May be…

I know it’s still the heart of mine,
That wishes for you to be around

I know its never gonna happen
That I will search for you near and you will be found

May be I am thinking too much at this time
May be you are the only one I need for now,
May be it’s the touch that brings me close,
May be it’s the feeling I don’t wanna lose anyhow,

Feels to be complete when near
Feels to be insecure when far
Feels like it won’t last for ever
But I still don’t want to fall apart…

Feels like I was nothing for you
But for me you really meant
I tried stopping you from going away
But you still left me and went…

Feels like I am going a step away from myself every time
And neither coming near to you
But just left far behind…

I know situations are not like
As I wanted them to be…

Maybe you were always around
Maybe I couldn’t ever see …..

आरक्षण … (Reservations Unlimited!!)

(My old post of 06.08.2011 (then published on nai-aash.in  ) being re-blogged today)

आरक्षण का ज़ोर है, आरक्षण का शोर है,
आरक्षण का देश हमारा, आरक्षण चहुँ ओर है,
‘आरक्षण’ चाहे तो करवा दे ‘चक्का जाम’,
आरक्षण के बिना नहीं चलती यहाँ ‘सरकार’ तमाम,
यह ‘दान’ है या ‘वरदान’, नहीं जानता मैं,
पर दे दो मुझे भी ‘आरक्षण’ लो आज मांगता हूँ मैं,
मेरी ‘सूची’ चाह कर भी ‘छोटी’ नहीं होती,
‘आरक्षण’ चीज़ ही ऐसी है कि ‘लालसा’ मेरी ‘कम’ नहीं होती,

क्या नहीं मिल सकता आरक्षण ‘अन्न’ का उनके लिए,
जिन्हें नहीं है नसीब दो वक्त की रोटी भी,
क्यों न कर दे रोज़गार आरक्षित बेरोजगारों के लिए,
और ‘सहारे’ कर दे आरक्षित ‘अनाथ’ बच्चों के लिए,
दे आरक्षण महिलाओं को शोषण और हिंसा से,
बचाएं बालिकाओं को छेडछाड और दहशत से,
‘कोमल’ सपनों को ‘बचालें’ ’रैगिंग’ के ‘दानव’ से,
हर जख्मी को मिले उपचार का आरक्षण,
‘न्याय’ रहे आरक्षित बेगुनाह और पीड़ित के लिए,

आओ कर दें हम आरक्षित इस देश के लिए,
सच्चे नागरिक,सत्यप्रिय और ईमानदार जन सेवकों को,
बहादुर-जांबाज़ सिपाहियो के लिए सम्मान को और
उनके परिवार जनोंके लिए समाज में गौरव को,
देश को रखे दूर ढोंगी-स्वार्थी -भ्रष्ट नेताओं से,
रहे सतर्क हमेशा लालची राजनीतिक पार्टियों से,
हम समाज को दें ‘हिंसा-मुक्ति’ का आरक्षण ,
रखे सुरक्षित इसे लूट-अपहरण-डकैती-बलात्कार से,
और जनता को बचाएं,आतंकवाद तथा दुर्घटनाओं से,

इस पूरी प्रणाली को बचाएं नपुंसक नाकारा लोगों से,
आओ इस धरा को रखे सुरक्षित प्रदुषण के खतरों से,
इंसानियत को दे आरक्षण सदभाव और प्रेम का,
‘सामान्य जन’ को दे आरक्षण ‘जीवन’ और ‘विश्वास’ का,
आशा को मिले विश्वास का, विश्वास को श्रद्धा का,
श्रद्धा को समर्पण और समर्पण को सम्मान का,
विकास को समृद्धि और समृद्धि को प्रगति का,गर मिले आरक्षण
– नहीं होगी इस पर कोई ‘राजनीती’ जब,
सही मायनों में सफल होगा ‘आरक्षण’.. तब !

Silence Speaks ..!!

There is nothing to See
Nothing to Say
Just the Universal language
Speaks it Loud,
It says that there is a World
Far beyond

Beyond the Right and Wrong
Of this World,
A World which discriminates none
And takes all as One…

A World beyond the Real and Fake,
Where nothing needs to be Given and
Nothing to Take…

‘किरमिच’ … ( ‘Canvas of Life’ )

समय कि कूंची चली है
यादों के दृश्य बिखरे है
जिंदगी के ‘किरमिच’ पर
आज कई रंग उभरे है

रंगीन कुछ
कुछ काले,
कुछ निखरे
कुछ धुन्धलाये
लेकिन सब ऐसे, जैसे
दिल खोल के जी आये

कई जज़्बात इनमे बोल रहे है
रिश्तों कि कहानियां कह रहे है
उम्र के पड़ाव इनमे झलक रहे है
हर दौर का हिसाब मांग रहे है

