ME … ‘A POLYBAG’

Today 5th June 2018 is the Tenth birth anniversary of this blog. On this day in 2009 this blog was launched, and since then, albeit slowly, this blog has been progressing and continuing with the support of all who have been associated and visited this blog time to time.

This year the World Environment Day theme is ‘Beat Plastic Pollution’!!

And this year our own country India is the host for celebration of this day World-wide.

Few years back I had penned a poem as a ‘self-narrative’ by a ‘polybag (Panni)’.

The poem was in Hindi and for today’s presentation I have got its translation into English done by my daughter Ashwini.

Keeping my write up simple and limited to this much only and once again Thanking all, I present this translation, as a post for today’s occasion here;

ME …  ‘A POLYBAG’

I am a ‘polybag’ wandering places,
Wandering just like the other members of my species are,
Spreading throughout and travelling into the unknown,
Getting ignored with no hopes of getting cared and cured
Yet I keep wishing, for someone to pick me up in their loving arms,
I wish someone would take me to my rightful ‘disposal’, the place where I belong.
I wonder where my siblings are,
Maybe they’re wretched just like me,
Maybe they too have a gruesome story to tell
Like PVC had to tell this other day;
“Oh! the ignorant Humans!
Why aren’t you saving yourselves from me?
Don’t you care about your future?
The future of you and your progeny…”
I wish you would have kept us away from your surroundings
Instead of letting I and my specie get all messed up with each other.
I myself have been through a lot,
Be it getting trapped in cluster of spikes
Or being wrapped up around the branch of a tree!
I’ve floated in the drains, muffled over cans and ducts
Just to become the culprit of everything filthy!
I am that tramp, who keeps wandering constantly,
Rotting through rivers and pools,
Ending up spreading pollution everywhere,
You ask me where I’ll be found,
I am Omnipresent I say!
Flying, crashing through nowhere
Hoping for some day ‘someone’ will come,
And take me to my ‘appropriate disposal’
Please embrace me, love me, care me
Help me to reach – ‘my final destination’
Take me where I belong and save your Habitat,
Save your mother, Oh human,
Save your nature, Save ‘mother earth’

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष – कहाँ पे जाये कचरा … !!

(आज विश्व पर्यावरण दिवस के साथ साथ हम इस ब्लॉग की सातवीं सालगिरह भी मना रहे है.
इस अवसर पर इस ब्लॉग के संस्थापक सदस्य मेरे मित्र श्री. आशीष तिलक तथा श्री. भरत भाई भट्ट को, और आप सभी पाठकों, मित्रों को ढेरों शुभकामनाएं )

हम लोग कितना कचरा निर्माण कर रहे है, इसका अंदाजा भी शायद हम नहीं लगा सकते. लेकिन एक सफाई वाले कि नज़र से देखे और सोचे, तब पता चले कि यह विषय कितना गंभीर है.
मैं इस सम्बन्ध में ‘सांख्यिकी’ या ‘आंकड़ों’ के पचड़े में नह पड़ना चाहता. क्यों कि मैं जानता हूँ कि वास्तविकता कहीं ज्यादा भयंकर है और आंकड़े इस समस्या के समाधान का, या इसमें दिन –ब-दिन जरुरी सुधार का पैमाना नहीं बन सकते और न ही बन पाएंगे.
हजारों लाखों टन कचरा हर रोज हमारे आस-पास परिसर में लाकर ढेर कर दिया जाता है. इस कचरे का फिर क्या होता है? ये कूड़े का ढेर आखिर किस सागर में समाता है ? क्या अलग अलग तरह का कचरा छंटनी किया जाता है? क्या पुनः चक्रित होने वाली चीजों को पुनः प्रयोग करने के लिए प्रकिया में लिया गया है? क्या हर चीज़ को उसकी विशिष्टता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है/ किया गया है?

क्या प्रदुषण न फैले इसका ध्यान रखा गया है? और सबसे बड़ी बात कही कोई अवशेष बाकि तो नहीं रह गए है. क्या हर वस्तू का उसकी विशिष्टता के आधार पर उचित निरूपण किया गया. जो खतरनाक और घातक रसायन या अपव्यय है उनके निबटारे में क्या जरुरी सावधानी बरती गयी है.

