भ्रष्टाचार जिंदाबाद !!!

आज विजयादशमी के पावन पर्व पर जहां भिन्न भिन्न संगठन विजय दिवस मानते है, रैलियां निकालते है, हमने सोचा क्यों ना ‘भ्रष्टाचार’ कि सफलता में एक रैली आयोजित की जाए.
साथ में ‘भ्रष्टाचार’ से ‘ओतप्रोत’ होकर ‘घोटालों’ में ‘आकंठ’ डूबे ‘नव-उन्माद’ के साथ ‘अति-गौरवान्वित’ होकर एक भाषण भी आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ. ताकि भटक न जाए हम ‘घपलों’ , घोटालों’ और ‘भ्रष्टाचार’ के इस ‘पावन’ रस्ते से और ‘हासिल’ कर ले ‘भ्रष्टाचार’ में वो मकाम कि ‘भारत’ जैसे ‘महान’ देश में पैदा होनेवाली भावी पीढ़ी को इसका स्मरण रहे.
स्मरण रहे, कि जिस भूमि पर केवल ‘२३ साल-०५ महीने-२५ दिन’ कि आयु में देश पर मर-मिटनेवाले भगतसिंह जैसे महान क्रांतिकारी का जन्म हुआ वहीँ पर ऐसे ‘सफेदपोश’ ‘डकैतों’ ने जन्म लिया जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही ‘माता’ का ‘चिर-हरण’ किया और ‘१२० करोड’ कि संख्या में ज़मीन’ पर रेंगनेवाले मानवरूपी मजबूर ‘कीड़ों’ ने यह तमाशा अपनी ‘खुली’ आँखों से , अपने खौलते (?) हुए खून को ‘ठंडा’ कर सालों साल तक देखा. )

(भाषण से पहले)
(पार्श्व में धुन बजती है – ‘मन रे’ गा तू –सी डब्लू जी के गीत, ए जी- टू-जी -थ्री-जी और घपले करो जी, हम काले है तो क्या हुआ कोयले वाले हैं, हम भ्रष्टाचार का एवेरेस्ट चढ़नेंवाले है, अम्मा ! यह छोटे घोटाले तन्दाना – यह बड़े घोटाले तन्दाना.. . कोरस में जानवरों का समूहगान – मेरा चारा खा गए नेता , देखो मेरा चारा खा गए लीडर… कुछ किसानों के परिवार कि सिसकियाँ – कुछ बलात्कार से पीड़ित अबलाओं को चीख-पुकार, जिन्हें दो वक्त रोटी नसीब नहीं होती उनका शोर,
‘प्रशासन’, ‘सु-शासन’ और ‘दुशासन’ कि मारी लाचार जनता का आक्रोश…(अंत में एक थकी हुई कांपती आवाज़ सुनाई देती है ) ‘ ए ‘कोल- ..गेट’ क्या .. है मेरे भाई’, और इतना कोयला कौन खा रहा है, आज खुदा से पूछूँगा…. )

मेरे प्यारे देशवासीयों,

आजकल जोर-शोर से ‘भ्रष्टाचार’ के मामले हर दिन चर्चा में है. नए नए घोटालों के खुलासे हो रहे है. कुछ सिरफिरे लोगों ने हमें ‘सफ़ेद-पोश’ डकैत करार दे दिया है. नित नए कीर्तिमान इस क्षेत्र में नित नए ‘बड़े बड़े नामवाले’ लोगों के साथ जुड रहे है. हर ‘पार्टी’ से इस मुहीम में योगदान भी मिल रहा है. वैसे तो ‘किसानो’ के खुदकशी पर रोने के लिए कभी हम लोग इक्कठे नहीं हुए- तब हम अपनी अपनी पार्टी कि बात करते है- लेकिन भ्रष्टाचार पर एक दूसरे का बचाव करने के लिए राजनेता ‘पार्टी लाइन’ से ऊपर उठकर, ‘अभूतपूर्व’ एकता का प्रदर्शन कर एक दूसरे का साथ दे रहे है. पुरे राष्ट्र में एक ‘भ्रष्ट-लहर’ काम कर रही है, ‘घोटालों’ में नव-चेतना का संचार’ हुआ है.
हमारे देश में अब तक कितने ‘घपले’- ‘घोटालें’ हुए इसकी जानकारी तो आपको हर जगह एवं ‘इन्टरनेट’ पर मिल जायेगी. इसीलिए इसकी चर्चा हम नहीं करेंगे और ना ही इसका हिसाब करेंगे. हम तो बस इसमें और आगे कैसे बढा जायें और कैसे नए कीर्तिमान इस क्षेत्र में स्थापित करें इसका ‘गुण-गान’ करेंगे !!!

