इक ऋतू आये , इक ऋतू जाए …

मेरे अब तक के जीवन में शायद पहली बार ऐसा हुआ के सूखे कि आशंका से मैं काँप उठा. इससे पहले भी कभी बारिश कम हुई होगी या सूखा या अकाल पड़ा होगा, लेकिन तब भी मैं जिन जिन जगहों रहता पर था वहाँ पर बारिश ज़रूर हुई थी.
यह अलग बात हैं कि बारिश कम हुई होगी, और जब ज़रूरत थी तब नहीं होकर आगे पीछे हुई होगी. लेकिन बारिश होती थी. भयंकर गर्मी और तपिश के बाद बारिश ज़रूर होती थी !
लेकिन इस बार महसूस हो रहा हैं के हालात कितने खराब हैं.
एक दिन पहले बिलकुल ‘साफ़’ आसमान देखकर अचानक मेरा मन घबरा गया. बादलों का कोई नामोनिशान नहीं था. एकदम साफ़ आसमान!
क्या सचमुच बारिश नहीं होगी?

‘प्यासी बंजर धरती
किसका पेट भरे
भूखे प्यासे बच्चे
खेती कौन करे’

और गर्मी तो दिन ब दिन बढती ही जा रही है? कब इस तपिश से हमें राहत मिलेगी?
कब सूखी-बंजर-बिखरती ज़मीन कों बारिश कि बूँदें अपने प्यार से नहला देंगी?
मैं हर रोज ‘टक-टकी’ लगाए आसमान कों देखता रहता हूँ कि बादल आये और ‘उमड़-घुमड़’ कर बरस जाएँ. और हमें कईं मुश्किलों से बचाएं !
हो सकता हैं आज जो कुछ बादल इकठ्ठा हो रहे हैं कल वे बरसेंगे ज़रूर…
और बरसात के बाद जब माहोल खुशनुमा हो जाएगा उसकी अनुभूति कों कौन भूल सकता हैं भला?

वैसे तो समय समय पर मैं अपनी कविताओं में ‘पर्यावरण परिवर्तन’ ( Climate Change ), प्रदुषण के दुष्परिणाम, बढते उद्योग – घटते संसाधन, ऋतू चक्र में परिवर्तन इत्यादि कि बातें करता आया हूँ.
लेकिन उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा. क्योंकि ‘प्रकृति’ अपना ‘समतोल’ बनाए रखती हैं और अभी तक यही एक ऐसा ‘चक्र’ था जिस पर विश्वास बना हुआ हैं और रहेगा.
पर इतना ज़रूर हैं कि अब आबोहवा बदल गयी हैं.

ऐसे में मुझे एक गीत कि ये पंक्तियाँ याद आयी ;

‘तक तक सूखे परबत
आँखें तरस गयीं
बादल तो न बरसे
आँखें बरस गयीं ‘ …
‘बरस बरस दुःख बढ़ता जाए’

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संयोग से आज ही अपने देश का आम बजट पेश हुआ. टीवी पर जोर शोर से बजट के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं चल रही हैं .
किसको कितना फायदा हुआ यह तो कुछ समय पश्चात ही पता चल पायेगा.
लेकिन देश स्वतंत्र होने के बाद से लेकर अब तक, कितने – मौसम बदले – मतलब कितने बजट पेश हुए. लेकिन क्या बजट में किये गए वादे पुरे हुए?
क्या गरीबों के जीवन में कुछ सुधार हुआ.
क्या बरस दर बरस ‘दुःख’ कम हुआ या बढ़ता ही गया?
हमारी ‘समस्याएं’ कम हुई ?
जिन लोगों ने देश कों आज़ाद होते हुए देखा या जो आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पैदा हुए थे, वे देश के हालात के बारें क्या राय रखते हैं? क्या, जो सपने उन्होंने देखें थे वो पुरे हुए?

क्या सचमुच मौसम बदला?
नसीब बदले?
या फिर …
‘प्यार न सीखा
नफरत करना सीख लिया
सब लोगों ने लड़ना मरना सीख लिया’
और अंत में हमें ये न कहना पड़ जाए कि ,
‘इक बजट आये, इक बजट जाए.. गरीबी मिटे ना ..
हाँ, मिट गए गरीब…’
(यहाँ पर ‘मुश्किलों’ का मतलब हमारी रोज़मर्रा कि समस्याएँ, और ‘रकीब’ हैं = हमारी ‘सिस्टम’या हमारी ‘व्यवस्था’…)

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खैर आप भी सत्तर के दशक के इस हृदयस्पर्शी गीत का आनंद उठाईये और महसूस कीजिये कि क्या बदला और क्या नहीं.
आदरणीय अतुल जी के ब्लॉग पर इस गीत कि ये कड़ी आपके लिए प्रस्तुत हैं !

इक ऋतू आये

आनंद बक्षी साहब के शब्दों को किशोर कुमार ने बहुत ही दिल से गाया हैं और इसे स्वरबद्ध किया हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’ जी ने !

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