सपनों का भारत !!!

सपनों का भारत हमारे
कैसा हो
कैसा हो
चारों तरफ खुशहाली हो
और लहराता तिरंगा हो !!

सपने जो सब देखे थे
वीर अमर शहीदों ने
भगत, बापू,सुभाष ने
और सारे भारतवासियों ने
पूरा कर उन सपनों कों
अपना फ़र्ज़ निभाना हो !! १ !!

बदलाव जो देश में आया है
मौका सुनहरा लाया है
जोश फिजाओं में नया है
मौका नहीं ये गंवाना हाँ
सबक पुरानी गलतियों से लेकर
एक नया भारत बनाना हो !! २ !!

भेद-भाव, लूट-पाट,
जात-पात,
जोर-ज़बरदस्ती और
फिरकापरस्ती कों,
पहचान लो गद्दारों कों
मिटा कर इन दुश्मनों कों
अत्याचारों को न सहना अब
नया सवेरा लाना हो !! ३ !!

सपनों का भारत हमारे
अब ऐसा ही हो के
चारों तरफ खुशहाली हो
और लहराता तिरंगा हो !!

 

Farmer Suicides in Gujarat – Facts

Background

Recently, Arvind Kejriwal (AAP) claimed that 5,874 farmers committed suicide in Gujarat in last 10 years. Whereas, the Gujarat government claims that only 1 farmer suicide in Gujarat was due to crop failure. The other suicides were not related to crop failures, and they were due other reasons such as family issues. The farmers do not show a greater tendency to commit suicide than the general population, particularly in Gujarat.  Let’s have a detailed look.

No. of farmers in Gujarat

There are 54.47 lakh cultivators and 68 lakh agricultural workers in Gujarat (2011 census). Hence,

Total no. As % of total population
Cultivators in Gujarat 5.447 million 9.0%
Cultivators + Agricultural laborers in Gujarat 5.447 + 6.8 million 20.3%

Farmer suicide statistics (as per Govt records)

NCRB classifies the suicides by employment categories. For Gujarat, the NCRB states that 564 people in the agricultural employment category committed suicide in 2012. 5,302 committed suicide during 2003-2012 (10-year period). 5,872 committed suicide during 2002-2012 (11-year period). Source: 1 2

Farmer suicides vs. non-farmer suicides

Source

 

State Farmer suicides as a % of total suicides
Maharashtra 23.50%
Andhra Pradesh 18.10%
Uttar Pradesh 16.80%
Karnataka 14.70%
Kerala 12.70%
Madhya Pradesh 12.00%
Assam 10.50%
Sikkim 10.50%
Haryana 9.80%
Jharkhand 9.00%
Bihar 9.00%
Arunachal Pradesh
Gujarat 7.90%

Conclusion

Despite being 9% of the total population of Gujarat, the farmers constitute only 7.9% of those who have committed suicide. This is assuming that NCRB has not counted farm laborers under the employment category “farming”. If that’s the case, the condition is even better: despite being 20% of the population, those involved in agriculture in Gujarat form only 7.9% of the people who committed suicide.

Thus, there is a good possibility that the Gujarat government’s claim is right.

Note: Some AAP supporters will try to use above data to claim that everyone, not just farmers, in Gujarat is committing suicide. For such people, here is a list of states/UTs with the highest suicide rates (suicide/population) in India (Source: NCRB)

 

State/UT Suicide rate (2012)
Puducherry 36.8
Sikkim 29.1
Tamil Nadu
Kerala 24.3
Andaman & Nicobar 23.6
Tripura 23
Chhattisgarh 22.9
Karnataka 21.2
Dadra & Nagar Haveli 17.6
Mizoram 17
Andhra Pradesh 16.6
West Bengal 16.5
Goa 15.8
Maharashtra 14
Madhya Pradesh 13.3
Daman & Diu 12.6
Odisha 12.2
Gujarat 11.8

This was posted on Reddit (could not find the exact link)

‘घोटालों’ का ‘नव-युग’ आया . . .

मन में उमड़ रहा
‘घोटालों’ का ‘गुबार’ हैं
आओ यारों गाएं हम
खुशी के गीत
झूमे गाकर अपना राग,
अपनी लय, अपनी ताल,
और अपना संगीत,

देश भी अपना
माल भी अपना
अपनी ही सरकार
अरे मौज उडाओं यारों
किस चीज़ कि है दरकार,

‘म न रे गा ‘ तू भ्रष्टाचार के गीत,
‘छेड़’ घपलों कि ‘तान’ तू
कभी होना न विचलित
‘शहरीकरण’ के इस दौर में,
क्यों रहे ‘स्वास्थ्य’ भी ‘ग्रामीण’
लूट तरंगे ‘टू-जी’ की तू
और बन जा ‘रंगीन’

काला रंग क्यों तुझे
अरे नहीं हैं भाता,
‘काला’ ‘कोयला’ ही तो हैं
सुख-समृद्धि लाता,
हैरान हैं ‘पशु-प्राणी’ बेचारे
क्यों ‘चारा’ खा गए ‘नेता’