चारों तरफ ‘बदहाली’ कि ‘खुशबू’ (?) फिजाओं में घुल गयी गयी है. किसी को किसी कि पड़ी नहीं है. लोग जात –पात, धर्म –मजहब और तो और छोटे छोटे गुटों में बंट गएँ है. रोटी कि जुगाड में आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा इस तरह जुटा हुआ है कि उसे और चीज़ों से कोई मतलब नहीं रह गया है. अपने अपने स्वार्थ के लिए राजनीती में गठबंधन इतने ‘बेशर्म’ और ‘अनैतिक’ हो गए है कि ‘सरकार’ का किसी के ऊपर कोई बस नहीं चलता है, और अगर उसका बस चलता है तो ‘सरकार’ टिक नहीं पाती है. कानून का राज़ खत्म सा हो गया है. ‘मानवाधिकार’ और ‘महिला आयोग’ या ‘बच्चों के अधिकारों कि रक्षा के लिए बनाये गए संस्थान’ ‘किसी सुखद सपने’ कि तरह हो गए है. ‘जुर्म’ इस कदर हावी है कि ‘जिसकी लाठी- उसकी भैंस’ कि जगह अब तो ‘जिसकी लाठी-उसीका राज’ वाली स्थिति आ गयी है.
सामाजिक एकता खत्म हो गयी है. लोगों का एक दूसरे पर से विश्वास उठ गया है. लोग एक दूसरे को मारने पर उतारू है, भ्रष्टाचार के पनपने के लिए एकदम सही माहौल है. नागरिक संवेदनहीनता चरम पर है. सड़क पर इंसान दम तोड़ता है, तो समाज नपुंसक बना देखता रहता है.

लोगों ने देश को राजनेताओं के हाथ सौंपकर इस तरह ‘हाथ’ झटक लिए कि है कि जैसे उनका इस देश से कोई लेना देना ही ना हो.

