उम्मीद

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पे दुनिया कायम हैं,
इसलिए है उम्मीद तुझसे ही मेरी, कि जैसे है,
सृष्टि को नियम से,
नियम को परिश्रम से,
तपिश को ठंडक से,
रेगिस्तान को हरियाली से,
क्षुधा को खुराक की,
तृषा को जल से ,
लहर को किनारेसे,
निराशा को है आशा से,
धरती को सूरज से,
अग्नि को वायु से,
इंसान को इंसानियत से,
आत्मा को परमात्मा से,
और रिश्तों को ‘विश्वास’ की है उम्मीद !
यह रिश्ता टूट न जाये कभी,
बंधी रहे डोर पंचतत्व की इस जीवन से,
चलता रहे कारवां जिंदगी का यूँही,
यही सोचकर,
आज,
फिर ‘उम्मीद’ के ‘बादल’ घिर आये है,
और छायी है ‘घटा’ ‘विश्वास’ की,
लुटा दे हम पर तेरी ‘दया’ का ‘सागर’,
……… बरस जा अब तो !

(This poem was earlier posted on nai-aash.in and somehow it missed here, so re-blogged today with a hope that all these prayers reach to the God and he showers his blessing on us – on all of us)

इक ऋतू आये , इक ऋतू जाए …

मेरे अब तक के जीवन में शायद पहली बार ऐसा हुआ के सूखे कि आशंका से मैं काँप उठा. इससे पहले भी कभी बारिश कम हुई होगी या सूखा या अकाल पड़ा होगा, लेकिन तब भी मैं जिन जिन जगहों रहता पर था वहाँ पर बारिश ज़रूर हुई थी.
यह अलग बात हैं कि बारिश कम हुई होगी, और जब ज़रूरत थी तब नहीं होकर आगे पीछे हुई होगी. लेकिन बारिश होती थी. भयंकर गर्मी और तपिश के बाद बारिश ज़रूर होती थी !
लेकिन इस बार महसूस हो रहा हैं के हालात कितने खराब हैं.
एक दिन पहले बिलकुल ‘साफ़’ आसमान देखकर अचानक मेरा मन घबरा गया. बादलों का कोई नामोनिशान नहीं था. एकदम साफ़ आसमान!
क्या सचमुच बारिश नहीं होगी?

‘प्यासी बंजर धरती
किसका पेट भरे
भूखे प्यासे बच्चे
खेती कौन करे’

और गर्मी तो दिन ब दिन बढती ही जा रही है? कब इस तपिश से हमें राहत मिलेगी?
कब सूखी-बंजर-बिखरती ज़मीन कों बारिश कि बूँदें अपने प्यार से नहला देंगी?
मैं हर रोज ‘टक-टकी’ लगाए आसमान कों देखता रहता हूँ कि बादल आये और ‘उमड़-घुमड़’ कर बरस जाएँ. और हमें कईं मुश्किलों से बचाएं !
हो सकता हैं आज जो कुछ बादल इकठ्ठा हो रहे हैं कल वे बरसेंगे ज़रूर…
और बरसात के बाद जब माहोल खुशनुमा हो जाएगा उसकी अनुभूति कों कौन भूल सकता हैं भला?

वैसे तो समय समय पर मैं अपनी कविताओं में ‘पर्यावरण परिवर्तन’ ( Climate Change ), प्रदुषण के दुष्परिणाम, बढते उद्योग – घटते संसाधन, ऋतू चक्र में परिवर्तन इत्यादि कि बातें करता आया हूँ.
लेकिन उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा. क्योंकि ‘प्रकृति’ अपना ‘समतोल’ बनाए रखती हैं और अभी तक यही एक ऐसा ‘चक्र’ था जिस पर विश्वास बना हुआ हैं और रहेगा.
पर इतना ज़रूर हैं कि अब आबोहवा बदल गयी हैं.

ऐसे में मुझे एक गीत कि ये पंक्तियाँ याद आयी ;

‘तक तक सूखे परबत
आँखें तरस गयीं
बादल तो न बरसे
आँखें बरस गयीं ‘ …
‘बरस बरस दुःख बढ़ता जाए’

***

संयोग से आज ही अपने देश का आम बजट पेश हुआ. टीवी पर जोर शोर से बजट के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं चल रही हैं .
किसको कितना फायदा हुआ यह तो कुछ समय पश्चात ही पता चल पायेगा.
लेकिन देश स्वतंत्र होने के बाद से लेकर अब तक, कितने – मौसम बदले – मतलब कितने बजट पेश हुए. लेकिन क्या बजट में किये गए वादे पुरे हुए?
क्या गरीबों के जीवन में कुछ सुधार हुआ.
क्या बरस दर बरस ‘दुःख’ कम हुआ या बढ़ता ही गया?
हमारी ‘समस्याएं’ कम हुई ?
जिन लोगों ने देश कों आज़ाद होते हुए देखा या जो आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पैदा हुए थे, वे देश के हालात के बारें क्या राय रखते हैं? क्या, जो सपने उन्होंने देखें थे वो पुरे हुए?

