इक ऋतू आये , इक ऋतू जाए …

मेरे अब तक के जीवन में शायद पहली बार ऐसा हुआ के सूखे कि आशंका से मैं काँप उठा. इससे पहले भी कभी बारिश कम हुई होगी या सूखा या अकाल पड़ा होगा, लेकिन तब भी मैं जिन जिन जगहों रहता पर था वहाँ पर बारिश ज़रूर हुई थी.
यह अलग बात हैं कि बारिश कम हुई होगी, और जब ज़रूरत थी तब नहीं होकर आगे पीछे हुई होगी. लेकिन बारिश होती थी. भयंकर गर्मी और तपिश के बाद बारिश ज़रूर होती थी !
लेकिन इस बार महसूस हो रहा हैं के हालात कितने खराब हैं.
एक दिन पहले बिलकुल ‘साफ़’ आसमान देखकर अचानक मेरा मन घबरा गया. बादलों का कोई नामोनिशान नहीं था. एकदम साफ़ आसमान!
क्या सचमुच बारिश नहीं होगी?

‘प्यासी बंजर धरती
किसका पेट भरे
भूखे प्यासे बच्चे
खेती कौन करे’

और गर्मी तो दिन ब दिन बढती ही जा रही है? कब इस तपिश से हमें राहत मिलेगी?
कब सूखी-बंजर-बिखरती ज़मीन कों बारिश कि बूँदें अपने प्यार से नहला देंगी?
मैं हर रोज ‘टक-टकी’ लगाए आसमान कों देखता रहता हूँ कि बादल आये और ‘उमड़-घुमड़’ कर बरस जाएँ. और हमें कईं मुश्किलों से बचाएं !
हो सकता हैं आज जो कुछ बादल इकठ्ठा हो रहे हैं कल वे बरसेंगे ज़रूर…
और बरसात के बाद जब माहोल खुशनुमा हो जाएगा उसकी अनुभूति कों कौन भूल सकता हैं भला?

वैसे तो समय समय पर मैं अपनी कविताओं में ‘पर्यावरण परिवर्तन’ ( Climate Change ), प्रदुषण के दुष्परिणाम, बढते उद्योग – घटते संसाधन, ऋतू चक्र में परिवर्तन इत्यादि कि बातें करता आया हूँ.
लेकिन उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा. क्योंकि ‘प्रकृति’ अपना ‘समतोल’ बनाए रखती हैं और अभी तक यही एक ऐसा ‘चक्र’ था जिस पर विश्वास बना हुआ हैं और रहेगा.
पर इतना ज़रूर हैं कि अब आबोहवा बदल गयी हैं.

ऐसे में मुझे एक गीत कि ये पंक्तियाँ याद आयी ;

‘तक तक सूखे परबत
आँखें तरस गयीं
बादल तो न बरसे
आँखें बरस गयीं ‘ …
‘बरस बरस दुःख बढ़ता जाए’

***

संयोग से आज ही अपने देश का आम बजट पेश हुआ. टीवी पर जोर शोर से बजट के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं चल रही हैं .
किसको कितना फायदा हुआ यह तो कुछ समय पश्चात ही पता चल पायेगा.
लेकिन देश स्वतंत्र होने के बाद से लेकर अब तक, कितने – मौसम बदले – मतलब कितने बजट पेश हुए. लेकिन क्या बजट में किये गए वादे पुरे हुए?
क्या गरीबों के जीवन में कुछ सुधार हुआ.
क्या बरस दर बरस ‘दुःख’ कम हुआ या बढ़ता ही गया?
हमारी ‘समस्याएं’ कम हुई ?
जिन लोगों ने देश कों आज़ाद होते हुए देखा या जो आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पैदा हुए थे, वे देश के हालात के बारें क्या राय रखते हैं? क्या, जो सपने उन्होंने देखें थे वो पुरे हुए?