‘खेल’ निराले, ‘ढंग’ निराले,
हैं ‘गेहूं-चावल’ में भी ‘घोटालें’

‘अंतरिक्ष’ और ‘देव-आवास’ (या अन्त्रिक्स-देवास?)
में भी हमारे ही चर्चें हैं
हमारी ‘कामन-वेल्थ’ पे तो
‘कुबेर’ भंडारी कि भी नज़रें हैं,
‘आदर्श’ हमारे घोटालें हैं
या ‘घोटालों के हम ‘आदर्श’ हैं ?
?
इस ‘प्रश्न-चिन्ह’ के साथ आपको
छोडना नहीं चाहते,
पर चाहकर भी ‘इतनी जल्दी’
किसी ‘कन्क्लूजन’ पे,
हम पहुंचना नहीं चाहते,

हेलिकॉप्टर आया
हेलिकॉप्टर आया
ऊंची उड़ान वाला
हेलिकॉप्टर आया

‘नोट’ बरसाया,
धुल उडाया,
‘कमीशन’ कि ‘खुशबू’ फैलाया
सात समंदर पार लहराया,
नव-वर्ष कि शुभ-शकुनी बेला पर
देख यह नव-प्रभात आया
‘घोटालों’ का ‘नव-युग’ आया !
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प्रजा से अभी भी कोसों दूर – ‘सत्ता’,‘तंत्र’ !

देश आज ६४ वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. इन ६४ सालों में निश्चित तौर पर हमने प्रगति की है. विकास हुआ हैं. लेकिन साथ ही साथ हमने ‘मूल्यों’ को खो भी दिया हैं. इनका जतन करने कि बात तो दूर, दिन ब दिन होते उनके पतन को रोकने तक कि कोशिश करना भी हमने छोड़ दिया. हमारी सभ्यता, हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति, हमारे आदर्श, हमारे विचार, हमारे उद्देश्य सब हमें चिढ़ा रहे हैं.
क्योंकि हमने चाहे विकास किया हो, चाहे हमने तकनीकीकरण और वैज्ञानिक क्षेत्र में नयी उपलब्धियां हासिल की हो, हमारी गिनती भी विश्व के चुनिन्दा विकासशील राष्ट्रों में होती हो – पर हम अभी भी बुनियादी विकास से बहोत दूर है. हमने ‘मतदाता’ भी निर्माण करने में ‘विकास’ किया है, पर ‘अच्छे नागरिकों’ का निर्माण और ‘चरित्र-निर्माण’ से एक अच्छे ‘राष्ट्र’ का निर्माण अभी बाकी हैं. नीति-मूल्यों के विकास कि बात करना भी अब जरुरी हो गया है.

उदारीकरण, बाजारीकरण और वैश्वीकरण में तो हम आगे बढते दिखाई देतें हों, पर ‘आम’ आदमी से, जनता के सरोकार से हम बहोत दूर होते जा रहे हैं. कुछ मुट्ठी भर लोग जिनके हाथ में सत्ता हैं, या जो जन-प्रतिनिधि हैं, उनके सगे सम्बन्धी, उनके चाटुकार मित्र, उनके चेले चपाटे और जिन्हें सत्ता ने अपने रुतबे से खरीद लिया हैं बस उन्ही लोगों का राज चल रहा है, और सत्ता और पैसे के बल पर ये चुनिन्दा लोग ही अपनी अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं.

