विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष – कहाँ पे जाये कचरा … !!

(आज विश्व पर्यावरण दिवस के साथ साथ हम इस ब्लॉग की सातवीं सालगिरह भी मना रहे है.
इस अवसर पर इस ब्लॉग के संस्थापक सदस्य मेरे मित्र श्री. आशीष तिलक तथा श्री. भरत भाई भट्ट को, और आप सभी पाठकों, मित्रों को ढेरों शुभकामनाएं )

हम लोग कितना कचरा निर्माण कर रहे है, इसका अंदाजा भी शायद हम नहीं लगा सकते. लेकिन एक सफाई वाले कि नज़र से देखे और सोचे, तब पता चले कि यह विषय कितना गंभीर है.
मैं इस सम्बन्ध में ‘सांख्यिकी’ या ‘आंकड़ों’ के पचड़े में नह पड़ना चाहता. क्यों कि मैं जानता हूँ कि वास्तविकता कहीं ज्यादा भयंकर है और आंकड़े इस समस्या के समाधान का, या इसमें दिन –ब-दिन जरुरी सुधार का पैमाना नहीं बन सकते और न ही बन पाएंगे.
हजारों लाखों टन कचरा हर रोज हमारे आस-पास परिसर में लाकर ढेर कर दिया जाता है. इस कचरे का फिर क्या होता है? ये कूड़े का ढेर आखिर किस सागर में समाता है ? क्या अलग अलग तरह का कचरा छंटनी किया जाता है? क्या पुनः चक्रित होने वाली चीजों को पुनः प्रयोग करने के लिए प्रकिया में लिया गया है? क्या हर चीज़ को उसकी विशिष्टता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है/ किया गया है?

क्या प्रदुषण न फैले इसका ध्यान रखा गया है? और सबसे बड़ी बात कही कोई अवशेष बाकि तो नहीं रह गए है. क्या हर वस्तू का उसकी विशिष्टता के आधार पर उचित निरूपण किया गया. जो खतरनाक और घातक रसायन या अपव्यय है उनके निबटारे में क्या जरुरी सावधानी बरती गयी है.

जिंदगी कि भाग दौड़ इतनी तेज हो गयी है कि किसी के पास यह सब सोचने और उस पर मंथन करने का समय ही नहीं मिल पा रहा है.
परिणाम है प्रदुषण – महा भयंकर प्रदुषण, प्रकृति के ऋतू चक्र में बदलाव , वातावरण में परिवर्तन. शायद इसीलिए अब बारिश में वैसी बारिश नहीं होती जैसे हमारे बचपन के दिनों में होती थी. अब तो कभी आधे किलोमीटर परिक्षेत्र में बरसात होती है तो थोडा आगे जाते ही आपको एकदम सुखा भी मिलता है. अब घनघोर वर्षा तो होती है लेकिन लगातार नहीं होती , कई दिनों तक तो होती ही नहीं.
और बीते हुए कुछ वर्षों में ‘जलवायु’ में जो बदलाव देखे गए हैं उससे हम सब अछि तरह वाकिफ है ही , जैसे की – इस साल भीषण गर्मी पड़ी, कई शहरों के तापमान में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है, पिछले साल कहीं भीषण सूखा पड़ा, तो कहीं भीषण बाढ़ आयी, और बारिश औसतन कम रही, जब ज़रूरत थी तो बारिश नहीं आयी, और जब आयी तो बर्बादी लेकर. यह सब घटनाएं पर्यावरण में बदलाव के संकेत है, जिससे हमें सबक लेना चाहिए. और प्रकृति के बचाव के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए.
जो स्वच्छता मुहीम २ अक्तूबर से चलायी गयी, उस पर कहाँ और कितना अमल हुआ इसका भी समय समय पर समीक्षा होनी चाहिए. क्योंकि पिछले कुछ दिनों में मुझे कई बार कार्यवश कुछ बड़े-छोटे शहरों कि यात्रा करनी पड़ी और वहाँ ज्यादातर मैंने पाया कि ‘गन्दगी’ का ‘साम्राज्य’ अभी भी जारी है.
दुःख इस बात पर हुआ कि उन् शहरों के जो प्रमुख सरकारी दफ्तर है जो जिला-स्तरीय कार्यालय है उनके पास तक ‘कूड़े-कचरे’ का ढेर पाया गया और प्रतीत होता था कि वहाँ पर कई कई दिनों तक सफाई हुयी ही नहीं है और होती भी नहीं है.
(कुछ दिन पूर्व अहमदाबाद से वड़ोदरा जाते हुए एक्सप्रेस-हाईवे से पहले अहमदाबाद शहर का कूड़े का ढेर देखने को मिला, जिसको शहर से बाहर इक्कठा कर जलाया जाता है, ये ढेर अपने आप में एक बड़े ‘टीले’ में तब्दील हो गया है और दिन ब दिन इसका स्वरुप्प और विकराल होता जा रहा है.)

तो हमारी ‘अनास्था’ का दौर अभी जारी है. हमारी ‘बेरुखी’ अभी ‘खत्म’नहीं हुयी है !!

और जाहिर है कि केवल किसी एक दिन अगर प्रधानमंत्री हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करेंगे और सोचेंगे कि सब कुछ सही होने जा रहा है, तो वैसा नहीं होगा. लोगों को स्वयं ये जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी. और तो और जो लोक प्रतिनिधि है उन्हें तो विशेष प्रयास करने होंगे और उन्हें ये करने भी चाहिए क्योंकि राज्य में या जिले में वे एक ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे है, जिसने देश में बदलाव लाने कि बात कही थी, जिसने ‘घिसे-पिटे’ तरीकों से लोगों को ‘निजात’ दिलाने का वायदा किया था (चुनाव से पहले). लेकिन लगता है सरकार नयी नयी योजनाएं शुरू कर और उनका ढिंढोरा पीटकर खुद ‘घिस-पीटकर’ वापस ‘सत्ता’ कि ‘हसीन’ दुनिया में खो जाती है …फिर आज एक टीवी चैनल पर साबरमती नदी में कूड़ा-कचरा फेंकते हुए कुछ लोगों को दिखाया गया और उनसे पूछे गए सवालों का जिस ‘बेशर्मी’ से इन लोगों ने जवाब दिया,  उससे जाहिर होता है की अभी भी हमारे देश और देश के संसाधनों के प्रतिप्रति, पर्यावरण की रक्षा के प्रति और यहाँ तक की हमारे बच्चों के भविष्य के प्रति हम कितने उदासीन और संवेदनहिन् बनते जा रहे है … ऐसे में टनों टन इकठ्ठा हो रहे ‘कचरे’ की परवाह कौन करता है …

Cleanliness Pledge

स्वच्छता शपथ
( स्वच्छ भारत – एक कदम स्वच्छता की ओर )

महात्मा गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था उसमे सिर्फ राजनैतिक आज़ादी ही नहीं थी, बल्कि एक स्वच्छ एवं विकसित देश कि कल्पना भी थी !

महात्मा गांधी ने गुलामी कि जंजीरों कों तोड़कर माँ भारती कों आज़ाद कराया !

अब हमारा कर्तव्य है कि गंदगी कों दूर करके भारत माता कि सेवा करें !

मैं शपथ लेता हूँ कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूँगा और उसके लिए समय दूंगा !

हर वर्ष १०० घंटे यानी हर सप्ताह २ घंटे श्रमदान करके स्वच्छता के इस संकल्प कों चरितार्थ करूँगा !

मैं न गंदगी करूँगा न किसी और कों करने दूंगा !