क्या सचमुच मौसम बदला?
नसीब बदले?
या फिर …
‘प्यार न सीखा
नफरत करना सीख लिया
सब लोगों ने लड़ना मरना सीख लिया’
और अंत में हमें ये न कहना पड़ जाए कि ,
‘इक बजट आये, इक बजट जाए.. गरीबी मिटे ना ..
हाँ, मिट गए गरीब…’
(यहाँ पर ‘मुश्किलों’ का मतलब हमारी रोज़मर्रा कि समस्याएँ, और ‘रकीब’ हैं = हमारी ‘सिस्टम’या हमारी ‘व्यवस्था’…)

***

खैर आप भी सत्तर के दशक के इस हृदयस्पर्शी गीत का आनंद उठाईये और महसूस कीजिये कि क्या बदला और क्या नहीं.
आदरणीय अतुल जी के ब्लॉग पर इस गीत कि ये कड़ी आपके लिए प्रस्तुत हैं !

इक ऋतू आये

आनंद बक्षी साहब के शब्दों को किशोर कुमार ने बहुत ही दिल से गाया हैं और इसे स्वरबद्ध किया हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’ जी ने !

***

कूड़ा – करकट (हमारे समाज का आइना)

सार्वजनिक जीवन में हम भारतीय कितने भावना शुन्य है इसका उदहारण दिन प्रति दिन हमारे समाज में होनेवाली घटनाओंसे लगाया जा सकता है. वैसे तो कहने को यह सारी बातें छोटी छोटी बातें हैं, पर कहीं न कहीं जाकर ये हमारा चरित्र बनाती हैं या यूं कहिये की बिगाड़ती है और इन्ही बातों से हमारे राष्ट्र –हमारी सभ्यता की भी पहचान होती है.
सार्वजनिक सुविधाओं को ज्यादा से ज्यादा खराब करना, उनका दुरुपयोग करना यह तो हमारे लिए आम बात है ही, ऊपर से फिर हर चीज़ के लिए प्रशासन को दोष देकर उसे कोसते रहते हैं .
शिष्टाचार या सभ्यता की बातें करें तो अभी कुछ उदहारण मैं यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, ये किस्से हमें सोचने पर मजबूर करते हैं की आखिर हमने कौनसा विकास किया है, कितनी प्रगति की है, और हम जा कहाँ रहे हैं? इंसानियत और सभ्यता का कैसा मापदण्ड हम स्थापित करना चाहते हैं,
‘एस टी बस में सफर करते हुए अक्सर मैं खिडकी के पास बैठना पसंद करता हूँ की जिससे हवा का आनंद भी लिया जाये और निसर्ग की सुंदरता का भी निरिक्षण किया जा सके. लेकिन सोचिये के आप आनंद यात्रा का लुत्फ़ उठा रहे हैं, और अचानक आपके चेहरे पर ‘थूक’ के छीटे आ जाये? या कोई ‘पान’ चबाकर खिडकी से ‘पान’ की पीक दे मारे और तेज चलनेवाली , बदन को सुकून देनेवाली सुहानी हवा उसे आपके कपड़ो के साथ साथ चेहरे पर भी बिखेरती हुए जाये तो?, या फिर सामने की सीट पर बैठा हुआ मुसाफिर बिना सोचे समझे चलती गाडी में बहार झांक कर उलटी कर दे और वह सब हवा के झोंके के साथ आपके ऊपर आ जाये तो?
तो?, तो समझ लीजिए के यही ‘भारत’ हैं, और आज़ादी के ६५ सालों में हमने यही विकास किया है,
कि हम जन-भावना का भी ख्याल नही रखते. हमारे व्यवहार, हमारे आचरण से दूसरे को क्या तकलीफ हो सकती है इससे हमें कोई फरक नही पड़ता. ‘नागरिक-भावना’ या कहिये कि ‘सिविक-सेन्स’ अभी पर्याप्त रूप से विकसित नही हुआ है.

Yeh Jo Desh hai tera…….

