क्रांति तीर्थ

झांको कभी उनके जीवन में भी ज़रा
झोंक दिया जिन्होंने जीवन को अपने,
और अर्पण कर दिया अपना सब कुछ,
मातृभूमि के चरणों में

कितने अनाम हुए शहीद
कितनों के नाम भी हम भूल गए,
हमें आज़ाद देखने की धुन में,
वो दीवाने गुमनाम हो गए,

शरीर कों त्याग तो दिया
गुलामी के साये में
और अंतिम क्षणों में नहीं थी
गोद मातृभूमि की,
कसक रह गयी मन में
माँ कों आज़ाद देखने की

आत्मा उनकी लेकिन गाती रही,
स्वरलहरी स्वंतंत्रता की
जड़ें हिला दी पूरब ने
पश्चिम के साम्राज्य कि

शरीर नहीं तो क्या हुआ
उन वीरों कि ‘अस्थियां’ ही सही
आज माता कि गोद में हैं
‘अस्थि-कलश’ में समाया
वो सर्वोच्च ‘बलिदान’,
वो ‘त्याग’,
वो ‘इन्कलाब’
माता के चरणों में अर्पित हैं

( भेंट १९.०२.२०१२)

मैं पतंग बन जाऊँ… 2…

I get to travel a lot due to my postings at various places, which give me a chance to know of the ‘diverse’ culture and traditions of our country.

I realized how rightly it is said ‘Unity in Diversity’.

This poem was a result of the thoughts that came to my mind during such long journeys, by train of course, I took time to time.

When this poem was posted (on 12.02.2011), there were some more thoughts that I had gathered, but this remains to be edited and so were not posted at that time.

Recently when this poem reached 1000 views on our Gujarati Blog nai-aash.in . I thought it would be more appropriate that I share the balance part of this poem to acknowledge the love and affection given to me by the readers and well wishers of these blogs; (Meanwhile the post has reached more than 2000 views on nai-aash.in)

(And with sincere apology to my friend Ashish, whom I had promised that the part-II would be there soon, but due to a more than hectic schedule at work front, I could not send it to him in time. Ashish, today here it is!!)

मैं कितने नगर घुमा और कितनी राहों से गुजरा
जी करता है मैं पतंग बन जाऊं
और दूर दूर तक घूम आऊँ

मैं भारत के हर गाँव कों जी लूं
वहाँ के जीवन में बस जाऊं
रेल कि पटरियों के किनारे से
गुज़रती है जो पगडण्डी
उस राह पर नीम का पेड बनकर
छाया करूँ और लहराऊँ

कभी खुले आसमान के नीचे रात गुजारूं
‘बंजारा’ बन कर,
भेड-बकरियों-ऊंटों कि बातें सुनूं
इस निर्मल धरा में घुल-मिल जाऊं
और महक उठूँ हवा के झोंकों के साथ

मैं हर छोटी छोटी खुशियों में बस जाऊं ,
टूटे हुए ख़्वाबों कों जोड़ कर
‘हौंसलों’ में नया जोश भर दूं
प्रेम और सद्भाव का सन्देश पहुंचे हर इंसान तक
यही लक्ष्य लेकर तैर जाऊं मैं जीवन सागर,

जी करता हैं कभी मैं
स्तंभ बन जाऊं अनुशासन का और
जब मंदिरों में मचती हैं भगदड़
वहाँ लोगों कि जानें बचाऊँ,
भीड़ में कुचले जानेवाले
हर इंसान कि मैं ढाल बन जाऊं!
समझते हैं लोग अगर पंछियों कि भाषा
मैं कबूतर बन जाऊं
अमन और चैन का सन्देश फैलाऊं!

(मुझे कच्छ में आये हुए अभी दस साल पुरे होने जा रहे हैं. कच्छ कि धरती, कच्छ के लोग और कच्छ के जन-जीवन से मेरा बहुत लगाव रहा हैं, निम्न पंक्तियाँ इसी कों समर्पित हैं..)

काला डुंगर से निगरानी करूँ मैं
सरहद के इस छोर कि
और जकड लूं मैं दुश्मन के पैरों कों
कच्छ का सफ़ेद रण बन कर,
कोट-लखपत से ललकारूं मैं
गर दुश्मन करें हिमाकत कोई
मैं हर फौजी का साथ दूं
मैं हर दुश्मन कों मात दूं
मैं सरहद पर छा जाऊं
मैं भारत-भारत बन जाऊं
मैं हिंद-हिंद बन जाऊं

Zindagi

Har pal ek nayaa mod hain zindagi
Har Subah ki ek nayi kiran hain zindagi
Samundar mein behti lehron ki tarah
Behti huyee ek lehar hain zindagi

Deti hain kayee jakhm ye
Aur unhi jakhmon ko sina sikhaati hain
Tute huye rishte, bikhre huye palon ke saath
Unhe samet kar aage badhna sikhaati hain

Har pyaari muskaan mein basi hain zindagi
Har nazar ke liye alag hoti hain zindagi
Haath se fisalti ret ki tarah
Mehsoos hoti wo ret hain zindagi

Har pal ek nayaa mod hain zindagi
Har subah ki ek nayi kiran hain zindagi
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जिंदगी

