आया मौसम ‘सीसीटीवी’ का …

कूड़ा – करकट
(हमारे समाज का आइना)

… आया मौसम ‘सीसीटीवी’ का …

दोस्तों, यह लेख मैंने कई महीनों पहले लिखा था जब बार बार ‘सीसीटीवी’ कि चर्चा कुछ न कुछ बहाने से सुर्ख़ियों में थी. फिर कुछ कारणवश मैं इसे पोस्ट नहीं कर पाया.
तब ऐसी घटना घटी थी जब एक इंसान ने खुदकशी कि और वक्त रहते अगर सुरक्षा कर्मी ‘सीसीटीवी’ कि ‘फूटेज’ कि निगरानी कर रहे होते तो शायद इस शख्स को बचाया भी जा सकता था.

यह लेख भी मैंने अपने तरीके से सरल भाषा में लिखा है ताकि सामान्य जनता पर या ‘आम –आदमी’ पर इससे कोई और अधिक ‘बोझ’ न बढे !! क्योंकि आम आदमी अपनी रोज़मर्रा कि जिंदगी से ही इतना थक जाता है कि उसके बाद के समय में वह कोई भी अतिरिक्त कार्य (चाहे वह देशहित में ही क्यों न हो, करने हा हौसला नहीं जुटा पता है).

अब देश में फिर से ‘सिसिटीवी’ का ‘मौसम’ उफान पर है. कई जगह ‘सीसीटीवी’ लगाए जा रहे है. कई जगहों पर लगाने का विचार हो रहा है – केंद्र स्तर पर- दिल्ली में- अलग अलग राज्यों में – जहाँ नयी सरकारें आयी है वहाँ पर, इत्यादि.
(इसका मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि ‘करोड़ों’ रुपयों का बजट इसके लिए आवंटित किया गया होगा, निविदाएँ मंगाई गयी होंगी, ठेके (?) दिए जा रहे होंगे या ठेकों कि नीलामी कि जा रही होंगी, या फिर ‘ऑन-लाइन’ प्रक्रिया चल रही होंगी. हम चाहे तो कुछ भी कयास लगा सकते है)

हमने ऐसा भी देखा है कि कभी-कभी ‘सीसीटीवी’ का जिक्र होता है तो आँखों के सामने एक नाकाम ‘कैमरे’ कि तस्वीर उभर आती है. क्योंकि हर समय यही सुनने को मिलता है कि ‘सीसीटीवी’ तो लगा हुआ था पर वह काम नहीं कर रहा था! तो क्या सीसीटीवी को भी ऑफिस-ऑफिस जैसी कोई बीमारी लग गयी है कि वह कुछ लेन-देन के बाद ही काम करेगा. या फिर हमने हजारों – लाखों रुपये खर्च कर इन कैमरों को लगवाया ही क्यों है?
इस सीसीटीवी को मुए को शर्म भी नहीं आती है, लोग जान से चले जाते है, पर यह हिलता ही नहीं है, देश कि सुरक्षा तक खतरे मे पड़ जाती है आम आदमी कि तो बात ही क्या?
और हम केवल सीसीटीवी के भरोसे है, अगर कोई इसे जान-बूझकर’ चलने नहीं देता है तो भी इसे अपने आप कभी कभार एक चमत्कार के रूप में काम करने में क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि इसमें कैद हुई तस्वीरों से ही तो हमें कुछ सुराग मिलेंगे वर्ना दिखावे के लिए तो हमारी पुलिस झूठ-मूठ कुछ तो छापेमारी करेगी ही,
वैसे भी पहले जब सीसीटीवी नहीं था तो क्या मामले सुलझते ही नहीं थे, हाँ यह अलग बात है कि ज्यादातर मामलों में बाहरी ताकतों के होने का तर्क दिया जाता था और अगर कोई गुनाहगार पकड़ा भी जाए तो क्या? कानून के ढीले ढाले पेंच उसकी सलामती के कई रास्ते अपने आप खोल देते है ताकि गुनाह करनेवालों के हौंसले और बुलंद हो और वो संगीन से संगीन अपराध करने कि हिमाकत कर सके, इसी का नाम तो भारतीय लोकतंत्र है, और ‘टालरेंस’ भी हमारा गज़ब का है , हर चीज बर्दाश्त कर लेते है…
हाँ हाँ , वही… सहिष्णुता , फर्गिवेनेस .. क्षमा.. ‘क्षमादान सबसे ऊपर है’,
यह सब सब कहते सुनते ही तो हमने गांधीजी के ‘तीन बंदरों’ को अपनी नाकामी कि ढाल बना दिया है, कैसे? ..
ऐसे जनाब- हर गुनाह से , सामाजिक बुराइयों से हमने आँख मूंद ली है- चाहे हमारे सामने कितना भी बुरा घटित हो रहा हो- ‘ हम कुछ देखते ही नहीं है’- मैंने देखा नहीं’ ,
विकास और वैश्वीकरण के शोर मे किसी कि चीख पुकार भी हमें सुनाई नहीं देती है- मैंने सुना नहीं’, और अन्याय चाहे कितना भी हो रहा हो, हमारे में अब बोलने कि हिम्मत रही ही नहीं – सब चलता है, अपने बाप का क्या जाता है, मजबूरी का नाम … हम है- जी हाँ – एक आम भारतीय आदमी, किसी और का नाम बदनाम करने से क्या फायदा?,
तो यह है हमारा तीसरा पहलु- ‘मैंने बोला नहीं’