(… जिन्हें नाज़ हैं ‘संसद’ पर वो कहाँ है,)
हमने देखा कि अन्ना के आंदोलन के दौरान पिछले कुछ दिनों में अचानक ‘संसद’ के प्रति कुछ लोगों का प्यार उमड़ आया . संसद कि गरिमा , संसदीय व्यवस्था ,इत्यादि के प्रति कुछ लोग जागरूक हो गए हैं. इनमें कुछ उच्च पदस्थ लोग जैसे की पूर्व न्यायाधीश भी शामील हैं.
यहाँ मैं एक चीज़ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि संसद के प्रति हर भारतीय कि निष्ठा और खासकर  सामान्य जनता कि निष्ठा, विश्वास, एवं ‘भारतीय संसद’ का अभिमान किसी भी नेता या ‘मौकापरस्त’ और ‘स्वार्थी’ लोगों से से ज्यादा ही है.
हमारी संसदीय व्यवस्था पर हमें नाज़ हैं, हमारे देश के ‘संविधान’ जैसा ‘संविधान’ शायद ही दुनिया में किसी देश का हो. हमारे ‘संघीय’ ढांचे पर भी हमें गर्व है.
और इसीलिए जब कभी भी हमारी ‘संसद’, ‘संसदीय’ व्यवस्था या फिर हमारे ‘संघीय ढांचे’ का अपमान होता हो या इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कार्य होते हो तो हमें इसका कड़े से कड़े शब्दों में विरोध तो करना ही चाहिए एवं इसकी रक्षा के लिए भी आगे आना चाहिए.
तो इन अचानक जागृत हुए सभी महानुभावोंसे मैं पूछना चाहतां हूँ कि ‘संसद’ के ऊपर हमले के आरोपी अभी भी सजा से वंचित क्यों है. जो लोग संसद पर हुए हमले में शहीद हुए थे उनके घरवालों कि क्या आपने कभी सुध ली? शहीदों के रिश्तेदारों को आवंटित किये गए पेट्रोल पम्प तक में घोटाले हुए या उनसे हड़पने कि कोशिशे हुई, उस समय आपने कुछ किया?
या तो फिर जब संसद में हमारे सम्मानीय सांसद बार बार गैर हाजिर होते है, महत्वपूर्ण मुद्दों कि चर्चा के समय सोतें हैं, बिना कारण ‘वाक आउट’ करतें है, जनता कि गाढ़ी कमाई का करोड़ों रूपया पानी कि तरह जब बहाया जाता हैं, तब आप क्या करते हैं? तब संसद कि ‘गरिमा’, इसकी ‘पवित्रता’ का आपको स्मरण नहीं होता है क्या जनाब?
देश में कई लोगों को एक समय का भर पेट भोजन तक नहीं मिलता हैं और हमारे सांसद ‘रिआयती’ दरों पर संसद कि कैंटीन में ‘लज़ीज़’ खाना उड़ाते हैं. तब आप विरोध प्रकट क्यों नहीं करते?
वैसे तो किसी भी ‘राष्ट्रहित’ या ‘सामान्य जनता’ के हितों के मुद्दों पर हमारे सांसदों में ‘एकता’ नहीं होती पर खुद के भत्तों कि बढ़ोतरी के समय सब सांसद इस पर मुहर लगाने के लिए अभूतपूर्व (!) ‘एकता’ का प्रदर्शन करते हैं, कैसे?
जब सांसद ‘संसद’ में ‘अभद्र’ भाषा का प्रयोग करते हैं, ‘रुपयें’ उछालते है, ‘धींगा-मुश्ती’ करते हैं, और देश का ‘बेशकीमती’ समय बर्बाद करतें हैं, तब ‘संसद’ और ‘संसदीय व्यवस्था’ कि ‘गरिमा’ का आपको विचार आता है?
क्या तब आपको ‘संसद’ के ‘सम्मान’, इसके ‘अस्तित्व’ कि याद आती है, इसके ‘पावित्र्य’ का ख्याल आता है?
कई साल पहले साहिर कि लिखी हुई पंक्तियाँ मुझे याद आती है .. ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है?’
इसी तर्ज़ पर संसद के मान –सम्मान से जुडी कुछ बातें मेरे जेहन में आयी..कविता के रूप में;

