कूड़ा – करकट – २ (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं (या यूं कहिये की बिगाड़ती है), और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.

हमें आज़ाद हुए ६६ वर्ष हो चुके है … लेकिन ‘नागरिकिय-संवेदनशीलता’ (‘सिविक-सेन्स’) अभी पर्याप्त रूप से हमारे बीच विकसित नही हुयी है. इसके कई उदाहरण हमारी रोज़मर्रा कि जिंदगी में हमें मिलते रहते हैं. वर्षों पुरानी सभ्यता होने के बावजूद हमारे समाज में धीरे धीरे मानवीय मूल्यों का र्हास होता गया, और अकर्मण्यता बढती गयी, देश और सामाजिक मूल्यों के प्रति नीरसता बढती गयी और सार्वजनिक जीवन में निष्क्रियता बढती गयी जिसका परिणाम हैं कि आज हमारे देश में ‘मानवीय और सामाजिक संवेदनहीनता’ चरम पर है. हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता.

यहाँ ये भी समझना ज़रूरी हैं कि सब कुछ ‘तंत्र’ के भरोसे छोड़ेंगे तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. हमें भी कुछ जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और सामाजिक कार्यों में मिल जुलकर सहभाग करना पड़ेगा.

इस श्रृंखला के पहले लेख में मैंने ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रक्षा तथा रख-रखाव कि बात की थी. आज के लेख में हम सार्वजनिक जगहों पर जारी ‘धूम्रपान’ के बारे में बात करेंगे. किसी न किसी कारणवश मेरी रेल या बस कि यात्रा होती ही है. वैसे हर रोज ४ या ५ घंटे का बस का सफर तो है ही. इसमें मैंने देखा कि लोग जिनमे युवा भी हैं, बुज़ुर्ग भी हैं सभी धडल्ले से धूम्रपान करते हैं और ऐसा करते समय इतना सौजन्य भी नहीं दिखाते कि पड़ोस में बैठे शख्स से पूंछ तो लें. कभी कभी लोग अपनी माँ, बेटी-बेटे, बहन, या पत्नी, और छोटे छोटे बच्चों के होने के बावजूद भी उनकी मौजूदगी में ही या उन्हें गोद में बिठा कर भी धूम्रपान करते हैं. यह करते हुए वे खुद अपने ही बच्चों कि सेहत से जाने-अनजाने खिलवाड़ कर रहे हैं. हालांकि, सरकार ने सन २००८ में इससे सम्बंधित नियम जारी किये थे जो कि ०२.१०.२००८ से ‘Prohibition of Smoking in Public Places Rules, 2008 and COTPA’ के नाम से जारी हुए थे. (इसे आप यहाँ पर विस्तार से पढ़ सकते हैं) इस नियम मार्गदर्शिका के अनुसार सभी सार्वजनिक जगहों पर जैसे कि , प्रेक्षागृह, सिनेमा घर, अस्पताल, सभी प्रकार कि सार्वजनिक यातायात सुविधाएं तथा उनसे सम्बंधित सुविधाएं (जैसे कि बस और बस स्थानक) और शोपिंग मॉल, शैक्षणिक संकुल तथा उसके आस-पास का परिसर इत्यादि जगहों पर धूम्रपान मना हैं. लेकिन लोगों में जानकारी के अभाव के कारण और दृढ़ इच्छाशक्ति न होने कि वजह से सब इसे बर्दाश्त कर रहे हैं. व्यक्तिगत स्तर पर मैं कोशिश करता हूँ और लोगों से आग्रह भी करता हूँ कि वे ऐसी जगहों पर धूम्रपान न करें, आप सभी अपने माध्यम से लोगों कों इस बारे में जागृत करें और उन्हें प्रेरित करें ताकि हम समाज में सामंजस्य बनाएँ रखे और साथ ही एक सभ्य समाज का निर्माण कर अपने ‘नागरिक कर्तव्यों’ का पालन करें, सामाजिक शिष्टाचार का पालन भी करें.

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