भी तो पूछो. मोदी जी कों आये तो अभी तीन महीने ही हुए है. फिर भी उन्होंने वो किया जो दस सालों में तुम्हारी चुनी हुई सरकार नहीं कर पायी.
और तो और जब घाटी में सारे नियम क़ानून ताक पर रखकर अंधाधुन्द निर्माण हुआ तब आप क्यों तमाशा देखते रहे? आपने क्यों नहीं मुलभुत सुविधाओं के निर्माण के लिए अपने आवाज़ बुलंद कि?
हाँ, एक बात ज़रूर सरकार कों (चुनाव आयोग से सिफारिश कर ) करनी चाहिए थी कि ‘उप-चुनावोंको’ कुछ समय बाद कराया जाता तो अच्छा होता.
इस बीच देश के कई हिस्सों में बदलते ‘मौसम’ का मिजाज़ पता चला और ‘पर्यावरण’ में होते बदलावों का भी एहसास हुआ. कहीं भयंकर गर्मी रही, तो कहीं बाढ़ और कहीं एकदम सूखा.
इससे हम को सबक लेकर अभी से चेतने कि जरूरत हैं.
और जो मैं इससे पहले भी कहता आया हूँ कि ‘हमारे बाप का कुछ गया हो या नहीं’ मगर ‘हमारे बच्चों का और आनेवाली पीढ़ियों’ का बहुत कुछ ‘दांव’ पर है…

इस दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि पहले तो हम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंटे हुए थे, मगर आज ‘ट्विटर’ का भारत अलग है, ‘फेसबुक’ का भारत अलग है, अंग्रेजी और हिंदी समाचार पत्र पढ़ने वालों का अपना भारत है. ‘व्हाट्स-एप’ का भारत इन सबका मिश्रण है और टीवी चेनलों कि प्राथमिकताएं ‘टीआरपी’ और अलग अलग ‘ब्रांडों’ के प्रायोजक है, या फिर ‘क्रिकेट’ है.
‘क्रिकेटरों’ कों हमारे देश में इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि उनके सामने देश पर मर मिटनेवाले शहीदों कों भी इतना सम्मान नहीं दिया जाता.
अपने आप कों ‘न.१’ कहने का दावा करनेवाले समाचार चेनल पर तो क्रिकेट के लिए विशेष समय (आधा घंटा) दिया जाता है. जब देश इतनी समस्याओं से घिरा हो तो क्रिकेट कि बात तो होनी भी नहीं चाहिए, या फिर सभी खेलों कों उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए. क्रिकेट कि हार जीत पर भी न तो ज्यादा हंगामा होना चाहिए और न ही ज्यादा उत्तेजना होनी चाहिए. क्योंकि हर क्रिकेट खेलनेवाले देश का फ़र्ज़ है कि जीत ने के लिए खेलना और खेल का अविभाज्य अंग है ‘हार’ या ‘जीत’ इसीलिए न तो क्रिकेट में एक हार पर दुनिया भर का गम लूटाने कि ज़रूरत है और न ही जीत पर क्रिकेट के खिलाड़ियों कों ज़रूरत से ज्यादा सर पर उठाने कि ज़रूरत है.

और सबसे सुखद रहा दस दिनों तक चला ‘गणेशोत्सव’, ‘बाप्पा’ आते हैं तो अपने साथ कई यादें भी लेकर आते हैं. ‘गणेश उत्सव’ कि वो यादें जो मेरे बचपन से जुडी है. हो सकता है कि आनेवाले दिनों में मैं अपना पहला ‘मराठी’ लेख (जो कि १९८० के बाद आएगा) ‘गणपति-बाप्पा’ कि यादों के साथ ही लिखूं.

Deewaaron Ka Jungle – 3 – Gulzar

(Deewaaron ka Jungle – III)

Deewaron ka Jungle – I, Deewaaron ka Jungle – II

(Though the posts under this series ‘Deewaaron Ka Jungle’ are delayed posts, the issue discussed is still as much relevant to our society, social life and for ‘we the people of India’.
And it will be of utmost importance in the coming years too, till we rise as ‘one soul-one nation’.

So continuing with the balance posts in this series and sharing my thoughts with you…)

Moving to the 3rd part of this article, just to share – ‘when we watch these great peoples speaking about such social issues, listening to them is like an altogether different experience,

‘us ek ghante mein ham ek umr jee letein hain’,

‘Kitni gehraayee hoti hain unki baton, lagta hain poore jeewan ka anubhav samet liya hain un kuchh palon mein’.