एक ‘भ्रष्टाचारी’ को ‘जन्म’ लेने के लिए पूरी तरह से उपयुक्त माहौल है. हर रोज नन्हे नन्हे कोमल ‘भ्रष्ट’, घप्लू, और घोटालू जन्म ले रहे है, उन्ही कि हौसला आफजाई तथा देश को भ्रष्टाचार में नयी ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए हमें जी-जान से प्रयास करना है.
हमारे समाज में ‘भ्रष्टाचार’ अब ‘शिष्टाचार’ हो गया है. इसलिए बेहतर होगा कि इसे संवैधानिक दर्जा देकर हर संस्था में लागु कर दिया जाये. भ्रष्टाचार न करनेवाले को इस के लिए तैयार करना हमारी पहली प्राथमिकता और उद्देश्य होना चाहिए, क्योंकि गलती से भी कोई ‘भ्रष्टाचार’ करने से वंचित न रह जाये. ‘सकारात्मक’ भ्रष्टाचार और ‘नकारात्मक’ भ्रष्टाचार पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए ताकि इसमें नयी संभावनाएं पैदा कि जा सके और लोगों को नयी प्रेरणा दी जा सके. धीरे धीरे भ्रष्टाचार को ‘सामाजिक-आर्थिक- राजकीय (इस क्षेत्र में गलती से कहीं छूट गया हो तो)- धार्मिक’ -सभी क्षेत्र में प्रसारित कर इसकी एक ‘आचार-संहिता’ या ‘मार्गदर्शिका’ जिसमे ‘घोटाले’ करने के तरीके और हर काम का ‘कमीशन’ कितना हो इसका भी ‘सविस्तर’ विवरण दिया जाना चाहिए.
‘बलात्कार’, ‘खून’, ‘डकैती’, ‘फूटपाथ’ पर या और ‘कहीं’ लोगों को अपनी कार के निचे कुचलना,किसी महिला ‘कवयित्री’,सहकर्मी या कर्मचारी का ‘शोषण’ कर उसे मौत के घाट उतारना या ‘तंदूर’ में जलाना’, ऐसे या इससे भी संगीन जुर्म कर, कैसे ‘कानून’ के शिकंजे से बचा जाए – इस सब का ‘ट्रेनिंग’ भी दिया जायेगा , ताकि भ्रष्टाचार और जुर्म का ‘चोली-दामन’ का साथ बना रहे.
आगे चलकर फिर ‘सर्वश्रेष्ठ भ्रष्टाचारी’ को चुनना, ‘कलात्मक’ तरीके से किये गए भ्रष्टाचार को ‘सम्मान’, ‘एक्स्सल्लेंस इन करप्शन’ अवार्ड हर साल के लिए, फिर फिल्मों के नाम जो ‘घोटालों’ पर आधारित हो, घोटाले करने के तरीकों कि किताबें- जैसे कि ‘भ्रष्टाचार’ करने के १०१ तरीके, ‘सफल घोटालेबाज कैसे बना जाये’,’करप्शन’ पर लिखी गयी सर्वश्रेष्ठ किताबे, बच्चों के लिए ‘छोटा-करप्शन’- ‘करप्शन- टॉय्स’- ‘घप्लू-गुड्डा’ और ‘रिश्वती गुड्डी’ कि कहानियाँ, ‘जांबाज़-भ्रष्टाचारी’ के कॉमिक्स, और सबसे ऊपर ‘भ्रष्टाचार’ पर एक ‘अंतर्राष्ट्रीय –मानक’ जो हमारे सिवा शायद ही कोई लिख पाए ?,
इसके बाद सफल भ्रष्टाचारियों से प्रेरणा लेकर उनकी ‘सफलता’ का रहस्य’ उनकी ‘कार्य-प्रणाली’ पर संशोधनात्मक ग्रन्थ, फिर हर साल ‘भ्रष्ट-उत्सव’, ‘घोटालें-मेलों’ का आयोजन भी किया जायेगा.
किसी भ्रष्टाचारी के पकडे जाने पर ‘काला दिवस’ तथा ‘भ्रष्टाचारी’ को सजा होने पर ‘सात दिन’ का ‘राष्ट्रीय-शोक’ मनाया जायेगा.
आईये हम सब मिलकर ‘भ्रष्टाचार’ को नए नए ‘आयाम’ दें, इसे नयी ऊंचाईयों पर पहुंचाए, पुरे विश्व में इसे प्रचारित एवं प्रसारित करें. आओ हम सब मिलकर ‘भारत’ को एक महान ‘भ्रष्टाचारियों’ का देश बनाकर इसे चोटी पर पहुंचाएं ..
मौजूदा हालातों में जहां हर राजनीतिक पार्टी के सदस्य भ्रष्टाचार में लिप्त पाएं गए हैं और जिस तेजी से इसमें बढोतरी हो रही है , मुझे पूरी उम्मीद है कि वो दिन दूर नहीं के हम ‘इमानदारी’ को इस देश से पूरी तरह खत्म कर देंगे. जिस तरह हमने देश से ‘पोलियो’ को खत्म किया उसी तर्ज़ पर ‘दो बूँद भ्रष्टाचार कि’ कि मुहीम चलाकर हम ‘इमानदारी’ को जल्द से जल्द मिटा देंगे.
हम सब मिलकर उस ‘पावन-पुनीत’ ‘भ्रष्ट-प्रभात’ का स्वागत करें, और इसके सम्मान में आईये आप सब मेरे साथ मिलकर तीन बार बोलें – घपला जिंदाबाद ! घोटाला जिंदाबाद !! भ्रष्टाचार जिंदाबाद !!!

कुछ सवाल हम करें, कुछ सवाल तुम करो … और ‘पब्लिक’ के सवालों का न कोई जवाब हो (?)