क्या सचमुच मौसम बदला?
नसीब बदले?
या फिर …
‘प्यार न सीखा
नफरत करना सीख लिया
सब लोगों ने लड़ना मरना सीख लिया’
और अंत में हमें ये न कहना पड़ जाए कि ,
‘इक बजट आये, इक बजट जाए.. गरीबी मिटे ना ..
हाँ, मिट गए गरीब…’
(यहाँ पर ‘मुश्किलों’ का मतलब हमारी रोज़मर्रा कि समस्याएँ, और ‘रकीब’ हैं = हमारी ‘सिस्टम’या हमारी ‘व्यवस्था’…)

***

खैर आप भी सत्तर के दशक के इस हृदयस्पर्शी गीत का आनंद उठाईये और महसूस कीजिये कि क्या बदला और क्या नहीं.
आदरणीय अतुल जी के ब्लॉग पर इस गीत कि ये कड़ी आपके लिए प्रस्तुत हैं !

इक ऋतू आये

आनंद बक्षी साहब के शब्दों को किशोर कुमार ने बहुत ही दिल से गाया हैं और इसे स्वरबद्ध किया हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’ जी ने !

***

‘A long way to go…..’

Celebrating 100th Post on Samajshilpi !

Congratulations to Samajshilpi! Congratulations to all associated with this blog!!

As we were approaching for the 100th post on Samajshilpi I was thinking of some special post and what would be the topic for this post.

However on a very perfect time I got this post from my daughter Ashwini and I am glad to post this as the 100th post on this blog, as she have been the other ‘main contributor’ on this blog.
Ashwini started writing when she was studying in VII Th, and with this blog she has also completed ‘Five’ years of ‘writing’.
The number of her posts gradually reduced due to her studies and in between her clearing out the board exam for X Th and now she has this another crucial year of XII th.

So, I cannot demand more from her, and over the years my tone has also changed from ‘is topic par likho or kuchh likhkar dena’ to ‘tumne kuchh likha kya?’ to ‘Kuchh likha ho to bataana’! (For keep continuing the posting new posts on the blog, as my posts were also reduced due to work priorities).

Though I have got at least 3 posts ready, there timing is to be matched with posts on my other networked blog.

I thank my friends Shri.Ashish Tilak and Shri.Bharat Bhatt for their continued support to me.
Also I thank Shri.Raja, Shri.Jigar Modi for their contribution and posts.

So, very happily presenting herewith this post and hope to see your comments and feedback thereof…

And thanking you all the readers, well wishers and supporters for appreciating this blog.
-    Avinash Scrapwala

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‘ A Long Way To Go …’

Can’t figure out, what to say,
Can’t figure out to go which way,

The more I feel I’m through it all
Situation tend to be the same again,
The more I decide to be quite somehow
All my patience goes in vain!!

‘Why again me?’ is not what I’m asking
It’s not that I want to get rid anyway,
Blaming you-‘my life’, is not what I’ll do
But I’ll try to understand what you want to convey…

When it really feels I’ve unfolded the mystery
That’s the point where life takes a turn,
When I say to my life that I’ve learned what you taught me
That’s when life shows me I still have “so much to learn”!

Can’t figure out what to say
Because my feelings are what, I really don’t want to show,
Can’t figure out to go which way,
Because it is still ‘A very long way to go……’ !

 

 

टक टकी …

क्यों हमसे इस कदर रूठा है तू भला,
और फेर ली है हमसे निगाहें अपनी,
क्या नहीं है परवाह तुझे उन मासूमों की भी,
जिन्होंने अभी अभी होश संभाला है,
और वे जिन्हें, तेरे होने पर -
तुझसे भी ज्यादा ‘यकीन’ है,

माना कि, की है बेवफाई हमने,
तेरे उसूलों से, और,
भटक गए हैं तेरी बताई हुई राह से हम,
फेर लिया है मुंह कुछ इस तरह से हमने ,
कि ‘जानकर’ बन गए है ’अनजान’
अपने ‘अंजाम’ से हम,

पर हम बेबसों कि तू सुनता रहा है सदा,
लगाये बैठे हैं टक टकी तेरी ओर,
हे परवर दिगार तुम दयालु ‘सरकार’
तेरा ही चलता रहा हुक्म हर बार,
तेरे बस में हैं सब भंडार
सूखी,बंजर,बिखरती ज़मीन को
तेरे ‘रहमो-करम’ का है इंतज़ार

‘Dharti Kahe Pukaar Ke’… ‘ जीयो और जीने दो’ !