सबसे पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से , मेरे मुहल्ले से, मेरे गाँव से एवं मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूँगा !
मैं यह मानता हूँ कि दुनिया के जो भी देश स्वच्छ दिखतें हैं उसका कारण यह है कि वहाँ के नागरिक गंदगी नहीं करते और न ही होने देते हैं !

इस विचार के साथ मैं गाँव-गाँव और गली-गली स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार करूँगा !

मैं आज जो शपथ ले रहा हूँ, वह अन्य १०० व्यक्तियों से भी करवाऊंगा !

वे भी मेरी तरह स्वच्छता के लिए १०० घंटे दें, इसके लिए प्रयास करूँगा !

मुझे मालूम हैं कि स्वच्छता कि तरफ बढ़ाया गया मेरा एक कदम पूरे भारत देश कों स्वच्छ बनाने में मदद करेगा !

Cleanliness Pledge

(re-blogged  from Local Circles)

Jan Gan Mangal Daayak Yaan _ जन गण मंगल दायक यान

(Sharing herewith my thoughts on India’s successful Mars Orbit Mission (MOM) on 24.09.2014)

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान
अमंगल हरता मंगल यान
जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान

जग को दिया शून्य का ज्ञान
धन्य है भारत का विज्ञान
पूर्वजों का है वरदान
अंतरिक्ष कि दूरी आसान
मंगल कक्षा में मंगल यान
मंगल बेला में किया प्रयाण
जय जय जय हो मंगल यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

जय जवान और जय किसान
जय जय जय जय जय विज्ञान
अंतरिक्ष में ली है उड़ान
लहराया है तिरंगा महान
लाल ग्रह पर अपने निशान
मंगल भुवन है मंगल यान

पुरुषार्थ का इनको है मान
अपने देश कि है ये शान
बढ़ाया भारत का सम्मान
कर्तव्य पूर्ति का है अभिमान
जन जन जिनका ऋणी हैं
ऐसे वैज्ञानिक महान
जन जन का ये स्वाभिमान

जन गण मंगल दायक यान
मंगल पर है अपना यान
मंगल
मंगल
मंगल यान

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Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan
‘Amangal’ hartaa mangal yaan
Jan Gan Mangal Daayak Yaan
Mangal par hain apna Yaan

Jag ko diya shoonya ka gyaan
Dhanya hai Bharat ka vigyaan
Purvajon ka hai vardaan
Antariksh ki doori aasaan
Mangal kaksha mein Mangal yaan
Mangal bela mein kiya prayaan
Jai jai jai ho Mangal yaan
Mangal
Mangal
Mangal Yaan

Jai jawaan aur jai kisaan
Jai jai jai jai jai vigyaan
Antariksh mein lee hai udaan
Lehraaya hai tirangaa mahaan
Laal grah par apne nishaan
Mangal bhuwan hai Mangal yaan

Purushaarth ka inko hai maan
Apne desh ki ye hai shaan
Badhaaya Bharat ka sammaan
Kartavya purti ka hai abhimaan
Jan jan jink wruni hain
Aise vaigyanik mahaan
Jan jan ka ye swaabhimaan

बाज़ार, व्यापार और गणतंत्र !

हम एक ‘गणतंत्र’ है
हमारा ‘अपना’ एक ‘मंत्र’ है,
हमारी अपनी ‘संस्थाओं’ के प्रति
हमारी ‘बेरूखी’ ‘अनोखी’ है,
इसीलिए देश में जो कुछ होता है
उसमे ‘अपने बाप का क्या जाता है’
‘होने दो जो होता है’
‘कौन किसके लिए रोता हैं’
‘यार सब चलता हैं’…

‘आबादी’ बढती है
‘नए शहर’ ‘पैदा’ होते हैं
‘ज़मीन’ के भाव कुलांचे मारते है
‘कंक्रीट-जंगल’ के दलाल खुश होते है,
‘रंग-बिरंगी’ सपने और
‘खोखली-जगमगाहट’ के ‘काम्प्लेक्स’ में
‘पर्यावरण’ और ‘प्रदुषण’ जैसे मुद्दे
‘फाइलों’ कि तरह गायब हो जाते है,
‘राजनीति’ इसीको ‘विकास’ कहती है

पर ‘कुदरत’ कहाँ
‘भेद’ करती है,
‘आपदा’ आती है
‘शहर’ डूब जाते हैं
‘इंसानियत’ ढूँढने से नहीं मिलती और
‘नीति-मूल्यों’ कि रूहें कांपती है,
‘लाचारी’ कों ‘बाज़ार’ निगलता है
रोते-बिलखते ‘मासूम’ ‘बिसात’ पर है
‘जिंदगी’ दम तोड़ रही है,
‘शेयर-बाजार’ में ‘सूचकांक’ बढ़ रहा है …

मंथन जारी हैं …

एक महीने का समय गुज़र गया . . . . .

कहने का तात्पर्य यह है कि इस ‘ब्लॉग’ पर पिछला लेख ठीक एक महीने पहले १४ अगस्त को प्रकाशित हुआ था.
ऐसा नहीं है कि इस महीने भर में कोई घटना ऐसी नहीं हुयी जिसने ‘समाज-शिल्पी’ को नहीं छुआ हो या ‘आहत’ न किया हो.
और जिस ब्लॉग का उद्देश्य ही समाज कि ‘नव-रचना’ करने में योगदान देना हो, उसे तो हर रोज ही अपने आस-पास कि घटनाओं के बारे में या जिन मुद्दों ने उसे छुआ हो उसके बारे में टिपण्णी ज़रूर करनी चाहिए.
लेकिन कभी कभी लेखन प्रक्रिया में ऐसे पड़ाव आते हैं जब एक रचना से दूसरी रचना के बीच में कुछ अंतर आ जाता है.
अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल कर प्रकाशित नहीं कर पाने का दुःख तो है ही, मगर जो अच्छी-बुरी घटनाएं इस दौर में हुयी, उसने ‘विचारों’ कि प्रक्रिया को जारी रखा और ‘मंथन’ करने पर समय समय पर मजबूर किया.
इस लेख में हम मुख्य रूप से उन् सभी घटनाओंका जिक्र करेंगे, और आनेवाले लेखों में उन्ही मुद्दों का तार पकड़कर विस्तार से चर्चा करेंगे और नए मुद्दों को भी छुएंगे.

सबसे पहले तो बात हमारी बढती ‘संवेदनहीनता’ कि. दिल्ली में फिर हमारे गिरते मानवीय मूल्य और समाज में ‘गहरी पैठ’ बना चुकी ‘नपुंसकता’ का उदाहरण देखने को मिला जहां एक जख्मी को बीच बाजार में लोगों ने पानी नहीं पिलाया और उस इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘बलात्कार’ कि घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी और ‘गुंडे-बदमाश’ लगभग हर राज्य में ‘कानून’ कि धज्जियां उड़ाते फिर रहे है.
कुल मिलाकर नयी सरकार को अभी तक तो ‘क़ानून का राज्य’ स्थापित करने में उतनी सफलता नहीं मिली हैं जितनी उम्मीदें जनता को ‘सत्ता परिवर्तन’ के होने बाद इस नयी सरकार से थी.
‘क़ानून व्यवस्था’ के मामले तो लगता है कि जैसे अभी भी ‘युपीए’ का ही शासन चल रहा है.
और तो और जिन अपराधियों कों फांसी कि सज़ा दी जाती है पता नहीं क्यों उनकी फांसी कों बार बार मुल्तवी किया जाता है?