पिछले कुछ दिनों से जो ‘राजनीतिक’ उठा पटक हो रही उसमे हर पार्टी एक दूसरे से सवाल पूछ रही है. हर रोज पढ़ने सुनने- को मिलता है कि आज फलाना पार्टी ने फलाना पार्टी से दस सवाल पूछे, या पन्द्रह सवाल पूछे या फिर इस संगठन ने उस पार्टी से या उन सभी राजनीतिक पार्टीयों से सवाल पूछे.
और दूसरी पार्टी भी ‘सेर पे सवा सेर’ कि तर्ज़ पर ‘नहले पे देहला’ मारते हुए दूसरी तरफ से सवाल दाग(?) देती है.
अच्छा , इसमें मज़े कि बात तो यह है कि जो पहले सवाल पूछे गए हैं उसका जवाब कोई नहीं देता, हाँ सवाल के जवाब में प्रति-सवाल जरुर कर देता है !
ज़ाहिर है चुनाव आनेवाले है तो ये खेल भी चलता रहेगा और समय भी इसी तरह से गुज़रता रहेगा जैसे कि देश के स्वंतंत्र होने के बाद ६५ साल गुजार गए और बहोत से सवाल अभी तक अन सुलझे है या जिनका जवाब किसी पहेली से कम नहीं है. जवाब तो दूर आप खुद ही खुद से सवाल करने लगोगे और सवालों के ‘चक्रव्यूह’ में फँस जाओगे.
है न यह मज़े कि बात, और इसीलिए बरबस ही मुझे शैलेन्द्र के लिखे इस गीत के बोल याद आते गए कि ‘एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो’ और ‘हर सवाल का सवाल ही जवाब हो’, उन्हें जरुर पता होगा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जिनकी ‘जवाबदेही’ बनती है वो खुद जवाब देने के बजाये सवालों का ऐसा ‘मायाजाल’ खडा कर देंगे कि आम आदमी उसी में घूमता रह जायेगा. क्या निचे दिए गए सवालों का जवाब कोई दे सकता है?
– आज़ादी के पैसंठ साल बाद भी हमें २४ घंटा बिजली क्यों नहीं मिलती?
– क्यों अभी भी कई लोगों को दो वक्त कि रोटी नसीब नहीं होती?
– क्यों हमें पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिलता और क्यों हमें पानी भी खरीद के पीना पड़ता है?
– क्यों अभी तक कई गांव पक्की सडकों से महरूम है?
– क्यों बच्चें, महिलाएं और बुज़ुर्ग हमारे देश में सुरक्षित नहीं है?
– देश पर हमला करनेवालों को हम सजा देने में देर क्यों करते है?
– क्या बात है कि देश में कानून का राज नहीं चलता है और निर्दोष लोगों को सज़ा हो जाती है और पता होते हुए भी गुनाहगार छूट जाते है ( खुद ‘गृह सचिव’ इस बात कि तस्दीक कर चुके हैं)
– क्यों देश में हर रोज ‘बलात्कार’ होते है और किसीको सज़ा नहीं होती?
– क्या बात है कि ‘अंतरिक्ष’ विज्ञानं में हम नयी नयी बुलंदियों को छू रहे और ‘ज़मीनी’ हकीकत से नाता तोड़ ज़मीन पर रहनेवाले और भगवान कि सबसे खूबसूरत खोज जिसे कहा जाता है , उस ‘हाड-मांस’ के आम आदमी का जीवन स्तर सुधारने के बजाये उसकी जिंदगी को बद से बदतर करने में लगे हुए है?
– आज़ादी के पैसंठ साल बाद भी देश में यह ‘बदहाली’ कि स्थिति क्यों है?

मुझे पूरा यकीन है कि ‘सरकार’ या ‘सत्ता’ में बैठे हुए लोग इन सवालों का जवाब कभी नहीं दे पाएंगे, और हमने इन सवालों के जवाब जानने का हक भी गँवा दिया है, क्योंकि हमने कभी अपने देश को अपना समझा नहीं और इसे अपनाया नहीं. हर बात पे ‘ अरे छोड़ यार ‘ अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘होने दो यार जो होता है’ किसको पड़ी है?’ कहकर, हमने हमेशा टाल दिया, यहाँ तक कि राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुँचाने में भी हम लोग सबसे आगे रहते हैं, मतदान के दिन ‘पिकनिक’ मनाते है ‘वोट’ डालने नहीं जाते, तो देश का तो यही हाल होगा न?
हमारी बेरुखी का ही नतीजा है कि आज देश में एक ‘अनुशासन हिन् समाज है, लचर-पचर कानून व्यवस्था है, और एक ‘लोला – पोला’ सरकार राज करती है.
इसी कारण आज जिन्हें हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए वो हमसे ही सवाल पूछने कि हिमाकत करते है!!!