मेरे तब का मैं
और मेरे अब का मैं
दोनों आमने सामने है
सवाल भी मैं
और जवाब भी मैं
फिर भी उलझनें बाकी है

लगता है एक उम्र गुज़र गयी
कभी लगता है कि
अभी तो जिंदगी शुरू हुई,

या फिर कट चुकी है आधी
और बाकी है आधी,
‘चितकबरी’‘किरमिच’
टंगी हुई दीवार पर

हौसला

पेंच उलझते जा रहे थे
मुश्किलें बढती जा रही थी
बर्दाश्तगी छटपटाने लगी थी
सांस घुंटने लगी थी
लगता था जैसे हर मोड पर
साज़िश शतरंज बिछाये है,

मैं दांव चल नहीं रहा था
और वो जीत कि ग़लतफहमी में थे
मैं गिरती इंसानियत देख रहा था
वो गुलाम कि अकड पर हैरान थे,

हाँ, आखिर, थे तो हम गुलाम ही ,

मैं मुट्ठी भर भर हिम्मत जुटा रहा था
सपने तिनका तिनका फिसल रहे थे
मैं परबत परबत हौसला जुटाने लगा
सपनों के महल डगमगाने लगे
मायूसी रोज़मर्रा हो गयी
बार बार जो वो मेरे वजूद कों ठुकराने लगे

लेकिन, यही वक्त था कि,
मैंने सीने में हौसला भर लिया
और ‘बगावत’ कर ली
उनकी मालिकियत ठुकरा के
अपनी जिंदगी, अपने नाम कर ली

The moment

In the Midst of chaos all over,
But somewhere the silence surrounds,
Making seem everything still,
Making each Moment for now to be drowned…
Drowned in the touch
That the soul felt before,
Drowned in the memories
Making feel alive each time more…

It’s like everything at this moment
Says a lot,
But got no word for now to speak,
It’s like the feelings are quite intense
Making the warmth around to be bleak…

The heartbeats are felt just too loud,
There is hollowness deep inside,
Making the silence grow deeper
Making feel as if the heart never cried…

बाज़ार, व्यापार और गणतंत्र !

हम एक ‘गणतंत्र’ है
हमारा ‘अपना’ एक ‘मंत्र’ है,
हमारी अपनी ‘संस्थाओं’ के प्रति
हमारी ‘बेरूखी’ ‘अनोखी’ है,
इसीलिए देश में जो कुछ होता है
उसमे ‘अपने बाप का क्या जाता है’
‘होने दो जो होता है’
‘कौन किसके लिए रोता हैं’
‘यार सब चलता हैं’…

‘आबादी’ बढती है
‘नए शहर’ ‘पैदा’ होते हैं
‘ज़मीन’ के भाव कुलांचे मारते है
‘कंक्रीट-जंगल’ के दलाल खुश होते है,
‘रंग-बिरंगी’ सपने और
‘खोखली-जगमगाहट’ के ‘काम्प्लेक्स’ में
‘पर्यावरण’ और ‘प्रदुषण’ जैसे मुद्दे
‘फाइलों’ कि तरह गायब हो जाते है,
‘राजनीति’ इसीको ‘विकास’ कहती है

पर ‘कुदरत’ कहाँ
‘भेद’ करती है,
‘आपदा’ आती है
‘शहर’ डूब जाते हैं
‘इंसानियत’ ढूँढने से नहीं मिलती और
‘नीति-मूल्यों’ कि रूहें कांपती है,
‘लाचारी’ कों ‘बाज़ार’ निगलता है
रोते-बिलखते ‘मासूम’ ‘बिसात’ पर है
‘जिंदगी’ दम तोड़ रही है,
‘शेयर-बाजार’ में ‘सूचकांक’ बढ़ रहा है …

सुहाना सफर …. Suhaanaa Safar

This is poem is dedicated to the magical blog ‘atul’s bollywood song a day – with full lyrics’

Congratulating Atul ji and his team on reaching 10,000 songs on Jun 19, 2013 – atulsongaday.me and wishing a very happy musical journey ahead …

गाडी आयी गाडी आयी
अतुल जी कि गाडी आयी
सात सुरों का सागर लायी
मन में उमंगें हज़ार लायी

इसका इंजन समय का पहिया
डिब्बे सारे बदलती घड़ियाँ
इन डिब्बों में कई कहानियां
यादों कि कई जिंदगानियाँ