एक तरफ हम चाँद पर, मंगल पर खोज करने कि बात करते है. एक तरफ विकास के बड़े बड़े वायदे करते है. वहीँ दूसरी तरफ अभी भी ‘पीने’ के पानी कि समस्या, ‘बिजली’ कि कमी, गरीबी, भुखमरी, आवास-निवास, और पक्की सड़कों का न होना जैसी समस्याएँ मौजूद हैं. पिडीतोंको सालों साल तक न्याय नही मिलता. इन समस्याओंके अलावा देश में हर रोज हो रहे अपराध हमें सोचने पर मजबूर करतें हैं कि आखिर जिस धरती पर ऐसे महान धर्म एक साथ पलें, जिन्होंने इंसान को, इंसानियत को सबके ऊपर तरजीह दी, आज उसी धरती पर बेलगाम जुल्म ज़ारी है, महिलाओं और बच्चों, बुजुर्गों के खिलाफ ‘इंसानियत’ को शर्मसार करनेवाले अपराध ज़ारी है. हमें अपने आप पर घिन्न आने लगे इस हद तक या उससे ज्यादा हम अपनी नज़रों में गिर गए हैं. फिर भी हम जिंदा हैं. फिर भी हम बर्दाश्त करतें हैं.
क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाए, कुछ भी होता रहे हम ‘बर्दाश्त’ जरुर करतें है. हमारी ‘नपुंसकता’ को हमने अपनी ‘सहिष्णुता’ के नाम पर ढांक लिया हैं. इसीलिए कुल मिलाकर एक ‘अनुशासनहिन्’ समाज, एक ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था और एक ‘लोला पोला’ सरकार हमारे प्रतिक रूप बन गए हैं.
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश होगा जहाँ पर एक ‘शरीफ’, कायदा-कानून माननेवाले, उनका पालन करनेवाले, सच्चाई कि राह पर चलने वाले और ईमानदार लोगों के लिए , ऐसे नागरिकों के लिए, जीना उतना ही कठिन, और मुश्किलों भरा हैं जितना आसान वह गुंडे, बदमाश, दबंग, भ्रष्टाचारी, अपराधियों और आतंकवादियों के लिए है. अपराधी यहाँ छाती ठोक के अपराध करते हैं और आज़ाद घूमते हैं , निरपराध मारे जाते है, निर्दोष कि बलि दी जाती हैं. हर नये अपराध के साथ अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं क्योंकि ‘नपुंसक’ ‘व्यवस्था’ उसकी शरण में चली जाती है और कानून के ढीले ढाले पेंच उसके बचने कि राहें आसान करती हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा , जिसका पडोसी मुल्क छाती ठोक के उसके सैनिकों के सर कलम करता हैं और साथ ले जाता हैं, फिर सद्भावना के नाम पर ‘लज़ीज़’ पकवानों का ‘मजा’ लेने उसीके घर चला आता हैं. और हमें अपने सैनिकों कि जान से ज्यादा दुश्मन से ‘क्रिकेट’ खेलने में ज्यादा रस आता है, और ‘संबंधों को लचीला’ करने कि पहल के नाम पर खेल में ‘हार’ कि रूपरेखा को भी हम पहले से तैयार कर लेतें हैं.
भारत ही ऐसा देश होगा जहां ‘शहीदों’ को उचित समान नही मिलता , यहाँ तक कि उनके परिवार वालों को आवंटित ‘पेट्रोल-पम्प’ तक दबंग कब्ज़ा कर लेतें हैं या उनमे भ्रष्टाचारी अपना हाथ साफ़ कर लेतें हैं.
देश में हालात इतने खराब हैं कि जिसकी जहां मर्ज़ी होती है वो वहीँ ‘बलात्कार’ कर देता है. इसको आप ‘बलात्कार’ के शब्दार्थ के रूप में लेंगे तो जल्द समझ पायेंगे.
गुंडई, दबंगई, हैवानियत इस कदर बढ़ गयी है कि अब संसद जैसी ‘पवित्र’ जगह पर भी लोग ‘बल’ का प्रयोग करतें हैं, जैसा कि पिछले दिनों समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने ‘आरक्षण’ बिल फाड़ने में किया. अब तो सत्ता में बैठें कुछ लोगों ने ‘आम’ जनता के साथ मानसिक ‘बलात्कार’ करना शुरू कर दिया है.
जैसा कि ‘अन्ना-आंदोलन’ और ‘दामिनी’ बलात्कार केस के सिलसिले में आये विवादास्पद बयानों से जाहिर होता है.
एक बहोत ही संगीन मामले को ‘ढुलमुल’ रवैयेसे कमज़ोर बनाकर ‘इंसानी’ ज़ज्बातों का गला घोटने कि सोची समझी साजिश के तहत ही ये सब होता है. ताकि थक हार कर जनता ‘सत्ता’ के सामने शरणागत बन जाए, उसके सामने झुक जाए और दोबारा फिर ऐसी घटना घटे तो भी वो ‘आयी-गयी’ बात बन के रह जाए.
‘शुभ संकेत’ के रूप में तस्सली देनेवाली बात इतनी हैं कि पिछले दो वर्षों में जो जनाक्रोश दिखाई दिया, जो जागरूकता लोगों में आयी हैं वो आनेवाले समय में भी बरक़रार रहे तो अच्छा वरना हमारी आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी, और हम जो गर्व महसूस करते थे कि ‘मैंने इस देश में जनम लिया’ उस बात पर कहीं हमें शर्मिंदा ना होना पड़े. इसके लिए अभी भी एक बड़े आंदोलन कि जरुरत हैं, जो ‘ज्वालामुखी’ बन कर मौजूदा व्यवस्था पर फूट पड़े, और हमारे ‘महामहिम’ ने जो कहा हैं कि ‘पिछले ६० वर्षों’ में जो बदलाव नहीं आया वो अगले ‘दस सालों’ में होगा उसे सही साबित करें !
हमें और हमारे वतन को अपने अंदर फिर से झाँकने कि जरुरत हैं …
अंत में फिर साहिर कि इन पंक्तियों के साथ आज कि बात यहीं खत्म करता हूँ …

“अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन, अपने ऐबों को मत ढांक मेरे वतन’ … (संपूर्ण गीत के इये इस कड़ी पर अवश्य जाएँ ..

http://atulsongaday.me/2012/01/22/apne-andar-zaraa-jhaank-mere-watan/