तो फिर से ‘सीसीटीवी’ कि कार्य प्रणाली पर लौटते है. सरकार ने जहां भी जनता का पैसा खर्च कर ये
‘सीसीटीवी’ लगाए हैं , जहां ये बंद पड़े हैं – उन्हें चालु कराया जाय, जहां चल रहे है वहाँ पर इनकी फूटेज कि निगरानी करने वालों को सतर्क किया जाए, क्योंकि कब कहाँ क्या होगा इसका अनुमान लगाया नहीं जा सकता इसलिए सतर्कता जरुरी है. और जिनके जिम्मे इसका पूरा कार्यभार है वहाँ पर जवाबदेही तय कर इसकी कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाया जाए और इसको सख्ती से लागू किया जाए.
लेखक कि प्रार्थना है कि सरकार लगाए गए ‘सीसीटीवी’ कि ‘कार्यप्रणाली’ निश्चित करें ताकि जनता को और सभी को इसका लाभ मिल सके. सभी जगहों पर ये सीसीटीवी बिना रुकावट के चलते रहे और कानून कि मदद करते रहे. और इन सीसीटीवी को लगाने पर जो ‘जनता’ का ‘पैसा’ लगाया गया है उसका लाभ ‘राष्ट्र’ को और ‘जनता’ को मिले. जान हानि को बचाया जाए, राष्ट्र और राष्ट्रीय राष्ट्रीय संपत्ति कि रक्षा कि जा सके.
और जनता भी अपनी जागरूकता से इन ‘सीसीटीवी’ कि रक्षा करे ताकि कोई असामाजिक तत्त्व इनको नुक्सान न पंहुचा सके और ‘राष्ट्रीय-संपत्ति’ कि हानि को टाला जा सके.

(नोट – सुर्ख़ियों में है कि कुछ जगहों पर ‘एल-ई-डी’ ‘बल्ब’ लगाने या बदलने के कार्य में भी कुछ अनियमितताएं पायी गयी है … जय हो !!)

Cleanliness Pledge

स्वच्छता शपथ
( स्वच्छ भारत – एक कदम स्वच्छता की ओर )

महात्मा गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था उसमे सिर्फ राजनैतिक आज़ादी ही नहीं थी, बल्कि एक स्वच्छ एवं विकसित देश कि कल्पना भी थी !

महात्मा गांधी ने गुलामी कि जंजीरों कों तोड़कर माँ भारती कों आज़ाद कराया !

अब हमारा कर्तव्य है कि गंदगी कों दूर करके भारत माता कि सेवा करें !

मैं शपथ लेता हूँ कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूँगा और उसके लिए समय दूंगा !

हर वर्ष १०० घंटे यानी हर सप्ताह २ घंटे श्रमदान करके स्वच्छता के इस संकल्प कों चरितार्थ करूँगा !

मैं न गंदगी करूँगा न किसी और कों करने दूंगा !

सबसे पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से , मेरे मुहल्ले से, मेरे गाँव से एवं मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूँगा !
मैं यह मानता हूँ कि दुनिया के जो भी देश स्वच्छ दिखतें हैं उसका कारण यह है कि वहाँ के नागरिक गंदगी नहीं करते और न ही होने देते हैं !

इस विचार के साथ मैं गाँव-गाँव और गली-गली स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार करूँगा !

मैं आज जो शपथ ले रहा हूँ, वह अन्य १०० व्यक्तियों से भी करवाऊंगा !