हर पल एक नया मोड हैं जिंदगी
हर सुबह कि एक नयी किरण हैं जिंदगी
समंदर में बहती लहरों कि तरह
बहती हुयी एक लहर हैं जिंदगी

देती हैं कई जख्म ये
और उन्ही जख्मों को सीना सिखाती है
टूटे हुए रिश्ते,
बिखरे हुए पलों के साथ,
उन्हें समेट कर आगे बढ़ना सिखाती हैं

हर प्यारी मुस्कान में बसी हैं जिंदगी
हर नज़र के लिए अलग होती हैं जिंदगी
हाथ से फिसलती रेत कि तरह
महसूस होती वो रेत हैं जिंदगी
हर पल एक नया मोड हैं जिंदगी
हर सुबह कि एक नयी किरण हैं जिंदगी

कर यकीन!

Today 27 th March is the Birthday of our beloved Guru ji Shri.Rooshikumar Pandya Sir!
It has been almost three years now when i got to know about him and his life and also got an opportunity to meet him in person and interact with him.
My father has been a great fan of him ever since he got to know about him and listen to his various audio-visuals, the first being ‘ Do What you want , But Excel!’.
Watching my father watching the audio-visuals of Rooshi Sir, i do keenly listen to his teachings and thereafter i also watch all his DVD/VCDs published till date.
It is not easy to express in ‘words’ , how life has changed for all of us after coming in contact with Rooshi Sir. And yes, i shall never ever forget the day 20th Augugst 2011 when i got a chance to meet him in person for the first time at Vadodara.
I have tried to put up in the following poem what i have learned from his teachings and listening to his lectures.
With due respect and admiration for Shri.Rooshi Sir, i dedicate this poem to Shri.Rooshikumar Pandya Sir. Thanking him for being the source of inspiration for us and wishing him a Very Happy Birthday today!!!

खुद पर कर यकीन,
न शक कर यूं,
न सोच है कमी,
कोई तुझमे कहीं,

थक कर हार न जाना राह में कभी,
तू भी अपनी मंजिल पा सकता है,
मत भूल कि अभी भी,
एक रास्ता है बाकि,
जो ले जाएगा तुझे
अपनी मंजिल के करीब

जाना न कोई इस दुनिया को यहाँ,
कठिन जरुर है डगर,
पर मंजिल पाना,
नामुमकिन नहीं,
तू भी पहुंचेगा एक दिन वहाँ,
जो लगता हैं तुझे के मुमकिन नहीं,

आसमान से परे है,
तेरे ये ख्वाब,
जिनका कोई किनारा नहीं,
हिम्मत न हार लेकिन,
क्या हुआ जो तेरा कोई सहारा नहीं,

आयेंगे ऐसे मोड जहाँ,
न साथ तेरा देगा कोई,
पर मत छोड़ यकीन,
कि तू मंजिल पायेगा,
जीत तेरे सामने होगी
ऐसा दिन आएगा,

खुद से मिल और खुद को पहचान तू,
तेरे जिंदगी के इन प्यारे ख्वाबों को जान तू,

फिर न खोना,
तू खुद को कभी,
मत सोच है कमी,
तुझमे कहीं कोई ….

सपने

दिलकी बात कहते है सपने
दिलकी ख्वाइश दिखाते है सपने
कभी हँसी बिखेर जाते है सपने
कभी आंसू छोड़ जाए ये सपने
कभी सच हो जाए सपने
कभी टूट जाते है सपने
कभी खुश कर जाए सपने
कभी दुखी कर देते है सपने
हर दिन होते है अलग और निराले ये सपने
कभी बुरे तो कभी अच्छे होते है सपने..

आशा

धरती की आखिरी सीमा है उपर जाने की आशा
हर घडी हर पल है कुछ कर दिखाने की आशा |
सीखनी है दुनिया की हर एक अलग भाषा
पता करना है हर एक कोने से भारत का नकशा |
जीना है तो जीयो लेकर नयी नयी आशा ||

दीदी

तीतली का जो है फूलो से नाता,
है ऐसा ही तेरा मेरा प्यार |
होता है झगडा फिर भी लगता है,
कि है हमारा जनमो का साथ |
दीदी तुम्हारे बीना,
नही लगता कही मन |
तुम साथ होती हो तो लगता है की,
आ गये किसी सुंदर वन ||

पर्यावरण

होती है जिसमे सुबह हमारी,
लगती है दुनिया जिससे प्यारी प्यारी,
जो देते है हमे जीवन दान,
हम गाते है जिसके हमेशा गुण गान |
नही हो सकता जिससे हमारा मरण
ऐसा ही होता है पर्यावरण |

जीवन

रंग रूप तो है कहने की बात
क्या दे इसमे लोगो की दाद |

मै भी थी फंसी इस अंजान भँवर में
लगताथा कि आ गइ किसी सुनसान डगर पे |

कहते है लोग की भगवान ने बनाया सबको
और कहतेहै की सब है एक जैसे |

तो क्या होता है रंग रूप, जो होता नही एक जैसा सबके पास,
जाने क्यों है ये जीवन खास |