जिंदगी कि भाग दौड़ इतनी तेज हो गयी है कि किसी के पास यह सब सोचने और उस पर मंथन करने का समय ही नहीं मिल पा रहा है.
परिणाम है प्रदुषण – महा भयंकर प्रदुषण, प्रकृति के ऋतू चक्र में बदलाव , वातावरण में परिवर्तन. शायद इसीलिए अब बारिश में वैसी बारिश नहीं होती जैसे हमारे बचपन के दिनों में होती थी. अब तो कभी आधे किलोमीटर परिक्षेत्र में बरसात होती है तो थोडा आगे जाते ही आपको एकदम सुखा भी मिलता है. अब घनघोर वर्षा तो होती है लेकिन लगातार नहीं होती , कई दिनों तक तो होती ही नहीं.
और बीते हुए कुछ वर्षों में ‘जलवायु’ में जो बदलाव देखे गए हैं उससे हम सब अछि तरह वाकिफ है ही , जैसे की – इस साल भीषण गर्मी पड़ी, कई शहरों के तापमान में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है, पिछले साल कहीं भीषण सूखा पड़ा, तो कहीं भीषण बाढ़ आयी, और बारिश औसतन कम रही, जब ज़रूरत थी तो बारिश नहीं आयी, और जब आयी तो बर्बादी लेकर. यह सब घटनाएं पर्यावरण में बदलाव के संकेत है, जिससे हमें सबक लेना चाहिए. और प्रकृति के बचाव के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए.
जो स्वच्छता मुहीम २ अक्तूबर से चलायी गयी, उस पर कहाँ और कितना अमल हुआ इसका भी समय समय पर समीक्षा होनी चाहिए. क्योंकि पिछले कुछ दिनों में मुझे कई बार कार्यवश कुछ बड़े-छोटे शहरों कि यात्रा करनी पड़ी और वहाँ ज्यादातर मैंने पाया कि ‘गन्दगी’ का ‘साम्राज्य’ अभी भी जारी है.
दुःख इस बात पर हुआ कि उन् शहरों के जो प्रमुख सरकारी दफ्तर है जो जिला-स्तरीय कार्यालय है उनके पास तक ‘कूड़े-कचरे’ का ढेर पाया गया और प्रतीत होता था कि वहाँ पर कई कई दिनों तक सफाई हुयी ही नहीं है और होती भी नहीं है.
(कुछ दिन पूर्व अहमदाबाद से वड़ोदरा जाते हुए एक्सप्रेस-हाईवे से पहले अहमदाबाद शहर का कूड़े का ढेर देखने को मिला, जिसको शहर से बाहर इक्कठा कर जलाया जाता है, ये ढेर अपने आप में एक बड़े ‘टीले’ में तब्दील हो गया है और दिन ब दिन इसका स्वरुप्प और विकराल होता जा रहा है.)

तो हमारी ‘अनास्था’ का दौर अभी जारी है. हमारी ‘बेरुखी’ अभी ‘खत्म’नहीं हुयी है !!

और जाहिर है कि केवल किसी एक दिन अगर प्रधानमंत्री हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करेंगे और सोचेंगे कि सब कुछ सही होने जा रहा है, तो वैसा नहीं होगा. लोगों को स्वयं ये जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी. और तो और जो लोक प्रतिनिधि है उन्हें तो विशेष प्रयास करने होंगे और उन्हें ये करने भी चाहिए क्योंकि राज्य में या जिले में वे एक ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे है, जिसने देश में बदलाव लाने कि बात कही थी, जिसने ‘घिसे-पिटे’ तरीकों से लोगों को ‘निजात’ दिलाने का वायदा किया था (चुनाव से पहले). लेकिन लगता है सरकार नयी नयी योजनाएं शुरू कर और उनका ढिंढोरा पीटकर खुद ‘घिस-पीटकर’ वापस ‘सत्ता’ कि ‘हसीन’ दुनिया में खो जाती है …फिर आज एक टीवी चैनल पर साबरमती नदी में कूड़ा-कचरा फेंकते हुए कुछ लोगों को दिखाया गया और उनसे पूछे गए सवालों का जिस ‘बेशर्मी’ से इन लोगों ने जवाब दिया,  उससे जाहिर होता है की अभी भी हमारे देश और देश के संसाधनों के प्रतिप्रति, पर्यावरण की रक्षा के प्रति और यहाँ तक की हमारे बच्चों के भविष्य के प्रति हम कितने उदासीन और संवेदनहिन् बनते जा रहे है … ऐसे में टनों टन इकठ्ठा हो रहे ‘कचरे’ की परवाह कौन करता है …

Happy 5 th Birthday …

Thanks to my friend Pamir Harvey whose similar activity for his blog inspired me that I should also take care of my own blog, while I do other activity and contributions to other blogs.

So here is wishing my dear blog ‘SAMAJ SHILPI’ (‘the Social Architect’) a very very HAPPY BIRTHDAY today.

It was through a conscious thought process that the date ‘5 th June’ was selected to launch this lovely creative blog.
As today 5 th also happens to be the ‘World Environment day’ every year.

To bring ‘environmental awareness’ is one of the core objective of this blog.

On this occasion today I wish to thank my founding members’ friends Ashish Tilak, Bharat Bhatt and my younger daughter Ashwini for their constant support and encouragement to me.
While Ashwini has also been the major contributor for her posts since she was studying in Std VII th, and to some extent could not devote much time due to her board exams since last year. (Though in between she contribute some posts)
As her exams are over I hope her posts would be coming regularly now.

Back to ‘Samajshilpi’,
He will continue to fight for the ‘right’ and to bring ‘positive change’ in the society.

Many things happen regularly around us that shake up our conscience and the current socio-political scenario had posed many serious threats for all the human beings who love peace and believe in ‘live and let live’. Crime against women and children are continuing as if there is no fear of ‘law’ for those who commit these crimes and carry on anti social activities. Corruption has damaged the total social fabric and everything seems to be ‘fixed’ in favor of the ‘wrong’.

“We continue to tolerate the ‘wrong’ at the cost of the ‘right’, (that is what my favorite writer/poet Gulzar saab express recently speaking on the occasion of the release of the 3 rd edition of his ‘dyodhi’. )

Samajshilpi, is closely watching them all, observing them & feeling them all. He do feel ‘sad’ and ‘helpless’ at times, but then the hope for the ‘positive change’ keeps him ‘optimistic’ and motivates to carry his role further ….

Wishing all readers and well wishers of this blog very happy ‘Environment day’ today, I leave all of your with the following thought provoking ‘tweet’ shared recently by my another good friend Raja Swaminathan –

“The day people respect facts more than opinion, we will become a more objective society, and the media could help by leading”