And, when the person speaking, on such sensitive issue is none other than Gulzar Saab that is sure to happen. (Watching him and listening him … these lines repeatedly come to my mind – Vaishnav jan to tene kahiye je peed parayee jaane re….

It has been exactly a year now… (And coming to full circle of this thought process I had gone through)..
9 th March 2013 Gulzar Saab was speaking on the occasion of release of the ‘third’ edition of his ‘Dyodhi’ (on ABP Majha)

As the basis of this series of articles is a poem from one of the greatest ‘social’ poet or rather the ‘Peoples Poet’ of our country Sahir Saab, I thought it more appropriate to combine it with thoughts of another great poet Gulzar Saab.

In this conversation he speaks on various issues affecting our social existence. When he was asked ‘how do you feel about the current issues in our society?’
(Link of this is available here)

Gulzar Saab on release of 3rd edition of ‘Dyodhi’

‘Geetkar ki baat ham alaahida rakhe, lekjn shaayar ko kaisa lagta hain aaj ka vaastav, jo iird gird uske mandra rahaa hain wo yatharth wo jo reality dekh rahaa hain shaayar usko kaisa lagta hain

Use chotein lag rahi hain,
Ji
Chotein lag rahi hain

Main yun kahoon,
Thode thodese ehsaas hain jaise

Kaagaz par girte hi phutee hain labz kayee, (maaf kijiyega, main kavita par aa gaya)
Kaagaz par girte hi phutate hain labz kayee
Kuchh dhuaan uthha, chingaariyaan kuchh, ek nazm ko phir se aag lagi,
Kaagaz par girte hi phutate hain labz kayee
Kuchh dhuaan uthha, chingaariyaan kuchh, ek nazm ko phir se aag lagi
Jalte shehar mein baithha shaayar isse zyada kare bhi kya, lafzon se aag nahin bujhti,
Nazmon se jakhm nahin bharte(ye, yoon mahsus karta hain kavi). Aapke chaaron taraf dekhte hue, to bebasi to hain, kabhi use bayaan kar letein hain jo ho raha hain…

Baat kahin khalti to hain andar jaake; par aap kya karenge;

Main cigarette to nahin peeta hoon, magar aanewaale se main itna pooch leta hoon ke maachis hain?
Main cigarette to nahin peeta magar aannewaale se bas itna poonchh leta hoon ke maachis hain?
Bahot kuchh hain jise main phoonk dena chaahta hoon,
Magar himmat nahin hoti…..meri himmat nahin hoti

How long can we remain isolated from the society? How long can we ignore the social circumstances?

What other Gulzar Saab said in this talk is summarized in the following points;

We need to be social conscious!
Cinema cannot bring revolution!!
It is a recorder and reminder!
On women issues he says;
We do not respect children and women in society.
We are callous!
We continue to tolerate the ‘wrong’ at the cost of ‘right’, we continue to tolerate!

बेबस को दोषी ठहराए
इस जंगल का न्याय
सच की लाश पे कोई न रोये
झूठ को सीस नवाए
पत्थर की इन दीवारों में
पत्थर हो गए राम
बाहर से चुप-चुप लगता हैं
अंदर हैं कोहराम
दीवारों का जंगल जिसका
आबादी हैं नाम

We do not revolt, and if at all it is only little crawling here and there, so the overall view seems to be ‘all is well’, collective revolt to shake up overall is necessary!

(Note: I had earlier read about Gulzar Saab’s ‘Dyodhi’, but this book was not available at the leading ‘online’ store.
Before concluding this post I thought it would be better if I get it and finally on searching I got the publishers website and get this book directly from them.

Now ‘Dyodhi’ is with me …)

(To …… Deewaaron ka Jungle – IV)

The Waste Bin (From Garbage to Creativity…)

About a year back when I was in Mumbai and get a chance to travel through the ‘Meru-Cabs’, where in I find this ‘Self Discipline Instructions’ or we can say it  a ‘safe driving habits guidelines’ with the Driver.
These guidelines were available in a well laminated pamphlet inside the taxi.
I found it a very positive initiative (as I do not know how many other agencies or anyone other is also following this practice) on the part of the Travel Agency and hence noted these instructions.
They are good enough for all general public too, as it brings a sense of discipline, ownership, and also promotes good manners and etiquettes.
I am Happy to share this and hope we as an responsible individuals can also get this and put inside our vehicle to make us feel cheerful and attentive all the time and these ‘self discipline principles’ will keep acting as a gentle reminder for self controlling our behavior too.
1)    I WILL DRIVE CAREFULLY.
2)    I WILL NOT DRINK AND DRIVE..
3)    I WILL DRIVE WITHIN SPEED LIMITS…
4)    I WILL BE ALERT AT ALL TIMES….
5)    I WILL KEEP MY CAR CLEAN AND TIDY …..
6)    I WILL BE WELL GROOMED ……
7)    I WILL NOT SMOKE AND CHEW PAN /GUTKHA INSIDE MY CAR

The last point is regarding the hire charges, which I have given below;

1)    I WILL CHARGE THE CUSTOMER AS PER METER

Instead we can include – ‘I will be Honest and Integrated’…!!!