वे भी मेरी तरह स्वच्छता के लिए १०० घंटे दें, इसके लिए प्रयास करूँगा !

मुझे मालूम हैं कि स्वच्छता कि तरफ बढ़ाया गया मेरा एक कदम पूरे भारत देश कों स्वच्छ बनाने में मदद करेगा !

Cleanliness Pledge

(re-blogged  from Local Circles)

Traffic Jam

कूड़ा-करकट
(हमारे समाज का आईना)

कूड़ा करकट में हम बात करतें हैं हमारे समाज में सार्वजनिक जीवन में हमारे आचरण, विचरण, व्यव्हार और शिष्टाचार की. हमारी ‘नागारिकीय संवेदनशीलता’ (सिविक-सेन्स) की !

हमारी रोज़मर्रा कि जिंदगी में ‘ट्राफिक –जाम’ कोई नयी बात नहीं है.
कई बड़े शहरों में, या फिर छोटे शहरों मे, या ऐसी जगहों पर जहां उद्योग फैल रहें हैं, कुछ विकास हो रहा है, शहरीकरण बढ़ रहा हैं और आबादी बढ़ रही रही है, ऐसे सभी जगहों पर यातायात कि समस्या भी बढती जाती हैं. एवं मुलभुत सुविधाओं के विकास के अभाव में और प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण भी कई समस्याएं पैदा होती हैं.
‘ट्राफिक-जाम’ भी एक ऐसी ही समस्या हैं, जो उपरोक्त कारणों कि वजह से तो हैं ही, लेकिन हमारी अनुशासनहीनता और सामाजिक असंवेदनशीलता इसको और भी बढाती है और बड़ा कर देती है.
आज कल कि अति-व्यस्तता वाली जीवन शैली में हर कोई जल्दी में रहता है और हर किसीको किसी भी कीमत पर अपना काम निकालना होता है, केवल अपने काम से मतलब होता है. ऐसे में कोई किसी के लिए न रुकता है न किसी कि परवाह करता है.

उदाहरण के तौर पर, किसी ‘रेलवे-क्रोस्सिंग’ के फाटक लगने वाले ‘जाम’ कों लेते हैं.
रेल के गुजार जाने के बाद जब फाटक खुलता है तो एकाएक सभी अपनी गाड़ियों इस कदर आगे बढ़ाते हैं कि दोनों तरफ से ‘वन वे’ ट्राफिक हो जाता है. दोनों तरफ से गाडियां आमने सामने आ जाती है. कोई किसी दूसरे कों रास्ता नहीं देता, दसों दिशाओं से ‘होर्न’ कि आवाजें गूंजने लग जाती है और इतनी कर्कश कि आपके कान फट जाएँ.

‘ट्राफिक-जाम’ या यातायात में रुकावट, उसमे अनुशासनहीनता, उसके कारण होनेवाले झगडें, यहाँ तक कि ऐसे झगडों में किसीकी जान पे बन आना, हमारे लिए कोई नयी बात नहीं हैं.
हमारे आस पास, रोजमर्रा कि जिंदगी में ऐसी कई घटनाएं होती रहती हैं, जिस से के हम ये सोचने पर मजबूर हो जाएँ कि ‘आखिर कब हम संवेदनशील बनेंगे कब हम एक दूसरे कि तकलीफ समझ कर सामंजस्य बिठाएंगे और सबके लिए बेहतर हो ऐसी व्यवस्था कायम कर पाएंगे.
दूसरी बात ये भी है कि हमारे देश में अनुशासन में रहना या नियमों का पालन करना अपनी तौहीन माना जाता है. इसलिए समस्याएँ कुछ ज्यादा है. कई लोग सड़क कों राष्ट्र कि संपत्ति समझने के बजाय खुद कि जागीर समझते हैं और दूसरों के लिए समस्याएँ पैदा करतें हैं.
और भी ऐसे कई उदहारण हमें अपनी रोज़मर्रा कि जिंदगी में देखने को मिलते हैं जिससे हम इस नतीजे पर आसानी से पहुँच सकते हैं कि ‘ अभी हमें ठीक से सड़क पर चलना भी नहीं आता है तथा यातायात के नियम और सड़क अनुशासन से हम लोग कोसों दूर हैं..
जैसे कि मार्केट में घुमते समय कई लोग अभी भी छोटे छोटे बच्चों को दायें हाथ कि ओर से ले कर चलते हैं जबकि उन्हें बाएं हाथ पर रखना चाहिए, क्योंकि छोटे बच्चे उछलते-कूदते रहतें हैं और कभी कभी हाथ छोड़कर बीच सड़क पर आ जाते हैं..