यहाँ जान की कोई ‘वेल्यु’ नहीं है

‘ कुछ लोग जो ज्यादा जानते है, इंसान को कम पहचानते है, ये पूरब है पूरबवाले हर जान कि कीमत जानते है – हर जान कि कीमत जानते है … (फिल्म – जिस देश में गंगा बहती है) एक मशहूर फ़िल्मी गीत कि यह कुछ पंक्तियाँ है . . . . . . . . . . . . . . . . . पर अब,

‘यहाँ जान की कोई ‘वेल्यु’ नहीं है’, यह शब्द दिल्ली की जूता फैक्ट्री में लगी आग में आजसे करीब सवा एक साल पहले मरनेवाले एक शख्स की पत्नी के है, जो आज तक मेरे कानों में गूँज रहें है, और जहाँ तक मैं समझता हूँ के, यह बात हर आम हिन्दुस्तानी के मन को कचोटती होगी और सोचने पर मजबूर करती होगी के आखिर ‘जिंदगी’ के प्रति हम इतने उदासीन, इतने निरुत्साही, इतने नीरस, और इतने लापरवाह क्यों है?, क्यों हम आखिर ‘जिंदगी’ का मोल नहीं समझ पा रहे है, और इसका सदुपयोग नहीं कर पा रहे है?, या इसे यूंही खत्म करने पर आमादा है.
यह बात मैं इसलिए रख रहा हूँ के जिंदगी गँवाने के या प्राणों को खो देने के कारणों को आप देखे तो समझ पाएंगे के हम भारतीय किन किन कारणों के लिए अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देते है या किसी कि जान भी ले लेते हैं. इनमे हम वाहनों कि दुर्घटनाओं को नहीं गिन रहे हैं, हालांके लापरवाही वहाँ भी होती है और कभी किसी एक कि लापरवाही कि वजह से दूसरों कि जान पर बन आती है.

अभी तक मैं जिन कारणों को संकलित कर पाया हूँ उनकी सूची कुछ इस प्रकार से है;
क्रिकेट जैसे खेल के मामूली झगडे को लेकर किसी कि जान ले लेना,
बोरेवेल में गिरकर छोटे छोटे बच्चों का जान गंवाना तो अब एक आम बात हो चली है,
खुले मेन-होल हो नालें या सीवर लाइन का मैन होल कवर खुला होना उसमे गिरकर बह जाना,
किसी कार्य के लिए रास्ते पर खुदा हुआ गढ्ढा जो कि खुला रह गया हो, भी मौत का कारण बन चूका है, तालाब में नहाने गए बच्चों कि मौत, हाल ही में कच्छ के मांडवी के समुद्रतट पर पानी में बह जाने से ६ लोग जिनमे युवा थे वह मौत का शिकार हो गए. सोचो कितने घरों के आशाओं के दीप बुझ गए?

इसी तरह शिवकासी में पटाखे बनानेवाली फैक्ट्री में हुए विस्फोट में कई जाने गयी. पश्चिम बंगाल में बांकुरा में बारिश के पानी से लबालब पूल को पार करते हुए एक बस के पानी में बह जाने से भी कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

रेल कि छतों पर बैठकर सफर करना , या समय समय पर लगते ‘मेलों’ या धार्मिक कारणों के लिए निर्धारित संख्या से ज्यादा लोगों का रेल या बस में सफर करते समय दुर्घटना का शिकार बनना ,
मोबाइल के हेड फोन लगाकर रेलवे लाइन पार करते समय रेल के निचे कट जाना, या फिर कभी वैसे ही रेल कि पटरी पार करते हुए जान गंवाना, मानव रहित रेलवे क्रोस्सिंग पर स्कूल बस का गुज़रना,
लोकल ट्रेन के ऊपर बैठकर जाते समय बिजली के तार मेन उलझकर मर जाना, या फिर लोकल ट्रेन कि भीड़ में ट्रेन से गिरकर मौत, चलती ट्रेन से यात्री को फ़ेंक देना,
कभी कार के अंदर कैद होकर दम घुटकर मर जाना,ट्रेन में सीट के निचे बच्चे का दबकर मर जाना,
स्कूल बस कि खिडकी से बाहर झांकते हुए बच्चे का सर खम्भे से टकराकर जान गंवाना,
विवाह समारोह के दौरान की जानेवाली फायरिंग या फिर चुनाव के जुलुस हो या चुनाव जीतने की खुशी के जुलुस में होनेवाली फायरिंग में जान गंवाना,
टोल टैक्स की पर्ची फाड़ने से लेकर हुई बहस में किसी कि जान ले लेना (सोचो के सवाल कितने पैसे का होता है और उसका मुआवजा क्या देना पड़ता है)
पिछले दिनों में सीवर मे १०० रूपए निकलने गए ४ लोगों ने अपनी जान गंवायी – क्या इसका मतलब है एक आदमी कि जान कि कीमत २५ रुपये?
मंदिरों में होनेवाली भगदड़ में जान गंवाना, (इस विषय पर तो एक एक पूरा लेख अलग से लिखना पड़ेगा क्योंकि इस प्रकार कि घटनाओं में जो इजाफा हुआ है वह हमारी लापरवाही और बद-इन्तजामी कि दास्तान खुद ब खुद बयां करती हैं).
इसके बाद इलाज के बिना मरनेवाले, भूख के कारण मरनेवाले!

