कुछ सवाल हम करें, कुछ सवाल तुम करो … और ‘पब्लिक’ के सवालों का न कोई जवाब हो (?)

पिछले कुछ दिनों से जो ‘राजनीतिक’ उठा पटक हो रही उसमे हर पार्टी एक दूसरे से सवाल पूछ रही है. हर रोज पढ़ने सुनने- को मिलता है कि आज फलाना पार्टी ने फलाना पार्टी से दस सवाल पूछे, या पन्द्रह सवाल पूछे या फिर इस संगठन ने उस पार्टी से या उन सभी राजनीतिक पार्टीयों से सवाल पूछे.
और दूसरी पार्टी भी ‘सेर पे सवा सेर’ कि तर्ज़ पर ‘नहले पे देहला’ मारते हुए दूसरी तरफ से सवाल दाग(?) देती है.
अच्छा , इसमें मज़े कि बात तो यह है कि जो पहले सवाल पूछे गए हैं उसका जवाब कोई नहीं देता, हाँ सवाल के जवाब में प्रति-सवाल जरुर कर देता है !
ज़ाहिर है चुनाव आनेवाले है तो ये खेल भी चलता रहेगा और समय भी इसी तरह से गुज़रता रहेगा जैसे कि देश के स्वंतंत्र होने के बाद ६५ साल गुजार गए और बहोत से सवाल अभी तक अन सुलझे है या जिनका जवाब किसी पहेली से कम नहीं है. जवाब तो दूर आप खुद ही खुद से सवाल करने लगोगे और सवालों के ‘चक्रव्यूह’ में फँस जाओगे.
है न यह मज़े कि बात, और इसीलिए बरबस ही मुझे शैलेन्द्र के लिखे इस गीत के बोल याद आते गए कि ‘एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो’ और ‘हर सवाल का सवाल ही जवाब हो’, उन्हें जरुर पता होगा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जिनकी ‘जवाबदेही’ बनती है वो खुद जवाब देने के बजाये सवालों का ऐसा ‘मायाजाल’ खडा कर देंगे कि आम आदमी उसी में घूमता रह जायेगा. क्या निचे दिए गए सवालों का जवाब कोई दे सकता है?
– आज़ादी के पैसंठ साल बाद भी हमें २४ घंटा बिजली क्यों नहीं मिलती?
– क्यों अभी भी कई लोगों को दो वक्त कि रोटी नसीब नहीं होती?
– क्यों हमें पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिलता और क्यों हमें पानी भी खरीद के पीना पड़ता है?
– क्यों अभी तक कई गांव पक्की सडकों से महरूम है?
– क्यों बच्चें, महिलाएं और बुज़ुर्ग हमारे देश में सुरक्षित नहीं है?
– देश पर हमला करनेवालों को हम सजा देने में देर क्यों करते है?
– क्या बात है कि देश में कानून का राज नहीं चलता है और निर्दोष लोगों को सज़ा हो जाती है और पता होते हुए भी गुनाहगार छूट जाते है ( खुद ‘गृह सचिव’ इस बात कि तस्दीक कर चुके हैं)
– क्यों देश में हर रोज ‘बलात्कार’ होते है और किसीको सज़ा नहीं होती?
– क्या बात है कि ‘अंतरिक्ष’ विज्ञानं में हम नयी नयी बुलंदियों को छू रहे और ‘ज़मीनी’ हकीकत से नाता तोड़ ज़मीन पर रहनेवाले और भगवान कि सबसे खूबसूरत खोज जिसे कहा जाता है , उस ‘हाड-मांस’ के आम आदमी का जीवन स्तर सुधारने के बजाये उसकी जिंदगी को बद से बदतर करने में लगे हुए है?
– आज़ादी के पैसंठ साल बाद भी देश में यह ‘बदहाली’ कि स्थिति क्यों है?

मुझे पूरा यकीन है कि ‘सरकार’ या ‘सत्ता’ में बैठे हुए लोग इन सवालों का जवाब कभी नहीं दे पाएंगे, और हमने इन सवालों के जवाब जानने का हक भी गँवा दिया है, क्योंकि हमने कभी अपने देश को अपना समझा नहीं और इसे अपनाया नहीं. हर बात पे ‘ अरे छोड़ यार ‘ अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘होने दो यार जो होता है’ किसको पड़ी है?’ कहकर, हमने हमेशा टाल दिया, यहाँ तक कि राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुँचाने में भी हम लोग सबसे आगे रहते हैं, मतदान के दिन ‘पिकनिक’ मनाते है ‘वोट’ डालने नहीं जाते, तो देश का तो यही हाल होगा न?
हमारी बेरुखी का ही नतीजा है कि आज देश में एक ‘अनुशासन हिन् समाज है, लचर-पचर कानून व्यवस्था है, और एक ‘लोला – पोला’ सरकार राज करती है.
इसी कारण आज जिन्हें हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए वो हमसे ही सवाल पूछने कि हिमाकत करते है!!!