अभी भी लोग बसों में सफर करते समय दाहिने बाजू कि खिडकी से अपना सर बाहर निकालते हैं- और अपने साथ अगर छोटे बच्चे हैं, और वे ऐसा करतें हैं तो न तो उनका ध्यान रखते हैं और न ही उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं…

और इस तरह का हमारा जीवन जीने का ढंग हैं तो हम क्या सही ढंग के ‘जन-प्रतिनिधि’ चुन पाते है? क्या हम उतनी ही गंभीरता से सामाजिक मुद्दों के प्रति सजग रहते हैं?

यह सब बातें ये सोचने पर मजबूर करती हैं आज़ादी के ६५ साल बाद भी आज अगर हम इन समस्याओं से जूझते हैं तो कमी कहाँ पर हैं.
और प्रशासन कों कोसने के बजाये ये भी समझना होगा कि हम लोगों का – ‘जनता’ का- भी राष्ट्र निर्माण में कोई योगदान होना चाहिए के नहीं?

The Waste Bin (From Garbage to Creativity…)

About a year back when I was in Mumbai and get a chance to travel through the ‘Meru-Cabs’, where in I find this ‘Self Discipline Instructions’ or we can say it  a ‘safe driving habits guidelines’ with the Driver.
These guidelines were available in a well laminated pamphlet inside the taxi.
I found it a very positive initiative (as I do not know how many other agencies or anyone other is also following this practice) on the part of the Travel Agency and hence noted these instructions.
They are good enough for all general public too, as it brings a sense of discipline, ownership, and also promotes good manners and etiquettes.
I am Happy to share this and hope we as an responsible individuals can also get this and put inside our vehicle to make us feel cheerful and attentive all the time and these ‘self discipline principles’ will keep acting as a gentle reminder for self controlling our behavior too.
1)    I WILL DRIVE CAREFULLY.
2)    I WILL NOT DRINK AND DRIVE..
3)    I WILL DRIVE WITHIN SPEED LIMITS…
4)    I WILL BE ALERT AT ALL TIMES….
5)    I WILL KEEP MY CAR CLEAN AND TIDY …..
6)    I WILL BE WELL GROOMED ……
7)    I WILL NOT SMOKE AND CHEW PAN /GUTKHA INSIDE MY CAR

The last point is regarding the hire charges, which I have given below;

1)    I WILL CHARGE THE CUSTOMER AS PER METER

Instead we can include – ‘I will be Honest and Integrated’…!!!

Do share with more peoples as possible!!!

कूड़ा – करकट – २ (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं (या यूं कहिये की बिगाड़ती है), और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.

हमें आज़ाद हुए ६६ वर्ष हो चुके है … लेकिन ‘नागरिकिय-संवेदनशीलता’ (‘सिविक-सेन्स’) अभी पर्याप्त रूप से हमारे बीच विकसित नही हुयी है. इसके कई उदाहरण हमारी रोज़मर्रा कि जिंदगी में हमें मिलते रहते हैं. वर्षों पुरानी सभ्यता होने के बावजूद हमारे समाज में धीरे धीरे मानवीय मूल्यों का र्हास होता गया, और अकर्मण्यता बढती गयी, देश और सामाजिक मूल्यों के प्रति नीरसता बढती गयी और सार्वजनिक जीवन में निष्क्रियता बढती गयी जिसका परिणाम हैं कि आज हमारे देश में ‘मानवीय और सामाजिक संवेदनहीनता’ चरम पर है. हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता.

यहाँ ये भी समझना ज़रूरी हैं कि सब कुछ ‘तंत्र’ के भरोसे छोड़ेंगे तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. हमें भी कुछ जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और सामाजिक कार्यों में मिल जुलकर सहभाग करना पड़ेगा.