जिंदगी का मोल हम क्यों नहीं समझते हैं ये सोचनेवाली बात है, क्या इसका कारण हमारी बहोत ज्यादा आबादी है?

पानी कि टंकी में गिरने से मौत, इमारत ढहने से हुई मौतें (इमारतों के जर्जर होने या खतरे कि सुचना के बावजूद उसमे निवास करना और फिर दुर्घटना का शिकार होना ),
खड़ी हुई गाडी के पीछे सो जाना और फिर ड्राईवर का उसी गाडी को बैक करना और उसी गाडी के क्लीनर कि अपनी ही गाडी के निचे मौत हो जाना.
मंत्रालय में लगी आग में जान गंवाना….
क्या हमारी जान इतनी सस्ती है कि किसी भी प्रकार से गंवाने में हमें कोई हिचक नहीं होती?

प्रधान मंत्री का काफिला निकलने के दौरान लगाये प्रतिबंधों के कारण किसी शख्स को इलाज कि सुविधा से वंचित होकर या अस्पताल तक पहुंचना मुश्किल होने कि वजह से हुई मौत,
रेलवे स्टेशन पर नेता कि स्वागत में जुटी हुई भीड़ द्वारा कि गयी फायरिंग के दौरान किसी निर्दोष के जान गंवाने या ऐसी ही घटना में किसी बच्चे कि जान जाने कि भी घटनाएं हमारे देश में हो चुकी है,
रास्ते से जाते हुए जुलुस के दौरान पुलिस और जुलुस में शामिल हुए लोगों कि बीच हुई फायरिंग के कारण किसी अनजान निर्दोष कि जान चली जाती है,

लापरवाही से होनेवाली ना जाने कितनी मौतें!
सड़क पर तडपते हुए हमारी आँखों के सामने आदमी दम तोड़ देता है लेकिन उसे बचाने के लिए हम कुछ भी नहीं करते. आखिर क्यों? क्या हम इतने संवेदना हिन् हो गए है?
और भी कई ऐसे कारण हो सकते है कि जब हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हो कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? एक बेशकीमती जान हमें क्यों गंवानी पड़ी? क्योंकि एक बार जाने के बाद तो किसीको वापिस लाया नहीं जा सकता, फिर जो लोग अपने करीबियों को खो देते है उन पर क्या गुज़रती होगी?
और सोचें कि बिना कारण गँवाई गयी यही बहुमूल्य जिंदगी चाहे तो कुछ भी कर सकती, यही मानव उर्जा अगर हम सकारात्मक कार्यों या मानवता मे लगा पाते तो ? या मानवता के हित में इसका इस्तेमाल किया जाता तो? तो जरुर समाज का, देश का, और इस मानवजाति का कुछ तो भला होता ही… या इससे भी अच्छा होता कि यह जाने देश सेवा के लिए देश पर न्योछावर हो जाती!

आप कहेंगे कि यह सब तो होगा ही, होनी को कौन टाल सकता है? , सही बात है, जो चीज़ें होनी है या जिनपर हमारा बस नहीं चलता उसमे तो तो हम कुछ नहीं कर सकते. पर जहाँ अगर थोड़ी सतर्कता बरतने से या सावधानी से या फिर संवेदनशीलता से अगर मनुष्य जान हानि होने से बचायी जाए तो उसका प्रयास हमें करना चाहिए….

(This special article written for ‘Yuvadastak’.com has been published on 29.09.2012 at ‘Yuvadastak’.com and link is http://yuvadastak.com/new/?p=6064 , interested readers can visit this blog also to have more reading about contemporary issues).