जहाँ प्रधानमंत्री के विदेश दौरों ने हमारे देश कि गरिमा बढ़ाई और यह सन्देश भी जाते दिखा कि हमारा देश भी दूसरे देश से ‘आँख से आँख’ मिलाकर ही चलेगा.
प्रधानमंत्री के जापान दौरे के समय जब ‘स्मार्ट सिटी’ कि बात चली तो नयी आशाएँ जगी, लेकिन जिस रस्ते पर मैं हर रोज सफर करता हूँ उस ‘एन एच – ८ ए एक्सटेंशन’ और एस एच -४६ पर हर रोज बीच सड़क पर बैठा ‘मवेशियों’ का ‘झुंड’ इस बात कि याद दिलाता रहता है कि अभी तो ‘मंजिल’ दूर ही नहीं बहुत बहुत दूर है.
अभी तो राज्य परिवहन कि बस में सफर करते समय जब चालक कों अपनी गाडी बीच सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण ‘आडी-तिरछी’ करनी पड़ती है तो लगता है कि देश कि स्थिति भी ऐसी ही है, कहीं बहुत ज्यादा विकास हैं तो कहीं कुछ भी नहीं. और विकास अगर हुआ भी हैं तो उसका समतोल बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ रखा नहीं गया.
तभी तो वड़ोदरा जैसे शहर में लग-भग हर साल बाढ़ आती है और रिहायशी इलाकों में पानी भर जाता है.
सबसे दुखद त्रासदी ‘जम्मू-कश्मीर’ में आयी बाढ़ है, जहाँ का हाल समाचारों में देख-सुनकर कलेजा मुंह कों आता है.
इस त्रासदी से जहाँ हमारी ‘आपदा प्रबंधन प्रणाली’ कि खामियां सामने आयी, वहीँ ‘विकास’ कि दौड में प्रदुषण के खतरे और उसके दुष्परिणामों कों भांपने में हमारी नाकामयाबी का भी पता चलता है.
हर चीज़ पर ‘बाजारीकरण’ के बढते प्रभाव और पैसे कमाने कि होड में भागती दुनिया का सच हमारे सामने आता है.
विकास कि चकाचौंध में हम मानवीय मूल्य और इंसानी जिंदगी के साथ ही सौदा कर बैठे है. और हम लोगों कि जिंदगी इसीलिए हर समय ‘दांव’ पर है.
वर्षों से चली आ रही हमारी सोच के ‘अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘सरकार से हमें क्या लेना देना’, ‘सब चलता है’ ने ही हमें आज इस मकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ ‘प्रशासन’ हमारा ‘अपना’ नहीं बन सका और हम ‘जनता’ प्रशासन के लिए केवल वोट देनेवाली मशीन बन कर रह गए.
जम्मू-कश्मीर कि बाढ़ के कुछ समाचारों में हाल ही में कुछ व्यक्ति प्रधानमंत्री श्री.मोदी जी कों कोसते हुए दिखाए गए. क्या यह सही है?
भाई, इतने सालों से जिन लोगो ने तुम्हारे ऊपर ‘राज’ किया है, कुछ उनसे भी तो पूछो. मोदी जी कों आये तो अभी तीन महीने ही हुए है. फिर भी उन्होंने वो किया जो दस सालों में तुम्हारी चुनी हुई सरकार नहीं कर पायी.
और तो और जब घाटी में सारे नियम क़ानून ताक पर रखकर अंधाधुन्द निर्माण हुआ तब आप क्यों तमाशा देखते रहे? आपने क्यों नहीं मुलभुत सुविधाओं के निर्माण के लिए अपने आवाज़ बुलंद कि?
हाँ, एक बात ज़रूर सरकार कों (चुनाव आयोग से सिफारिश कर ) करनी चाहिए थी कि ‘उप-चुनावोंको’ कुछ समय बाद कराया जाता तो अच्छा होता.
इस बीच देश के कई हिस्सों में बदलते ‘मौसम’ का मिजाज़ पता चला और ‘पर्यावरण’ में होते बदलावों का भी एहसास हुआ. कहीं भयंकर गर्मी रही, तो कहीं बाढ़ और कहीं एकदम सूखा.
इससे हम को सबक लेकर अभी से चेतने कि जरूरत हैं.
और जो मैं इससे पहले भी कहता आया हूँ कि ‘हमारे बाप का कुछ गया हो या नहीं’ मगर ‘हमारे बच्चों का और आनेवाली पीढ़ियों’ का बहुत कुछ ‘दांव’ पर है…

इस दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि पहले तो हम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंटे हुए थे, मगर आज ‘ट्विटर’ का भारत अलग है, ‘फेसबुक’ का भारत अलग है, अंग्रेजी और हिंदी समाचार पत्र पढ़ने वालों का अपना भारत है. ‘व्हाट्स-एप’ का भारत इन सबका मिश्रण है और टीवी चेनलों कि प्राथमिकताएं ‘टीआरपी’ और अलग अलग ‘ब्रांडों’ के प्रायोजक है, या फिर ‘क्रिकेट’ है.
‘क्रिकेटरों’ कों हमारे देश में इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि उनके सामने देश पर मर मिटनेवाले शहीदों कों भी इतना सम्मान नहीं दिया जाता.
अपने आप कों ‘न.१’ कहने का दावा करनेवाले समाचार चेनल पर तो क्रिकेट के लिए विशेष समय (आधा घंटा) दिया जाता है. जब देश इतनी समस्याओं से घिरा हो तो क्रिकेट कि बात तो होनी भी नहीं चाहिए, या फिर सभी खेलों कों उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए. क्रिकेट कि हार जीत पर भी न तो ज्यादा हंगामा होना चाहिए और न ही ज्यादा उत्तेजना होनी चाहिए. क्योंकि हर क्रिकेट खेलनेवाले देश का फ़र्ज़ है कि जीत ने के लिए खेलना और खेल का अविभाज्य अंग है ‘हार’ या ‘जीत’ इसीलिए न तो क्रिकेट में एक हार पर दुनिया भर का गम लूटाने कि ज़रूरत है और न ही जीत पर क्रिकेट के खिलाड़ियों कों ज़रूरत से ज्यादा सर पर उठाने कि ज़रूरत है.

और सबसे सुखद रहा दस दिनों तक चला ‘गणेशोत्सव’, ‘बाप्पा’ आते हैं तो अपने साथ कई यादें भी लेकर आते हैं. ‘गणेश उत्सव’ कि वो यादें जो मेरे बचपन से जुडी है. हो सकता है कि आनेवाले दिनों में मैं अपना पहला ‘मराठी’ लेख (जो कि १९८० के बाद आएगा) ‘गणपति-बाप्पा’ कि यादों के साथ ही लिखूं.

हम राष्ट्र के ‘नव-निर्माण’ का संकल्प लें !!!

६८ वें स्वतंत्रता दिवस कि पूर्व संध्या पर देश में रहनेवाले एवं विदेश में रहनेवाले सभी भारतवासियों कों हार्दिक शुभकामनाएं !!

कल हम लोग १५ अगस्त का पावन पर्व – अपना ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मनायेंगें.

आज जो हम खुली फिजां में सांस ले रहे हैं तो जिस बलिदान के कारण हमें यह आज़ादी नसीब हुई हैं, उसे हमें नहीं भूलना चाहिए.
देश कों स्वतंत्र करने के लिए जिन लोगों ने अपना सर्वस्व त्याग दिया, उनके सपनों कों पूरा करके हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजली दे कर अपना कर्तव्य निभा सकते हैं.
देश के इन अमर शहीदों को आज हम याद कर उन्हें नमन करते हैं और उन्हें शत शत नमन करतें हैं !