सुख दुःख के खजाने से
गहरी समय कि धारा से
किस्से अनगिनत कलाकारों के
मनोरंजन,त्याग और तपस्या के

तेरे मेरे कितने सपने
बचपन के वो दिन सुहाने
जवानी के वो दिन दीवाने
गाएँ मिलकर जो तराने

अपना स्टेशन आये तो उतरना
देख मुसाफिर भूल न जाना
फिर इस गाडी में आना
प्यार हमारा साथ ले जाना
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Gaadi aayi gaadi aayi
Atul ji ki gaadi aayi
Saat suron ka saagar laayi
Man mein umangen hazaar laayi

Iska Engine samay ka pahiyaa
Dibbe saare badalti ghadiyaan
In dibbon mein kayi kahaaniyaan
Yaadon ki kayi zindagaaniyaan

Sukh dukh ke khazaane se
Gehri samay ki dhaara se
Kisse angeenat kalaakaaron ke
Manoranjan, tyaag aur tapasyaa ke

Tere mere kitne sapne
Bachpan ke wo din suhaane
Jawaani ke wo din deewaane
Gaayen milkar jo takraane

Apna station aaye to utarna
Dekh musaafir bhool na jaana
Phir  is gaadi mein aana
Pyaar hamaara saath le jaana
***

उम्मीद

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पे दुनिया कायम हैं,
इसलिए है उम्मीद तुझसे ही मेरी, कि जैसे है,
सृष्टि को नियम से,
नियम को परिश्रम से,
तपिश को ठंडक से,
रेगिस्तान को हरियाली से,
क्षुधा को खुराक की,
तृषा को जल से ,
लहर को किनारेसे,
निराशा को है आशा से,
धरती को सूरज से,
अग्नि को वायु से,
इंसान को इंसानियत से,
आत्मा को परमात्मा से,
और रिश्तों को ‘विश्वास’ की है उम्मीद !
यह रिश्ता टूट न जाये कभी,
बंधी रहे डोर पंचतत्व की इस जीवन से,
चलता रहे कारवां जिंदगी का यूँही,
यही सोचकर,
आज,
फिर ‘उम्मीद’ के ‘बादल’ घिर आये है,
और छायी है ‘घटा’ ‘विश्वास’ की,
लुटा दे हम पर तेरी ‘दया’ का ‘सागर’,
……… बरस जा अब तो !

(This poem was earlier posted on  nai-aash.in  and somehow it missed here, so re-blogged today with a hope that all these prayers reach to the God and he showers his blessing on us – on all of us)

‘A long way to go…..’

Celebrating 100th Post on Samajshilpi !

Congratulations to Samajshilpi! Congratulations to all associated with this blog!!

As we were approaching for the 100th post on Samajshilpi I was thinking of some special post and what would be the topic for this post.

However on a very perfect time I got this post from my daughter Ashwini and I am glad to post this as the 100th post on this blog, as she have been the other ‘main contributor’ on this blog.
Ashwini started writing when she was studying in VII Th, and with this blog she has also completed ‘Five’ years of ‘writing’.
The number of her posts gradually reduced due to her studies and in between her clearing out the board exam for X Th and now she has this another crucial year of XII th.

So, I cannot demand more from her, and over the years my tone has also changed from ‘is topic par likho or kuchh likhkar dena’ to ‘tumne kuchh likha kya?’ to ‘Kuchh likha ho to bataana’! (For keep continuing the posting new posts on the blog, as my posts were also reduced due to work priorities).

Though I have got at least 3 posts ready, there timing is to be matched with posts on my other networked blog.

I thank my friends Shri.Ashish Tilak and Shri.Bharat Bhatt for their continued support to me.
Also I thank Shri.Raja, Shri.Jigar Modi for their contribution and posts.

So, very happily presenting herewith this post and hope to see your comments and feedback thereof…

And thanking you all the readers, well wishers and supporters for appreciating this blog.
–    Avinash Scrapwala

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‘ A Long Way To Go …’

Can’t figure out, what to say,
Can’t figure out to go which way,

The more I feel I’m through it all
Situation tend to be the same again,
The more I decide to be quite somehow
All my patience goes in vain!!

‘Why again me?’ is not what I’m asking
It’s not that I want to get rid anyway,
Blaming you-‘my life’, is not what I’ll do
But I’ll try to understand what you want to convey…

When it really feels I’ve unfolded the mystery
That’s the point where life takes a turn,
When I say to my life that I’ve learned what you taught me
That’s when life shows me I still have “so much to learn”!

Can’t figure out what to say
Because my feelings are what, I really don’t want to show,
Can’t figure out to go which way,
Because it is still ‘A very long way to go……’ !