.. हैं सजा से दूर संसद के हमलावर अभी भी,हैं बर्दाश्त हमको मुंबई के कातिल भी देखो, और शहीदों के परिवार की मुश्किलों को तो समझो,जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ हैं .. कहाँ है..कहाँ है?
ज़रा इन सांसदों के बंगले तो देखो, इनकी ऐशो-आरामी के साधन भी देखो, और हमारे बेबस किसानों की लाचारी को समझो, जरा इनकी हालत पर कुछ तरस तो खाओ … जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है?,
जब संसद में उछले थे नोटों के बन्डल, लगी ठेस दिल को हुए हम थे घायल, यह मुद्दों पे शोरगुल -सदस्यों का दंगल, जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है, कहाँ है,

… जरा संसद के रहबरों को बुलाओ, यह नए-नए घोटालों कि फेहरिस्त दिखाओ, कैसे-कैसे लूटें वोह पब्लिक के पैसे बताओ, जिन्हें नाज़ है संसद पर उनको लाओ, …. कहाँ है,  कहाँ है,  कहाँ है!

Yeh Jo Desh hai tera…….

(लोकतंत्र का ‘अमृत-मंथन’ और ‘नीलकंठ’ अन्ना)
●अन्ना के आंदोलन ने देश में एक भूचाल सा ला दिया है, देश में एक नयी लहर और नव- चेतना का संचार हुआ है. बरसों की निकम्मी व्यवस्था को उखाड फेंकने के लिए देशवासी सुसज्ज हो गए हैं. यह एक अच्छी शुरूवात है. और सबसे बड़ी बात है की लोग इस देश को ‘अपना देश’ मानने लगे है! अपने घर में फैली हुई ‘गन्दगी’ को हमें ही साफ़ करना पड़ेगा, हम खुद करेंगे तो ‘सफाई’ और भी ‘दिल-से’ और ‘अच्छी’ होगी, दूसरे के भरोसे रहेंगे तो ‘संतुष्टि’ नहीं मिलेगी.
●७४ वर्ष के अन्ना के साथ जब पूरा देश खड़ा है, तब , नयी पीढ़ी – हमारे युवाओं का इस आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना देश को एक नयी दिशा प्रदान करता है और आने वाले दिनों हमारे सांस्कृतिक,सामाजिक, और सार्वजनिक जीवन में एक ‘परिवर्तन’ का संकेत भी देता है. असल में यह एक लंबे संघर्ष की शुरुवात भर है. अभी और बहोत समस्याएं हैं जिनका समाधान होना बाकी है.
●ताज्जुब की बात है कि ‘कांग्रेस’ जैसी सबसे ‘पूरानी’ पार्टी ‘जन-लोकपाल’ के इस मुद्दे को समर्थन देने में पीछे क्यों रह गयी या हिचकिचाहट किस चीज़ की और क्यों है. मैं तो कहता हूँ कि मनमोहन सिंह जैसे हमारे सम्माननीय प्रधानमंत्री को ही सबसे पहले इस ‘जन-लोकपाल बिल’ का समर्थन करना चाहिए और अन्ना के साथ अनशन पर बैठकर इसे लागू करना चाहिए. मैं प्रधानमंत्री जी का आह्वान करता हूँ कि अपनी ‘अंतरात्मा’ आवाज़ को सुने और देश के हित में इस ‘जन-लोकपाल बिल’ को लाकर एक नया इतिहास बनाये.
दलीय राजनीती से ऊपर उठ कर सभी सांसदों से भी अनुरोध हैं कि वे अन्ना कि लड़ाई में शामिल होकर अपना योगदान दें. और जो शामिल नहीं होते हैं ऐसे सांसद, विधायक या नेता को जनता कृपया अगले चुनाव में चुनकर नहीं लाएं, अन्यथा यह देश के साथ बहोत बड़ी ‘गद्दारी’ होगी और ‘शहीदों’ की आत्मा हमें कभी माफ नहीं करेगी.
●वैसे वर्तमान स्थिति में कई राजनीतिक पार्टियां चाहती तो अपने आपको सच्ची ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी और जनता कि ‘सही नुमाइंदगी’ करने वाली पार्टी के रूप में अपने आपको स्थापित कर सकती थी पर उनमे ऐसी इच्छाशक्ति जागृत हो नहीं पायी. और तो और ‘भाजपा’ जैसी ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी भी स्तिथियों का सही आकलन कर- पार्टी लाइन से ऊपर उठकर ‘भ्रष्टाचार’ को एक समग्र ‘राष्ट्रहित’ का मुद्दा बनाकर,भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन को एक प्रभावशाली नेतृत्व दे सकती थी. देश में ‘संपूर्ण क्रांति’ एवं ‘नव-निर्माण’ का वातावरण तैयार कर सकती थी. पर ऐसा नहीं कर ‘भाजपा’ ने अपने को ‘कांग्रेस’ के विकल्प के रूप में स्थापित करने का मौका भी खो दिया हैं.