लेकिन आज हमारे देश की जो हालत हैं उसे देख के इन शहीदों की आत्माओंको जरूर ठेस पहूँचती होगी.
चारों तरफ फैली अराजकता,हर क्षेत्र में फैले भ्रष्ट्राचार, माताओं, बहनों, बच्चों और बूढों पर हो रहे अत्याचार, धर्म और जाती के नाम पर दंगे, अपनी संस्कृति –विरासत कों भूलते लोग, समाज में बढती संवेदनहीनता,राजनीति में जारी ‘नपुंसकता’, शहीदों के नाम पर राजनीति करते ‘स्वार्थी’ तत्व, शहीदों के परिवार वालों का ‘अपमान’ सहता समाज, इत्यादि देखकर वे अत्यंत दुखी होते होंगे.
उनकी आत्मा बेहद शर्मसार भी होती होगी कि लोग स्वतंत्रता के मूल्य कों भूल गए हैं.

हमारी आज कि राजनीति इतनी नपुंसक हो गयी है कि ‘दलगत राजनीति’ से ऊपर उठकर कोई भी पक्ष देश कि आत्मा कों ‘एकात्म’ करना, देश कों एकजुट करना, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य कों जागृत करना जैसे कार्यों कों न तो खुद करतें हैं और न ही ऐसी चीज़ों कों बढ़ावा देतें हैं.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश को आज़ाद करने के लिए स्वतंत्रता सेनानियोंने, शहीदों ने किन किन मुसीबतों का सामना किया एवं क्या क्या यातनाएं सहन की. चाहते तो वो भी आसान राह चुन सकते थे. सोचो कि  वह क्या कर सकते थे ; सुभाष चंद्र बोस, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव,खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजो से माफ़ी मांगकर आराम कि जिंदगी बसर कर सकते थे, उन्हें भी हक था शादी कर अपना घर बसाने का. उनके पास भी माँ-बाप-भाई-बहन सभी तो थे – एक खुशहाल जीवन बिताने के लिए.
देश स्वतंत्र होने के बाद वे बड़ी राजनितिक हस्ती भी बन सकते थें.
स्वतंत्रता संग्राम में अपने कार्यों की बार बार दुहाई देकर राजनितिक कार्यों में हस्तक्षेप कर अपनी मन मानी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मुश्किल राह चुनी और अपने कर्तव्य को अंजाम दिया.
और याद कीजिये ऐसे अनगिनत देशभक्त जिनका हम नाम भी भूल गए या जिनके बलिदान के बारे में कभी किसी कों पता भी नहीं चला – वो अनाम – वो गुमनाम शहीद – न जाने कितने? ….

अब सोचो हमने क्या किया एवं क्या कर रहे हैं; जगह जगह इन महान नेताओं और शहीदों की मूर्तियां स्थापित कर फिर उन्हें दुर्लक्षित कर दिया.
मूर्तियों के साथ साथ दफना दिया उनके आदर्शों को और भूल गए उनके महान बलिदान को भी.
उनके विचार, उनके उद्देश्य उनकी कार्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा इन सभी को तिलांजलि देकर हम धन्य हो गए.

आज देश में पल रहे भ्रष्ट नेतओंको पदच्युत करने के लिए और राष्ट्र हित में कोई अच्छा कार्य करने के लिए सहमति बनाने में भी हम असमर्थ हो जाते हैं, क्यों ?, क्योंकि अपना हित सर्वोपरि हो गया है.
हमने अपने आस पास इतनी ऊंची ऊंची दीवारें खड़ी कर दी हैं कि हम अपने आप में से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

हमें यह निर्णय कर लेना चाहिए कि हम चाहते क्या हैं ?
किस तरह का हो हमारा समाज?
हमारा राष्ट्र इस बदलते दौर में किस तरह मजबूत होकर उभरें?
या फिर सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा?
देश कों एक नेता कि नहीं एक समाज –सुधारक कि भी ज़रूरत हैं.
जो समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ और वर्षों से चले आ रहे सड़े-गले रीती-रिवाजों के खिलाफ देश कि जनता कों जागृत करें.
भला क्यों बार बार, जब हम अपने देश कों ‘माता’ का दर्ज़ा देते हैं और फिर भी अपनी माताओं बहनों बच्चियों पर होते अत्याचारों कों ‘नपुंसक’ बनकर देखते रहते हैं?
क्यों नहीं हम सब मिलकर ऐसे ‘देश्द्रोहियोंको’ और ‘समाज-कंटकोंको’ उनके अंजाम तक पहुंचाते हैं? क्यों नहीं हम ‘गुनाहगारों’ कों सज़ा दिला पातें है?
क्यों हम बार बार ‘जात’, ‘धर्म’, ‘प्रांत’, या ‘भाषा’ के नाम पर आपस में ही लड़तें रहे?
क्यों हम तय नहीं कर पातें हैं कि ‘जो सत्य है वो सबके लिए एक जैसा हो, जो सही हैं वो सब के लिए सही हो, और जो जायज है वो सबके लिए जायज हों?
इतने विशाल ‘गण-तंत्र’ में क्यों कुछ ‘खास लोग’ अपनी मन-मानी करतें रहें?
क्या वजह हैं कि देश के कुछ हिस्सों में अभी भी ‘सत्ता’ कुछ गिने-चुने लोगों कि ‘बपौती’ बनी हुई हैं, और केवल यही लोग दिन-दुगुनी रात चौगुनी संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं और भ्रष्टाचार कर, किराए के ‘बाहुबल’ से अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ‘गरीब’, ‘अशिक्षित’ और भोली-भाली जनता कों बरगला रहें हैं?
क्या आज़ादी के ६८ साल बाद भी हम ये तय नहीं कर पा रहें कि कैसें हम ‘एक-जूट’ होकर, एक-समाज बन कर रहें?
हमें ये चीज़ भी समझ लेनी चाहिए कि हम जितने भी हैं हम सब एक हैं, हमारे बीच किसी भी प्रकार का और कोई भी भेदभाव नहीं है – और न होना चाहिए,  और हमें एकजुट होकर रहने में ही भलाई है. नहीं तो दुश्मन तो ताक में बैठा ही है.
दूसरी बात यह है कि हमारी खुशहाल जिंदगी और हमारा भविष्य, हमारी आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य हमारे ही हाथ में है. इसीलिए जो भी ‘गलत’ है उसके खिलाफ हम सब एक होकर लडें – फिर दुश्मन अंदरूनी हो या बाहर का.

हमें अपने देश कों अपनाना होगा, इससे प्यार करना होगा. यह केवल किताबी बातें करने का समय नहीं है. दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही रही और हम जो सदियों से अपने ‘महान’ होने का ढिंढोरा पीटकर अपने आप में ही ‘बे-वजह’ ‘खुश’ होतें हैं गर्त में जा रहे हैं.

हम अंदर ही अंदर खोंखले होते जा रहे हैं. हमारा समाज एक बेहद खोखला समाज बन गया हैं. जिसे जब चाहे तब कोई भी ताकत आसानी से नष्ट कर सकती हैं.
हम सबको मिलकर जो ‘गलत’ हो रहा है उसे रोकना होगा.इसके लिए हमें ‘जात-पात’,’धर्म’,’भाषा’, ‘प्रांत’ या ‘दल’ से ऊपर उठकर सोचना होगा.

हमारा ध्येय भारत कों एक सुखी, समृद्धशाली, शक्तिशाली, सुरक्षित, सौजन्यशील, शांतिप्रिय, विकासशील,प्रगतिशील, मानवता, भाई-चारा और संवेदनशीलता कों नयी ऊंचाई पर ले जानेवाला देश बनाना का होना चाहिए. यही हमारा धर्म और यही हमारा कर्म होना चाहिए.