‘Neela aasmaan’ ‘Dharti’ ‘Saagar’
‘Baadal aur Bijli’
‘Saanjh aur savera’
‘Dhundh’
‘Dhoop Chhaaon’
‘Raat aur Din’
‘Geet gaaya patthharone’
‘Mitti mein Sona’
‘Karishma kudrat ka’
‘Satyam Shivam Sundaram’

‘Nadiya Ke Paar’
‘Himalay se ooncha’
‘Prem Parbat’
‘Door gagan ki chhaaon mein’
‘Hariyali aur Raasta’
‘Jaanwar aur Insaan’
‘Jungle ki pukaar’ ‘Safed haathi’
‘Haathi mere saathi’
‘Ham panchhi ek daal ke’
‘Mamta ki chhaaon mein’
‘Phool khile hain gulshan gulshan’

‘Naya Daur’
‘Naya Zamaana’
‘‘Duniyadaari’

‘Laalach’ ‘Lootmaar’
B’e reham’ ‘Duniya’
‘Zehreela insaan’
‘Gunde’ ‘Lootere’
‘Insaaniyat ke dushman’
‘Shaitaan Mujrim’
‘Kaalaa dhandaa gorey log’
‘Meetha zehar’ ‘Dhan Daulat’
‘Acid Factory’
‘Chimani Ka Dhuaan’
‘Kohram’

‘Garm Hawaa’
‘Kabhi andhera kabhi ujaala’
‘Shor’ ‘Mausam’
‘Bin baadal barsaat’
‘Aag ka dariyaa’
‘Kaalaa samundar’
‘Pighalta Aasmaan’
‘Sehra’ ‘Pyaasi Nadi’
‘Zalzalaa’
‘Bawandar’
‘Aandhi aur toofan’
‘Kaala paani’
‘Ram teri ganga maili’

‘Do beegha zameen’
‘Dharti Maata’
‘Kisaan’ ‘Armaan’
‘Ek mutthi aasmaan’
‘Astitva’
‘Toote khilaune’
‘Pagdandi’
‘Swarg Se Sundar’
‘Ye Gulistaan Hamara’

‘Tere Dwaar Khade Bhagwaan’
‘Dharti Kahe Pukaar Ke’
‘Samaaj ko badal daalo’
‘Mujhe jeene do’
‘Jiyo aur jeene do’

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( In Devnagri Script)

‘नीला आसमान’ ‘धरती’ ‘सागर’
‘बादल और बिजली’
‘सांझ और सवेरा’
‘धुंध’
‘धुप छाँव’
‘रात और दिन’
‘गीत गाया पत्थरोने’
‘मिटटी में सोना’
‘करिश्मा कुदरत का’
‘सत्यम शिवम सुन्दरम’

‘नदिया के पार’
‘हिमालय से ऊंचा’
‘प्रेम परबत’
‘दूर गगन कि छाँव में’
‘हरियाली और रास्ता’
‘जानवर और इंसान’
‘जंगल कि पुकार’ ‘सफ़ेद हाथी’
‘हाथी मेरे साथी’
‘हम पंछी एक ड़ाल के’
‘ममता कि छाँव में’
‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’

‘नया दौर’
‘नया ज़माना’
‘दुनियादारी’

‘लालच’ ‘लूटमार’
‘बे-रहम’’दुनिया’
‘ज़हरिला इंसान’
‘गुंडे’ ‘लूटेरे’
‘इंसानियत के दुश्मन’
‘शैतान मुजरिम’
‘काला धंदा गोरे लोग’
‘मीठा जेहर’ ‘धन दौलत’
‘एसिड फैक्ट्री’
‘चिमनी का धुंआ’
‘कोहराम’

‘गर्म हवा’
‘कभी अँधेरा कभी उजाला’
‘शोर’ ‘मौसम’
‘बिन बादल बरसात’
‘आग का दरिया’
‘काला समुन्दर’
‘पिघलता आसमान’
‘सेहरा’ ‘प्यासी नदी’
‘ज़लज़ला’
‘बवंडर’
‘आंधी और तूफ़ान’
‘काला पानी’
‘राम तेरी गंगा मैली’

‘दो बीघा ज़मीन’
‘धरती माता’
‘किसान’ ‘अरमान’
‘एक मुट्ठी आसमान’
‘अस्तित्व’
‘टूटे खिलौने’
‘पगडण्डी’
‘स्वर्ग से सुन्दर’
‘ये गुलिस्तान हमारा’

‘तेरे द्वार खड़े भगवान’
‘धरती कहे पुकार के’
‘समाज को बदल डालो’
‘मुझे जीने दो’
‘जीयो और जीने दो’

(OUR EARTH – OUR FUTURE, LET US SAVE IT)