●एक दो दिन पहले हमारे प्रधानमंत्रीजी ने कहा था कि लोगों को जो भी कहना है वो अपने सांसदों के मार्फ़त ही कहें, क्या हमारे प्रधानमंत्री ज़मीनी हकीकत से इतने दूर है कि, यह भी नहीं जानते कि एक बार चुनाव जीतने के बाद सांसद अपने मतदार क्षेत्र भी नहीं जाते ,लोगों से मिलना तो बहोत दूर कि बात है. वे केवल अपने चेले-चपाटों और चमचों के साथ घिरे रहते हैं और ‘भ्रष्टाचार’ के नए नए तरीके खोजने में लगे रहते हैं. ‘आम आदमी’ या उसकी समस्याओंसे  ‘सांसदों’ को कोई लेना-देना नहीं रहता. अगर सांसद अपने क्षेत्र एवं अपने लोगों की सुध लेते तो आज यह नौबत ही नहीं आती.
●कई लोगों ने अन्ना के आंदोलन का विरोध करने के बहाने ‘संसद की गरिमा’ एवं ‘संसदीय व्यवस्था’ की दुहाई दी. जिस संसद में ५४३ में से १८२ सांसद ‘दागी’ हो उस संसद की भी कोई ‘गरिमा’ है क्या?, जिन पर लूट, बलात्कार,हत्या,अपहरण,यौन शोषण जैसे अपराध दर्ज हो या इस तरह कि साजिश में शामिल होने वाले लोग संसद में हो तो संसद कि पवित्रता कैसी? कुछ लोग अपने आपको ‘बाहुबली’ या ‘दबंग’ सांसद या ‘विधायक’ कहलाने में फक्र महसूस करते हो और जिन पर ‘संगीन’ से ‘संगीन’ आरोप लग रहे हो, तो यह कैसी ‘संसदीय व्यवस्था’.
१२० करोड जनता को धत्ता बताकर पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस के दिग्विजय सिंह,अभिषेक मनु सिंघवी,प्रणब मुख़र्जी,पवन बंसल,सलमान खुर्शीद,कपिल…’कुटिल’ सिब्बल,चिदंबरम, अम्बिका सोनी तथा अन्य ने जो वैचारिक दिवालिएपन का उदहारण दिया है वह घृणास्पद हैं. साथ ही राजनीती के गिरते स्तर का द्योतक तो है ही.
●सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्ना के स्वास्थ्य की जिम्मेवारी किसकी है, उनके दिन-ब-दिन बिगड़ते स्वास्थ्य से अगर उनको कोई खतरा उत्पन्न होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेवारी  हमारे देश के प्रधानमंत्री एवं ५४३ सांसदों की होगी, जिन्होंने स्थिति को इस हद तक बिगड़ने दिया. हमारे देश को अन्ना जैसे महापुरुष कि सख्त जरुरत हैं और उनके स्वास्थ्य को इस हद तक खराब करने के लिए सीधे तौर पर सरकार और विपक्ष दोनों का ही हाथ है या साजिश भी हो सकती है. क्योंकि हमारे राजनीतिज्ञ खुद का स्वार्थ छोड़ और किसी के प्रति संवदेनशील कभी रहे ही नहीं.(कुछ विरले ही अपवाद हो सकते हैं).
सत्ता का नशा कुछ इस कदर हावी हैं हमारे राजनेताओं पे कि इस देश को इन्होने अपने व्यक्तिगत ‘जागीर’ समझ रखा हैं और जनता को अपनी पैरों कि जूती. अब वक्त आ गया है कि जनता इस नाकारा व्यवस्था को ‘पटखनी’ दे और अपने खुद के चुने हुए प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाये और हर चीज़ का जवाब मांगे. आओ हम सब एक स्वस्थ ‘लोकतंत्र‘ कि स्थापना के लिए हमारा योगदान दें.
हमारे लोकतंत्र के इतिहास में यह ‘अमृत-मंथन’ का क्षण हैं, इसमें से क्या बहार आएगा और किसे क्या मिलेगा यह तो वक्त ही बताएगा. इसमें असली ‘देवता ‘ कौन और ‘दानव’ कौन यह पहचानना भी मुश्किल है क्योंकि कुछ परदे के भीतर हैं कुछ बाहर हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं की ‘विष’ प्राशन करनेवाला ‘नीलकंठ’ हमें ‘अन्ना’ के रूप में मिल गया हैं. और जरुरत इसी की हैं. क्योंकि हम में से कई बहोत कुछ चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते. फिर इतनी हिम्मत, इतना हौंसला, इतना संयम… यह सब कौन करेगा, इसीलिए हर वक्त में या कालखंड में हमें एक ‘हीरो’ की तलाश रहती हैं, जिसके पीछे हम चल सके!
और इश्वर भी अपना वचन पूरा करने और पापियों का नाश करने किसी भी रूप में अवतार ले लेते हैं. शायद इसीलिए कहते हैं की हमारा देश किसी दैवीय शक्ति के भरोसे चल रहा हैं.