पिछले कई वर्षों से समाज में ‘अनुशासनहीनता’ बढ़ी है, ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था हावी रही है, और जो सरकारें आयी उनकी ‘लोला-पोला’ कार्यशैली ने राष्ट्र कि आत्मा कों कमज़ोर बनाने का कार्य किया.
अब लगता हैं कि एक मजबूत सरकार केंद्र में स्थापित हुई हैं (शायद ये कहना जल्दबाजी भी हो सकती हैं ), लेकिन जनता कि भागीदारी के बिना ये सरकार भी कुछ नहीं कर पाएगी, इसीलिए हर भारतवासी कों राष्ट्र के ‘पुनः निर्माण’ में अपना योगदान देना ज़रूरी है. और सब मिलकर एकजुट होकर राष्ट्र में एक नयी चेतना – एक नयी ऊर्जा का निर्माण करने का संकल्प करना चाहिए. अगर ये अब नहीं हो पाया तो फिर कभी नहीं हो पायेगा.
हम सब राष्ट्र के नव-निर्माण का संकल्प लें !!!

एक जूनून – एक जज़्बे कि तलाश में हैं देश!

देश कल ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है !
हम सब के लिए एक पावन दिन और उत्सव मनाने का दिन.
साथ ही साथ इन ६८ वर्षों में हमने क्या पाया इसका मंथन भी इस दिन हमें कर लेना चाहिए. देश कों मजबूत बनाने के लिए हमने क्या रास्ता अपनाया और विविधता में एकता साधने के प्रयास में हम कितने सफल हुए इसका भी आकलन करना चाहिए.
अपने समाज कों एकात्म बनाने के लिए हमने क्या प्रयास किये और आगे भी इसे बरकरार रखें के लिए, इसमें एक नया जोश और एक नयी उमंग भरने के लिए हम सबको साथ मिलकर काम करने कि ज़रूरत अब पहले ज्यादा है. क्योंकि देश के दुश्मन फिराक में है कि कब इसको तबाह किया जाए. इसमें देश कों अंदर से खोखला करनेवाले अपराधी-असामाजिक तत्व भी देश के दुश्मन ही है.
ऐसे में १२० करोड कि जनता महज़ एक भीड़ के रूप में नज़र आये ये हम लोगों के लिए सबसे बड़ी शर्म कि बात है.

हमारे देश में भीड़ कि कोई कमी नहीं है. चारों तरफ, जिधर देखो, भीड़ ही भीड़ है.
कुछ दिन पहले, भीड़ द्वारा एक चोर कों पिट-पिट कर मार देने कि घटना हुई. हमारे देश में समय समय पर ऐसी घटना होती रहती है और खबरें आती रहती है.
भीड़ चाहे तो कुछ भी कर सकती है. हमारे देश में जैसे लोक तंत्र या प्रजा तंत्र, ‘घूस-तंत्र’, ‘परिवार-वादी-सत्ता-तंत्र’ या और भी कई ‘यन्त्र-तंत्र’ काम करते हैं, उसी प्रकार से ‘भीड़ तंत्र’ की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका समय समय पर सामने आती है, और भीड़ अपनी तरीके से कई मामलों में फैसले करती रहती हैं.
लेकिन ज्यादातर गंभीर मामलों में या समाज से सरोकार रखने वाले मामलों में भीड़ खामोश रहती है और जब-जब हमें लगता है कि अब तो ‘जनता ‘ जरूरू कुछ करेगी या एक ‘जन-सैलाब’ जैसे उमड़ेगा या फिर वह निर्णायक घडी अब आ गयी है – अब ‘क्रांति’ होनेवाली है, तब-तब ऐसा नही होता है, और मेरे वतन कि १२० करोड की भीड़ का तब पता ही नही चलता है, तब उसके ‘अस्तित्व’ का एहसास ही नहीं होता है. यह एक बहुत ही गंभीर विषय है और इस पर चर्चा ज़रूरी है. जिन मुद्दों पर हम सबको मिलकर लड़ने कि ज़रूरत है, वो मुद्दे तय होने चाहिए और उनको लागू करने के लिए समाज हित युद्ध स्तर पर काम होना चाहिए.

हमारे देश में भीड़ चाहे तो बहुत ही छोटी से छोटी बात पर ‘इंसान’ की जान तक ले सकती है, पर गंभीर से गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साधे खामोश भी रह सकती है और कभी कभी तो ऐसे भी लगने लगता है कि हमारे शरीर में खून बहता भी है या नहीं?
क्योंकि जब उसे उबलना चाहिए या यूँ कहे कि खौलना चाहिए तो वैसा होता नहीं है.

भीड़ चाहे तो मामूली चोरी या छोटे से छोटा जुर्म करनेवाले आदमी को , या ‘बटुआ’ उडाकर भागते हुए चोर को पकड़कर पीट पीट मार सकती है, साईकिल चोर को पकड़कर पिट पिट कर अधमरा तक कर देती है, पर यही भीड़ ‘नाकारा’ और ‘नालायक’ राजनेताओं को कुर्सी से उतार नहीं सकती.
यहाँ तक कि पुलिस भी एक छोटे बदमाश कों तो सड़क पर घुमा घुमा कर पिटती है लेकिन बलात्कारियों कों ‘मुंह’ ढांक कर बहुत ही सुरक्षा के साथ चुपके से ले जाती है, और पीड़ित जनता हाथ पे हाथ रखकर अपनी बर्बादी का तमाशा लाचारी से देखती रहती है.

‘भीड़’ बच्चों पर जुल्म ढाने वालों को भी बक्श देती है. ईमानदार अफसरों को जिन्दा जलानेवालों के खिलाफ, भ्रष्ट अफसरों या नौकरशाहों के खिलाफ भीड़ की आवाज़ दब जाती है.
देश लुटता रहता है तो भीड़ की परछाई भी नज़र नहीं आती.

हमारा देश, हमारा समाज , हमारी संस्कृति पर धब्बा लगाने वाली कई घटनाएं हर रोज होती रहती है, पर भीड़ खामोश रहती है.
जिस देश में देवी की पूजा होती हैं वहीँ हर रोज बलात्कार की कई वारदातें होती है, यहाँ तक कि नारी के टुकड़े टुकड़े कर मार दिया जाता है, उसे सरे बाज़ार नंगा कर घुमाया जाता है, भीड़ खामोश रहती है,
बड़ी बड़ी डकैती होती है, लोगों को गाडियों के निचे कुचला जाता हैं, निरपराध बालकों को बलि चढ़ाया जाता हैं, भीड़ सुस्त रहती है,
इस भीड़ का जोश तो तभी कुलांचे मारता है जब कोई साईकिल चोर पकड़ में आये या फिर कोई कमजोर पकड़ में आये, नहीं तो सरेआम होते जुर्म को देखने वाले तमाशबीन हमारे यहाँ कम नहीं है.

पिछली कई घटनाओंको लीजिए, ऐसे कई उदहारण दिन प्रतिदिन हमारे यहाँ हैं.

‘गैर जरुरी’ और ‘विध्वंसक’ मामलों में भीड़ अपनी भूमिका जरुर निभाती हैं, बजाय इसके कि कोई रचनात्मक कार्यों में या कोई सकारात्मक गतिविधि में ‘मानव-उर्जा’ का उपयोग किया जाये.
जब चुनाव आतें हैं तो भीड़ घरों में सिमट कर रह जाती है, (अभी हाल के चुनावों में ज़रूर मतदान के प्रतिशत में वृद्धि हुई जो एक अच्छा संकेत है, लेकिन अभी भी एक जूनून कि कमी हैं ).

ये जूनून ज़रूरी है. देश में एक सामाजिक क्रान्ति जगाने के लिए ‘जूनून’ बहुत ज़रूरी है.