Do share with more peoples as possible!!!

कूड़ा – करकट – २ (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं (या यूं कहिये की बिगाड़ती है), और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.

हमें आज़ाद हुए ६६ वर्ष हो चुके है … लेकिन ‘नागरिकिय-संवेदनशीलता’ (‘सिविक-सेन्स’) अभी पर्याप्त रूप से हमारे बीच विकसित नही हुयी है. इसके कई उदाहरण हमारी रोज़मर्रा कि जिंदगी में हमें मिलते रहते हैं. वर्षों पुरानी सभ्यता होने के बावजूद हमारे समाज में धीरे धीरे मानवीय मूल्यों का र्हास होता गया, और अकर्मण्यता बढती गयी, देश और सामाजिक मूल्यों के प्रति नीरसता बढती गयी और सार्वजनिक जीवन में निष्क्रियता बढती गयी जिसका परिणाम हैं कि आज हमारे देश में ‘मानवीय और सामाजिक संवेदनहीनता’ चरम पर है. हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता.

यहाँ ये भी समझना ज़रूरी हैं कि सब कुछ ‘तंत्र’ के भरोसे छोड़ेंगे तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. हमें भी कुछ जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और सामाजिक कार्यों में मिल जुलकर सहभाग करना पड़ेगा.

इस श्रृंखला के पहले लेख में मैंने ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रक्षा तथा रख-रखाव कि बात की थी. आज के लेख में हम सार्वजनिक जगहों पर जारी ‘धूम्रपान’ के बारे में बात करेंगे. किसी न किसी कारणवश मेरी रेल या बस कि यात्रा होती ही है. वैसे हर रोज ४ या ५ घंटे का बस का सफर तो है ही. इसमें मैंने देखा कि लोग जिनमे युवा भी हैं, बुज़ुर्ग भी हैं सभी धडल्ले से धूम्रपान करते हैं और ऐसा करते समय इतना सौजन्य भी नहीं दिखाते कि पड़ोस में बैठे शख्स से पूंछ तो लें. कभी कभी लोग अपनी माँ, बेटी-बेटे, बहन, या पत्नी, और छोटे छोटे बच्चों के होने के बावजूद भी उनकी मौजूदगी में ही या उन्हें गोद में बिठा कर भी धूम्रपान करते हैं. यह करते हुए वे खुद अपने ही बच्चों कि सेहत से जाने-अनजाने खिलवाड़ कर रहे हैं. हालांकि, सरकार ने सन २००८ में इससे सम्बंधित नियम जारी किये थे जो कि ०२.१०.२००८ से ‘Prohibition of Smoking in Public Places Rules, 2008 and COTPA’ के नाम से जारी हुए थे. (इसे आप यहाँ पर विस्तार से पढ़ सकते हैं) इस नियम मार्गदर्शिका के अनुसार सभी सार्वजनिक जगहों पर जैसे कि , प्रेक्षागृह, सिनेमा घर, अस्पताल, सभी प्रकार कि सार्वजनिक यातायात सुविधाएं तथा उनसे सम्बंधित सुविधाएं (जैसे कि बस और बस स्थानक) और शोपिंग मॉल, शैक्षणिक संकुल तथा उसके आस-पास का परिसर इत्यादि जगहों पर धूम्रपान मना हैं. लेकिन लोगों में जानकारी के अभाव के कारण और दृढ़ इच्छाशक्ति न होने कि वजह से सब इसे बर्दाश्त कर रहे हैं. व्यक्तिगत स्तर पर मैं कोशिश करता हूँ और लोगों से आग्रह भी करता हूँ कि वे ऐसी जगहों पर धूम्रपान न करें, आप सभी अपने माध्यम से लोगों कों इस बारे में जागृत करें और उन्हें प्रेरित करें ताकि हम समाज में सामंजस्य बनाएँ रखे और साथ ही एक सभ्य समाज का निर्माण कर अपने ‘नागरिक कर्तव्यों’ का पालन करें, सामाजिक शिष्टाचार का पालन भी करें.

(इस लेख को भी पढ़ सकते हैं )