Ganpati Bappa ‘Maria’

-by Scrapwala ,07.11.10

While watching this news on television that ‘US President Barrack Obama-during his visit to Mumbai- had invited Mr.Rakesh Maria –Maharashtra ATS Chief, I feel very proud about this IPS Officer and simultaneously many questions came to my mind viz. Why President Obama was curious to meet Mr. Maria – (breaking the protocol, as he should have called on the DGP) – certainly he would have heard about Mr.Maria and his style of functioning and talent this man possess.(Here we could learn and take inspiration from both of these personalities as they have succeeded against all odds).

Secondly the style of Obama, as we saw him enthusiastically and passionately mixing with our people and very selectively he invited the talented people, which also shows he is eager to share his experience and also learn from their experiences and Third and most important thing according to me is the culture of giving value to hard work and recognize talent, recognizing merit, competency and performance. Whereas in our society the balance is more on the side of sycophancy and carrying undeserving people and not recognizing talent and merit. We tend to ignore and loose talented people during their lifetime and praise them only after when they are no more or we only came to know when they are acclaimed by foreign countries.

I am sure we all would agree that during his 29 years long service in the Indian Police Services Mr. Maria would definitely have gone through all the political pressures and pressures from various influential groups and still he has managed to keep his performance above the level of expectations and still continuing to do better.