अभी हाल ही ऑस्ट्रेलिया में हुई एक घटना जिसमे कि रेल और प्लेटफोर्म के बीच फंसे एक व्यक्ति कों सब लोगों ने मिलकर बचाया यह बताने के लिए काफी है कि हम कहाँ हैं ! वहाँ का समाज कितना जिंदादिल हैं और हम कितने मुर्दादिल !
हमारे यहाँ दिल्ली में या फिर लगभग हर जगह मानवीय असंवेदनशीलता कि पराकाष्ठा कि कई घटनाएं है. जिनेह पढकर-सुनकर हमारा सर शर्म से झुक जाता है.

हम आपसी सद्भाव कों भूल गए है. सामाजिक सरोकार से कट चुके है. विकास कों हमने केवल भौतिक सुखों से जोड़ लिया है. संस्कृति, सभ्यता, समाज इन सबसे हमने किनारा कर लिया है, नहीं तो आये दिन बच्चियों पर हो रहे अत्याचारों कों देश यूं मूक-दर्शक बन कर न देखता रहता.
हमें तय करना चाहिए कि किस तरह का समाज, किस स्तर का जीवन हम जीना चाहते हैं.
हमारा जीवन स्तर क्या होना चाहिए, हमारे जीवन जीने का ‘गुणवत्ता स्तर’ क्या हो ?
पिछले दिनों देश हुई कई घटनाओं कों लीजिए और उनके गाम्भीर्य कों घटाती व्यवस्था कों देखेयी, ‘सामाजिक संवेदनहीनता’, ‘ मानवीय संवेदनशीलता’ कों भूलता, और एक ‘निष्क्रिय नपुंसकता’ कि तरफ बढ़ता हमारा देश साफ़ नज़र आएगा.

हमें तय करना चाहिए कि हम हमारी बर्दाश्त करने कि हद कहाँ तक होगी? हम कितना अत्याचार सहते रहेंगे और कब तक राजनेताओं के जाल में फंसकर आपस में लड़ते रहेंगे? नैतिक मूल्यों के प्रति, सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति हमारे कर्तव्य क्या हैं? कब तक हम घिसे-पिटे तरीके अपनाकर अपने आप कों बर्बादी कि गर्त में ले जाते रहेंगे? कब तक हम नाकारा व्यवस्था कों अपनी मन-मानी करने देते रहेंगे?

कब हम ‘जागरूक’ नागरिक’ अपनी ‘कुम्भकर्णी’ निद्रा से जागेंगे?
कब हम एक ‘तमाशा’ देखनेवाली भीड़ कि जगह एक ‘राष्ट्र’ कहलाने लायक बनेंगे?

भारत नमो नमः !

जब कहीं ‘नयी सड़क’ बनती है,
मुझे ‘गतिशील भारत’ नज़र आता है,
जब कही ‘नया पूल’ बनता हैं
मुझे ‘अवरोध मुक्त जीवन’ कि
आशा बंधने लगती है,
जल-भराव होने वाली जगहों पर
जब नए नए ‘काज-वे’ बनते है,
मुझे बाढ़ में फंसे हुए मुसाफिर को
राहत मिलती दिखती है,
इस देश का विकास मेरा ‘जीवन-यज्ञ’ बन गया है,

जब कहीं नया उद्द्योग आकार लेता हैं,
मुझे ‘बेकारी’ की समस्या कुछ कम होने कि खुशी होती ,
जब नयी कोई परियोजना ‘मंजूर’ होती हैं ,
तो मुझे विकास कि तरफ ‘दौडता हुआ ‘भारत’ नजर आता है,
लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से मुझे सुख की अनुभूति होती है,
मुझे नव निर्माण से नयी ‘प्रेरणा’ मिलती है,
मुझे उद्योग्शील समाज से नव ‘चेतना’ मिलती है,
इस देश के संसाधनों में मेरी श्रद्धा है,

अंतरिक्ष में जब भारत नयी नयी खोज करता है,
और नए नए मक़ाम हासिल करता है,
मुझे सारा आकाश तिरंगा नज़र आता है,
बादलों के पार लगता है तिरंगा लहरा रहा हो जैसे,
गूँज रहा है नाद ‘जय हिंद’ का चारों ओर ,
मिट्टी के कण कण से उठ रही हैं ‘सुनामी’ समृद्धि की,
देश की समर्थता में मुझे विश्वास हैं,
चहूँ-ओर मुझे भारत कि पताका लहराती नजर आती है

विकास मेरे दिल कि धडकन बन गया है,
प्रगति मेरी सांस में बस गयी है,
गुजरात मेरी शिराओं में दौडता है,
और शक्तिशाली भारत मुझे दौडाता हैं,
मैं हिंदुस्तान को जीता हूँ,
मैं उठता हूँ तो इस देश की मिटटी की ताकत के साथ,
और सोता हूँ तो लेकर सपने –
समृध्दशाली, सुखी और प्रगतिशील भारत के,
सद्भावना मेरी पहचान बन गयी है,
इस देश की आन मेरी ‘जान’ बन गयी हैं,

देश के पर्यावरण कि रक्षा,
कर्त्तव्य मेरा प्रथम है,
प्रकृति में मौजूद ईश्वरीय शक्ति को
मेरा बार बार नमन है,
मुझे उत्तुंग पर्वत शिखर और अथाह सागर में
कई जन्म जीने का अनुभव होता है,
और जब नर्मदा का जल कच्छ में आता हैं
मुझे ‘भागीरथ-प्रयास’ का अर्थ समझ में आने लगता हैं,
जहां भी कोई अच्छी बात होती है
या सकारात्मकता आकार लेती है
मुझे जीवन का मर्म समझ आता है
‘मेरा जीवन’ अब ‘भारत’ है,
‘भारत’ ही अब ‘मेरा जीवन’ है !!!

(यह कविता श्री.नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी से प्रेरित है, और उनके व्यक्तितत्व, उनके विचार और उनके कार्य को समर्पित है)

नमो भारतः !!

इसमें कोई शक नहीं रह गया हैं के देश में परिवर्तन कि लहर चल रही है. और पिछले कुछ वर्षों में उत्पन्न हुई ‘राजनितिक’ शून्यता’ और ‘वैचारिक दिवालियेपन’ से देश बाहर भी निकलना चाहता है.
इसकी शुरुवात सही मायनों में अन्ना के आंदोलन से हुई थी. और देश में एक नयी उमंग का एहसास भी हुआ था. अभी हाल के चुनावो में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि कों भी हम एक अच्छा संकेत मान सकते हैं कि राष्ट्र एक नव-निर्माण कि ओर अग्रेसर होना चाहता है.