इस श्रृंखला के पहले लेख में मैंने ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रक्षा तथा रख-रखाव कि बात की थी. आज के लेख में हम सार्वजनिक जगहों पर जारी ‘धूम्रपान’ के बारे में बात करेंगे. किसी न किसी कारणवश मेरी रेल या बस कि यात्रा होती ही है. वैसे हर रोज ४ या ५ घंटे का बस का सफर तो है ही. इसमें मैंने देखा कि लोग जिनमे युवा भी हैं, बुज़ुर्ग भी हैं सभी धडल्ले से धूम्रपान करते हैं और ऐसा करते समय इतना सौजन्य भी नहीं दिखाते कि पड़ोस में बैठे शख्स से पूंछ तो लें. कभी कभी लोग अपनी माँ, बेटी-बेटे, बहन, या पत्नी, और छोटे छोटे बच्चों के होने के बावजूद भी उनकी मौजूदगी में ही या उन्हें गोद में बिठा कर भी धूम्रपान करते हैं. यह करते हुए वे खुद अपने ही बच्चों कि सेहत से जाने-अनजाने खिलवाड़ कर रहे हैं. हालांकि, सरकार ने सन २००८ में इससे सम्बंधित नियम जारी किये थे जो कि ०२.१०.२००८ से ‘Prohibition of Smoking in Public Places Rules, 2008 and COTPA’ के नाम से जारी हुए थे. (इसे आप यहाँ पर विस्तार से पढ़ सकते हैं) इस नियम मार्गदर्शिका के अनुसार सभी सार्वजनिक जगहों पर जैसे कि , प्रेक्षागृह, सिनेमा घर, अस्पताल, सभी प्रकार कि सार्वजनिक यातायात सुविधाएं तथा उनसे सम्बंधित सुविधाएं (जैसे कि बस और बस स्थानक) और शोपिंग मॉल, शैक्षणिक संकुल तथा उसके आस-पास का परिसर इत्यादि जगहों पर धूम्रपान मना हैं. लेकिन लोगों में जानकारी के अभाव के कारण और दृढ़ इच्छाशक्ति न होने कि वजह से सब इसे बर्दाश्त कर रहे हैं. व्यक्तिगत स्तर पर मैं कोशिश करता हूँ और लोगों से आग्रह भी करता हूँ कि वे ऐसी जगहों पर धूम्रपान न करें, आप सभी अपने माध्यम से लोगों कों इस बारे में जागृत करें और उन्हें प्रेरित करें ताकि हम समाज में सामंजस्य बनाएँ रखे और साथ ही एक सभ्य समाज का निर्माण कर अपने ‘नागरिक कर्तव्यों’ का पालन करें, सामाजिक शिष्टाचार का पालन भी करें.

(इस लेख को भी पढ़ सकते हैं )

 

कूड़ा – करकट (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनाओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं या यूं कहिये की बिगाड़ती है और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.
सार्वजनिक सुविधाओं को ज्यादा से ज्यादा खराब करना, उनका दुरुपयोग करना यह तो हमारे लिए आम बात है ही, ऊपर से फिर हर चीज़ के लिए प्रशासन को दोष देकर उसे कोसते रहते हैं .
शिष्टाचार या सभ्यता की बातें करें तो अभी कुछ उदहारण मैं यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, ये किस्से हमें सोचने पर मजबूर करते हैं की आखिर हमने कौनसा विकास किया है, कितनी प्रगति की है, और हम जा कहाँ रहे हैं? इंसानियत और सभ्यता का कैसा मापदण्ड हम स्थापित करना चाहते हैं,
‘एस टी बस में सफर करते हुए अक्सर मैं खिडकी के पास बैठना पसंद करता हूँ की जिससे हवा का आनंद भी लिया जाये और निसर्ग की सुंदरता का भी निरिक्षण किया जा सके. लेकिन सोचिये के आप आनंद यात्रा का लुत्फ़ उठा रहे हैं, और अचानक आपके चेहरे पर ‘थूक’ के छीटे आ जाये? या कोई ‘पान’ चबाकर खिडकी से ‘पान’ की पीक दे मारे और तेज चलनेवाली , बदन को सुकून देनेवाली सुहानी हवा उसे आपके कपड़ो के साथ साथ चेहरे पर भी बिखेरती हुए जाये तो?, या फिर सामने की सीट पर बैठा हुआ मुसाफिर बिना सोचे समझे चलती गाडी में बहार झांक कर उलटी कर दे और वह सब हवा के झोंके के साथ आपके ऊपर आ जाये तो?
तो?, तो समझ लीजिए के यही ‘भारत’ हैं, और आज़ादी के ६५ सालों में हमने यही विकास किया है,
कि हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता. ‘नागरिक-भावना’ या कहिये कि ‘सिविक-सेन्स’ अभी पर्याप्त रूप से विकसित नही हुआ है.