I remember when I was doing my college at Akola-Maharashtra in 1983 to 1985; Mr. Maria was posted at Akola as an ASP. He was very popular among the people as he had come down heavily on criminals, the ‘satta/matka’ and on the anti social elements. In Colleges we as Student then use to talk and hear the stories of how disciplined Mr. Maria was and how he got control over the local ‘gundas’.

People in Akola and Students like me used to gather along roads of the ‘City-Kotwali’ to get a glimpse of this man. There is a bridge in Akola near the ‘city-Kotwali’ known as ‘lokhandi-pool’ (Iron bridge, across the ‘Morna’ river,another is ‘dagdi’ pool also a old one), people use to gather every evening on these locations around the ‘City-Kotwali’ to see this tall IPS Officer and that year people celebrated the Ganesh Utsav with much vigor and enthusiasm, the citizens of Akola very happily and cheerfully praise the ‘Ganpati Bappa’ and that year it was ‘Ganpati Bappa – Maria’ all over , instead of ‘Ganpati Bappa – Moria’.

Shame on you Mr.Politician

Shame on you Mr.Politician,

The reply given by the Ex-Chief Minister Haryana Mr.Omprakash Chautala in reply to the Ruchika case verdict today on camera, clearly indicates how politicians are unsentimental to the people who elect them.’In muddon ke liye hamare pass time nahi hai’ was the reply of the Ex-CM.

For what matters has he time? Or for that case take our other politicians what are they for?
Do they take ownership for their people? Do they feel as cheated, raped, ransomed, looted, ragged and even murdered as the common citizen feels in his day to day life?

This particular mentality and apathy to the people is the root-cause for many problems we as the people faced in our daily life. That is why we see the crime-graph going up everyday and we ‘the people of India’ suffer and suffer.

Think over the tragedy and trauma the girl has to go and commit suicide, and what punishment did the DGP get for this heinous crime. Yes I repeat this is more than heinous crime and persons who commit such crimes should be treated as equal to the terrorists. Nobody can return back the dignity to the girl harassed and sexually assaulted, the trauma the helplessness the frustration they feel is more than the bullet shot at by a ‘terrorists’, and then our great ‘tolerance’ further allow such criminals to easily smile and continue their dirty-doings cheerfully forever!

And reminding us that we are still to wake-up…………………..respond the call and respond  unitedly.
We can congratulate Aradhana the friend of Ruchika to fight her case and fight for justice, but her fight will be more fruitful if all of us join her and contribute as we can and contribute wherever we can to bring to books the hidden insider terrorists in our country.

Sustain with Nature

on Environment day… 5th June, 2009

I believe in permanent change which can be achieved
through people’s minds, and mind power

Let our minds be ‘ignited’
as the ‘lightening thunder’ and ‘pure’ as a ‘morning dew’,

Let ourselves be disciplined
as the ‘day-night cycle’,

Let our attitude be positive as the
‘river flows’ , let our acts ‘shine’ as the ’bright sun’,

Let us build our ‘character’
as ‘clean’ as we would like the ‘environment’ to be,

Let we Become ‘sincere’, ‘religious ’,‘impartial’, ‘judicious’ and
‘bountiful’ and ‘equal’ to all  as the ‘NATURE’ is,

Let us be ‘ natural’ as the ‘Nature’

Let We remain behind like the ‘soothing breeze’ and
‘our Memories’ be cherished as the ‘fragrance of flowers’… Forever…
…and No ‘green house effect’ ever ‘Suppress’
our commitments towards the ‘environment’- We live in,

Let we raise a ‘global warning’ for ‘change’ before the
‘climate-Change’ threatens our ‘survival’.

REMEMBER…
‘polluted minds’ create ‘contaminated character’ and ‘hazardous culture’
and increase the ‘societal garbage’
which percolates to generations and ‘Generations’
pay the price through ‘chronic situations’

…hence,

Let the ‘pure’ minds come together to ‘preserve the Nature’