‘राष्ट्र निर्माण’ या कहिये कि ‘राष्ट्र का नव-निर्माण’ करने के साथ ही हमें ‘राष्ट्र’ कों एक ‘जीवंत-शील’ राष्ट्र बनाना है. एक नयी ‘उर्जा’ निर्माण करनी है, जिससे लगे कि पूरा देश एक ‘आत्मा’ है एक ‘अद्बुत शक्ति’ है.
इसके लिए प्रशासनिक ‘इच्छाशक्ति’ कि तो ज़रूरत हैं ही, सामान्य जनता का भी कर्तव्य बन जाता है कि वो देश कि प्रगति और समृद्धि में अपना योगदान पूर्ण समर्पण के साथ करें.
लोगों कों ये भी मान लेना चाहिए कि सब कुछ ‘सरकार’ के भरोसे ठीक नहीं हो सकता, फिर चाहे ‘प्रधानमन्त्री’ कोई भी क्यों न हो. आम जनता कों अपने कर्तव्यों कों भली भाँती समझना होगा और उसे निभाना भी होगा.
वर्षों से हमें ये सुनने कि आदत हो चुकी हैं कि ‘अपने बाप का क्या जाता है’, ‘मजबूरी का नाम..’, ‘सब चलता है..’.
इसलिए हमारे लिए जो कुछ अच्छा या बुरा होता हैं हम उसको ‘सरकार’ का किया कराया मान लेते हैं. सार्वजनिक जीवन में ‘संवेदनहीनता’ जो पराकाष्ठा कि हद पार चुकी है वो इसी का नतीजा है. दिन ब दिन हम एक दूसरे के प्रति और राष्ट्र हितों के प्रति असंवेदनशील बनते गए और बढते गए.
लेकिन अब नए सिरे से शुरुवात करने कि ज़रूरत है. और एक संवेदनशील, जिम्मेवार, राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब हम ‘चरित्र निर्माण’ से शुरू करें और अपना सामाजिक दायित्व निभाएं, देश के प्रति अपना ‘स्वामित्व’ समझे.
लेकिन हमारी प्रशासनिक कार्य प्रणाली इस तरह कि बन गयी हैं जब तक कोई ऊपर से आदेश न दे तो ‘बाबु’ लोग मानते नहीं है.
और ऐसे नेता भी नहीं रहे जो लोगों कों इतनी छोटी छोटी –मगर बेशकीमती बातें सिखाएँ और उनका मार्गदर्शन करें.
लेकिन मैं आपके सामने कुछ प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जो आप पढ़िए और खुद ही इस नेता के बारे में अपना मन बनाईये और उनके बताए हुए नक़्शे कदम पर ज़रूर चलिए और राष्ट्र कि प्रगति में उनका साथ दीजिए.
आपने बड़े बड़े नेताओं के मुंह से बड़ी बड़ी बातें तो ढेर सारी सुनी होगी, लेकिन अब सुनिए के कैसे ‘चरित्र निर्माण’ से (जिसकी हमें सख्त ज़रूरत हैं ) ‘राष्ट्र निर्माण’ होता है;
(ये श्री नरेन्द्र मोदी जी के सन २००८ में कांकरिया तलाव के उद्घाटन समारोह में दिए गए भाषण के कुछ अंश है, इसके तीन भाग है जो यु टूब पर उपलब्ध है और जिसकी ‘लिंक’ यहाँ पर दी गयी है. जिन्हें जीवन में कुछ कर गुज़रना है और जो अपने ‘उच्चतम ध्येय कों हासिल करना चाहते वो इससे ‘सीख’ ज़रुर ले सकते है. मैनेजमेंट’ कि भाषा में कहूँ तो इसमें ‘मोटिवेशन’, ‘इंस्पीरेशन’, ‘ओवनरशिप’ और ‘सेल्फ – अक्चुव्लैजेशन’ के पाठ आप ले सकते हैं)

इन तीन भागों में जो भाग-२ हैं उसके कुछ अंश मैं अनुवाद करके (चूँकि यह भाषण गुजराती में हैं) इस लेख में जोड़ दूं उससे पहले कुछ बातों का सारांश यहाँ दिया गया हैं जो मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण हैं .

Namo at Kankaria festival -Ahmedabad 2008 – PART – 2/3

(Bharat jodo, Ownership, ગુજરાત ગૌરવ, Make cleanliness a habit, Vote bank politics,
Politics of development Preserve the trees, Preserve this Kankaria, Do we need Security to even preserve our Gardens and Places of Public Interest?)

(Start from 04:28 in the YT link)

भाइयों और बहनों, यह कांकरिया तलाव अपना है. यह अहमदाबाद मुनिसिपल कॉरपोरशन का नहीं. यह केवल भारतीय जनता पार्टी का नहीं, यह कांग्रेस पार्टी का भी नहीं. यह कर्णावती समग्र जनता कि है. इन सबकी मालिक जनता जनार्दन हैं. और जिसकी मालिक खुद जनता हो, हम खुद हो, तो इसको कोई खराब करें क्या हम वो बर्दाश्त कर सकते है. कोई यहाँ के संसाधनों को तोडें, जनता कि संपत्ति का नुक्सान करें, क्या हम उसे बर्दाश्त कर सकते हैं. इन सबके प्रति एक जिम्मेवारी हम सबकी हैं और ऐसा वातावरण निर्माण करने कि जिम्मेदारी भी हमारी हैं. उसकी रक्षा भी जनता को करनी चाहिए. और कोई इसे नुक्सान पहुँचाने कि हिमाकत करता हैं तो उसे रोकने के लिए भी हमें ही आगे बढ़ना चाहिए. यहाँ किसी पार्टी या किसी दल का कोई सवाल नहीं हैं. यह राष्ट्र कि संपत्ति है. यह भूमि हमारी हैं. इसकी रक्षा करना, इसका रख रखाव करना और स्वच्छता बनाए रखना हम सब का फ़र्ज़ हैं.
– जहां तक मुझे याद पड़ता हैं, शायद ही किसी नेता ने ऐसी चीज़ें कभी अपने भाषण में कही होंगी. अगर पिछले ४० वर्षों में भी किसी नेता ने ऐसी बातें कहीं हो तो जानकार और वरिष्ठ इस लेख में जोड़ सकते हैं और इसी प्रकार से किसी ने समाज प्रबोधन किया हो तो हम जनता के सामने ला सकते हैं.

Links for Part-1 and Part -3 (and the ‘highlighted’ points as I find out in them)

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 1/3

(Continual improvement, keep moving, remove the obstacles, pollution,
Environment, Awakened citizens, cleanliness, plastics, polythene, civic sense, above party level, Living standards, Standard of living

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 3/3

(Nirmal Gujarat)

१२५ साल पुरानी पार्टी

(A party that would have been ‘different’)

अप्रैल ७ से लेकर मई १२ तक चले मतदान के पूरा होते ही सबको चुनावों के नतीजों का इंतज़ार है.
१६ मई कों चुनावों के नतीजों के आने के साथ ही देश में नयी सरकार के गठन कि प्रक्रिया शुरू हो जायेगी.
आम आदमी (मतलब हम सब = जनता) यही उम्मीद करता है कि जो पार्टी जीतें वो पूर्ण बहुमत से जीते और जो सरकार बने या जिसकी भी सरकार बने वो एक स्थायी सरकार हो और पांच साल वह सरकार जनता कि भलाई के लिए और जनता के कल्याण के लिए काम करे.
देश कों एक नयी प्रेरणा दे. देश कों एक नयी दिशा दे. देश कों एकात्म करें !!
देश में विकास का और भाईचारे का, चैन और अमन का वातावरण निर्माण करे.
देश में चली आ रही सड़ी गली राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें और कानून का राज्य स्थापित करने में मदद करें.

२०१४ के चुनावोंके लिए मतदान शुरू होने से पहले तक सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी अपना ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ होने का राग अलापती रही. और सबसे पुरानी पार्टी होने कि दुहाई देती रही. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इस बात कों उन्होंने ज्यादा तव्वजो नहीं दी या इस मुद्दे कों ज्यादा उछाला नहीं. पता नहीं क्यों?
लेकिन जब जब कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब चुनाव से पहले हर बार, अपनी खास लच्छेदार भाषा में इस बात का उल्लेख करते रहते तो मुझे बहुत पीड़ा होती थी और अब भी होती है, क्यों कि कांग्रेस १२५ साल पुरानी पार्टी होने के बावजूद भी जनता कि नब्ज़ नहीं पकड़ पायी. शासन कों प्रभावशाली बनाए रखने के लिए नए नए तरीके नहीं ढूँढ पायी.
देश में एक नव-चेतना का वातावरण निर्माण नहीं कर पायी. बल्कि लोग दिन ब दिन उदासीनता कि खायी में धंसते चले गए और ‘सरकार’ से – शासन प्रणाली से- यहाँ तक कि लोकतंत्र कि सभी ‘संस्थाओं से – उनका ‘मोह-भंग’ होता गया.

