देखो ये मेरे ‘बंधे हाथ’ …..

दिल्ली कि मुख्यमंत्री माननीय श्रीमती शीला दीक्षित जी ने एक ‘टीवी’ इंटरव्यू दिल्ली कि बिगड़ती कानून व्यवस्था को ठीक न कर पाने के कारणों का ब्यौरा जब दिया, और अपनी जो लाचारी, मजबूरी उन्होंने जाहिर कि तो मेरे जैसे ‘आम आदमी’ (नहीं उस पार्टी से मेरा कोई लेना देना नहीं है .. वैसे ‘आम आदमी’ पार्टी ने आंदोलन में शरीक होकर एक अच्छा संकेत दिया है) के मन में कई सवाल उठे.
और एक बात तो समझ में आयी कि शीला दीक्षित जी का ‘इंटरव्यू’ इस बलात्कार कि दुर्घटना का दुःख जताने से ज्यादा अगले साल दिल्ली में होनेवाले चुनाव के मद्देनज़र, बिगड़ती कानून व्यवस्था को सँभालने में अपनी नाकामयाबी को ढकने के प्रयास कि शुरुवात भर लग रहा है.
जरा सोचें के खुद मुख्यमंत्री कह रही है कि ‘मैं पिछले ग्यारह साल से इस बात का प्रयास कर रही हूँ के दिल्ली पुलिस हमारे अधीन कर दी जाए, लेकिन ये हो नहीं पाया’, ग्यारह साल (२००४ से पकडें तो आठ साल) एक मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी कि सरकार से- केंद्र सरकार- से एक महत्वपूर्ण और जरुरी काम नहीं करवा पायी, जिससे कि राज्य कि कानून व्यवस्था को वे सुधार पाती या फिर उनके कहे मुताबिक़ ऐसी घटनाएं न होने देती.

और इस टीवी इंटरव्यू में उन्होंने शब्द भी ऐसे चुने जिससे कि आम आदमी कि दुखती रग पर हाथ डाला सके. जैसे कि ‘ मेरे हाथ तो बंधे हुए है…’
सोचो के अगर एक मुख्यमंत्री के हाथ अगर इतने बंधे हुए है तो आम आदमी कि क्या औकात है.
और इस आम आदमी को अपने हाथ किस हद तक खोलने कि जरुरत है . क्योंकि अभी जब आम आदमी ने अपना आक्रोश-विरोध जताया तब कहीं जाकर इन्होने ये कहने कि जहमत उठायी के ‘मेरे हाथ तो बंधे हुए है’. नहीं तो, ये तो बस इस वक्त को भी किसी तरह लीपापोती कर गुज़ार ही देते.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हैं कि , जब हम निम्न से निम्न स्तर के कर्मचारी से भी या अफसर से भी ‘अग्रसक्रियता’ (pro-activeness) कि उम्मीद करते हैं, जवाबदेही कि बातें करतें हैं, निरंतर सुधार कि बातें करतें है, उसके कार्य प्रदर्शन, कार्यक्षमता से उसकी तनख्वाह को जोड़ते है, तो क्या इन लोगों के लिए ऐसे नहीं करना चाहिए?, एक आम आदमी आज कि तनावभरी जिंदगी में दो जून कि रोटी के लिए जी-जान से मेहनत करता है, अपनी तरक्की के लिए अपनी कार्यक्षमता बढाने से लेकर अपने प्रदर्शन में सुधार करते रहता है, इस सब के लिए अपने मालिक कि या अपने अफसर कि बातें, उसका गुस्सा बर्दाश्त करता है, तो इतने ऊंचे ओहदे पर बैठे हुए इंसान से क्या यही उम्मीद रखी जाए कि उसे पता होने के बावजूद पिछले ग्यारह साल से इतने गंभीर मसले को हल नहीं करवा पाया.
जनता इस बात को सोचें इन ग्यारह सालों में कितने गुनाह हुए, कितने बलात्कार हुए, कितने बच्चे गायब हुए, कितने बुज़ुर्ग लोग क़त्ल कर दिए गए, बाकी चोरी चकारी, लूट-पाट और क्या क्या नहीं हुआ?

शीला मैडम का ये इंटरव्यू तो बस सहानुभूति बटोर कर २०१३ के दिल्ली चुनाव कि तयारी करने का प्रयास था. नहीं तो आज तक दिल्ली में दरिंदगी कि कितनी घटनाएं हुई , तब उन्होंने कहाँ कोई इंटरव्यू दिया. ये मजबूरी है जनाब के एक साल के बाद चुनाव सर पर होंगे.
और उनके इंटरव्यू के बाद उनके बेटे संदीप दीक्षित जी भी बचाव में कूद पड़ें, तो समझ लीजिए के वे विरासत सँभालने कि तैयारी में लग गए हैं.
दिल्ली में बलात्कार विरोधी आन्दोंलन में जब कुछ असामाजिक तत्व कि उपस्थिति पायी गयी तो यह भी सोचना चाहिए कि इसमें किसी राजनीतिक दल का ‘हाथ’ तो नहीं?

क्योंकि जब भी एक बड़ा आंदोलन खडा होता है तो सरकार को बेचैनी होती है. यही स्थिति अन्ना के और रामदेव जी के आंदोलन के समय भी देखी गयी. क्योंकि सामाजिक समस्याओंके के लिए लोग इक्कठे हो यह राजनीतिक दल बर्दाश्त नहीं कर पातें हैं. क्योंकि वो अच्छी तरह जानते हैं जहां लोगों में एकता आयी वहाँ उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.
हाँ, शीला मैडम के राज में बच्चों, महिलाओं , बुजुर्गों, विद्यार्थियों पर जो लाठीचार्ज हुआ उसका क्या?
और, ध्यान बटाने के लिए वो खुद ही इतनी मांगे कर रही है, तो फिर इन समस्याओं को सुलझायेगा कौन? और अगर वे नहीं सुलझा सकती तो इतने साल से मुख्यमंत्री बने रहने का क्या मतलब है?

(एक हमारे प्रधानमंत्री है जो कभी ‘डीपली डिसअप्पोइंटेड’ होते है तो कभी ‘डीपली सैड’ होते है, आपको भी ऐसा ही महसूस हो और जवाब न सूझे, तो आप भी १९७३ कि अमिताभ कि फिल्म ‘बंधे हाथ’ का किशोर का गाया गीत ‘देखो ये मेरे बंधे हाथ ..’ सुनकर या गाकर अपनी मजबूरी को बहला सकते हैं).

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