एक ऐसी पार्टी जो अपने आप कों बार बार ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ बता रही हो और जो करीब ६० साल तक देश में सत्ता के केंद्र में रही हो वो चाहती तो बहुत कुछ कर सकती थी.
उनके पास लीक से हटकर काम करने का पूरा मौका था. जरुरत थी तो सत्ता कि लालसा कों त्यागकर, तुष्टिकरण और जात पात कि राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में कार्य करने की. कांग्रेस ने हमेशा अपने आप कों सबसे ज्यादा ‘सेकुलर’ बताने कि कोशिश कि, और असल में कांग्रेस ने ही हमेशा कभी धर्म के नाम पर, कभी जाती के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम पर लोगों कों बांटने कि राजनीति की.
कांग्रेस ने ‘सेकुलरिस्म’ जैसे शब्द कि भी ‘गरिमा’ घटा दी.

कांग्रेस चाहती तो ‘जातिगत’ आरक्षण कों खत्म कर ‘आर्थिक’ आधार पर आरक्षण कों लागू कर सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो धरा ३७० कों भी कबका खत्म कर सकती थी.
कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाकर दोषियों कों सज़ा दिलवा सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण निर्णय लेकर देश में ‘परिवर्तन’ कि शुरुवात कर सकती थी.
कांग्रेस १६ दिसम्बर के दोषियों कों (नाबालिग आरोपी सहित) तत्काल फांसी दिलाकर देश में एक नया सन्देश दे सकती थी.
गुनाहगारों कों पनाह देना भी कांग्रेस राज कि एक बहोत बड़ी खासियत रही है . कांग्रेस के राज़ में हमेशा एक ‘लोला-पोला’ सरकार का आभास रहा है (खास कर पिछले दस वर्षों में )

एक ऐसी पार्टी जिसने ६५ साल तक ‘सत्ता’ का ‘ज़हर’ पीया हो, वह तो ‘नीलकंठ’ बन ही चुकी होगी, तो फिर उसे तो हर बदलती परिस्थिति के अनुसार रूप बदलकर खुले दिल से, इस देश के ‘राज-पटल’ पर ‘तांडव’ करना चाहिए था !

लेकिन सत्ता में बने रहने कि चाह और ‘गठबंधन’ कि ‘मजबूरियों’ ने उसे ऐसा करने नहीं दिया.
अन्ना हजारे का अनशन, १६ दिसम्बर कि दिल्ली बलात्कार कि घटना के बाद का जनाक्रोश, नित नए घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले, सीमा पर कुर्बान होते सिपाही, पडोसी देश कि हिमाकत, चीन का देश कि सीमा के अंदर घुस जाना, नक्सली हमले, महंगाई, और बिगड़ती ‘कानून’ व्यवस्था के भी अनगिनत मौके – जिन मौकों पर सरकार आगे बढ़कर अगुवाई कर सकती थी, ये १२५ साल पुरानी पार्टी कि सरकार ‘मौन’ धारण कर बैठी रही. और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि लग रहा था जैसे इस देश में सरकार नाम कि कोई चीज़ बची ही न हो.
यहाँ ज़रूरत थी एक नयी सोच की. घिसे-पिटे तरीकों से हट कर नए तौर-तरीके आजमाने की.

और सबसे बड़ा काम कांग्रेस कर सकती थी वो ये कि देश कि जनता कों एक सूत्र में बांधने का, एक जज्बा पैदा करने का. विकास का सपना दिखाने का, नौजवानों कों एक नयी राह पर चलने और कुछ करने का आह्वान कर उनमे जोश पैदा करने का. राष्ट्र कि आत्मा में एक नयी चेतना फूंकने का.
वह लोगों में इस देश के प्रति अपने ‘अधिकारों’और अपने ‘स्वामित्व’ कि भावना को जगा सकती थी. साथ ही ‘राष्ट्र’ के प्रति अपने ‘कर्तव्यों’ का आभास भी करा सकती थी.
लेकिन ‘कुछ कर गुजरने कि इच्छाशक्ति’ कांग्रेस में रही ही नहीं.
यह १२५ साल पुरानी पार्टी अपने ही अहंकार में डूब कर रह गयी. और जनता कों अपने पैरों कि ‘जूती’ समझकर जनता से नाता तोड़ लिया, जनता से जैसे इसे कोई सरोकार रहा ही नहीं.
यह बात शत प्रतिशत सही है कि अपने अहंकार में डूबी कांग्रेस पार्टी एक ‘वैचारिक दिवालिएपन’ के कगार पर पहुँच चुकी है. और उसे इस स्थिति में पहुंचाने के लिए वास्तविकता कों दरकिनार कर लोगों कों गुमराह करने कि कोशिश करनेवाले, गलत-बयानी करनेवाले और चाटुकारिता कि पराकाष्ठा करनेवाले उसके नेता ही जिम्मेवार है.

पिछले कुछ वर्षों में हमारी ‘संस्कृति’ का जो पतन हुआ, ‘निति-मूल्यों’ का र्हास हुआ, ‘नैतिकता’ ताक पर रखी गयी(याद कीजिये ‘संसद’ में क्या क्या हुआ), यही १२५ साल पुरानी पार्टी ‘मौन’ धारण कर अपने ‘ऐशो-आराम’ में मशगुल रही.इसके नेता, आदतन अपने स्वार्थ-पूर्ति में लगे रहे.

जबकि कांग्रेस चाहती तो युवाओं के ‘चरित्र निर्माण’ के साथ ही ‘राष्ट्र के नव-निर्माण’ का बीड़ा उठा सकती थी. (ऐसा करने कि कोशिश किसी ने की ?, मेरे अगले लेख में ज़रूर पढ़िए)

जो राजनितिक शून्यता पिछले कुछ वर्षों में निर्माण हुयी उसे दूर करने के लिए एक ऐसे नेता कि ज़रूरत थी जो ‘लीडर’ तो हो ही, और ‘फकीर’ भी हो, जिसका अपना जीवन ही ‘फकीरी’ में बीता हो जो खुद सत्ता में हो पर जिसके करीबी उसका नाजायज़ तो छोड़ ही दो जायज़ फायदा भी नहीं उठाना चाहते हो

अच्छा ये भी सोचा जाए के कांग्रेस कुछ फैसले लिक से हट कर कर लेती तो नुकसान क्या होता?
ज्यादा से ज्यादा कुछ साल सत्ता से दूर हो जाते?
फिर कांग्रेस पार्टी के पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था.
पार्टी कि संपत्ति (पार्टी फंड) अपनी प्रमुख विपक्षी पार्टी से तीन गुना ज्यादा है.
सालों से उसके प्रतिनिधि सत्ता का सुख भोग चुके है. तो कुछ वर्ष अगर जनता के बीच में गुजारते तो क्या फर्क पड़ता? इसी बहाने समाज-सेवा कर लेते! लेकिन उनमे कुछ नया करने कि ‘इच्छाशक्ति’ मर चुकी थी.
किसी हाल में वे सत्ता से दूर नहीं रहना चाहते.
‘एक्सिट-पोल’ के अनुमान आने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्षा मैडम सोनिया गाँधी का ये बयान कि ‘हम क्षेत्रीय दलों के संपर्क में है’ का क्या मतलब निकाला जाए?
वही ‘जोड़-तोड़’ फिर से?
या ‘खरीद-फरोक्त’?
क्या आप, अगर सीटें कम मिलती हो तो, एक सशक्त विपक्ष का रोल नहीं अदा कर सकते?
जिन क्षेत्रीय दलों ने ‘राजनीति’ में आ कर देश को इस ‘रसातल’ में पहुँचाया आप फिर उन्ही से संपर्क में हैं, इसका क्या मतलब?