जनसंख्या विस्फोट

आज विश्व पर्यावरण दिवस पर जन्मे समाजशिल्पी को ढेर सारी शुभकामनायें…
पर्यावरण प्रदुषण और उससे जुडी सारी समस्याओं का मुख्य कारण जनसँख्यामें हुई वृद्धि है. आज हमने अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए भौतिक सुविधा के साधन जुटा रखे है. पर इसमें हमने प्रकृति के नैसर्गिक तंत्र को खतरा पहुँचाया है. मनुष्य की आबादी बढ़ने के साथ साथ प्राकृतिक संसाधनों की कमी बढती जा रही है. आज हम प्रकृति के कितने करीब है ये याद दिलाने के लिए कुछ प्रश्न लिखे है:

 

कब यह सब महसूस किया था साथी जीवन में तुमने?
प्यार प्रकृति का पाकर कब जीवन धन्य किया तुमने?

सुबह सवेरे मुर्गे की कब बांग सुनी थी? बचपन में?
चहकती चिड़िया को सुनकर कब महक उठे थे मधुबन में?
बना ही रहता बड़ी देर तक मुह में कड़वापन सारा,
ऐसे बता कब होंठ तले दातुन दबाया था तुमने?

तृप्त हुआ कब चक्की के आटे की वह रोटी खाकर?
या फिर घर के पिछवाड़े की ताज़ी सब्जियाँ बनवाकर?
आज जो कुछ खाया उसको बोते, उगते, बढते देखा?
या फसलों को काटके ले जाते कब देखा था तुमने?

कब देखा था आसमान उस रात निराला – तारों भरा?
या देखा ढलते सूरज को? लहलहाता घास हरा?
चाँद चौदवीं का वह देख के साथ लिए और पहला प्यार
पार चलें इस दुनिया के कब ऐसा सोचा था तुमने?

छैल छबीले यारों के संग उड़ता होली का वह रंग,
या हो दीवाली की खुशियों में जब पुरे परिवारका संग,
कभी अष्टमी, ईद कभी तो, सारे मनाये मिलजुल कर,
कौन सा धर्म है, क्या है जाति, कब ऐसा पूछा तुमने?

आज प्रदुषण फैलाता है, और शांति का भंग करे,
औद्योगिक कचरे फैलाकर, वनसंपति का नाश करे,
और अस्तित्व के संघर्ष में तु नैतिकता को भूल चूका,
जनसंख्या विस्फोट का क्या होगा अंजाम सोचा तुमने?

 

आज पर्यावरण दिन पर इस जनविस्फोट के प्रदुषण की भौतिक सुविधाओं को तुष्ट के बजाए आबादी को नियंत्रित करने का संकल्प करें और आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण की छाया का सुख प्रदान करें.

From ‘Secular’ with Love

Dear World Encyclopedia,

Most painfully I would like to request you to ‘ban’ my use by ‘all Politicians’ in India with immediate effect.

This is the only country where my true meaning and dignity have been reduced to a ‘mockery’ the Politicians in India.

‘Secularism’ in India means ‘equal treatment of all religions by the State’.

However in real practice people are using it for their own political benefit mostly, and to divide and rule the common man in this country.
Vested interests are misleading uneducated, poor and helpless people to satisfy their own political ambitions.
These vested political interests do not want development in their country and fear that if people get educated and developed, they will not be able to divide them over communal and religious lines.
These vested interests and power hungry groups have reduced me to a ‘controversial topic’. For years now I am feeling hurt and tortured in this country. The suffocation has become unbearable for me now.

I feel very proud, when years ago, in 1976 I was included in the ‘Preamble’ of the ‘Constitution of India’ by the 42nd amendment in the constitution.

But sad to say that, thereafter, I have been misused largely by the ‘Politicians’ there, though People of this country have maintained the spirit and have always make me proud.

For the young people of India I would request them to give me a understanding at Secularism in India.

People can learn more about me at Secularism

Those who wish to understand me better can visit Secular – Definition at Free dictionary

I know that the young generation in India is eager to understand my meaning in Hindi also. Here it is at Hinkhoj.

Thanking you,

Yours faithfully,

भारत नमो नमः !

जब कहीं ‘नयी सड़क’ बनती है,
मुझे ‘गतिशील भारत’ नज़र आता है,
जब कही ‘नया पूल’ बनता हैं
मुझे ‘अवरोध मुक्त जीवन’ कि
आशा बंधने लगती है,
जल-भराव होने वाली जगहों पर
जब नए नए ‘काज-वे’ बनते है,
मुझे बाढ़ में फंसे हुए मुसाफिर को
राहत मिलती दिखती है,
इस देश का विकास मेरा ‘जीवन-यज्ञ’ बन गया है,

जब कहीं नया उद्द्योग आकार लेता हैं,
मुझे ‘बेकारी’ की समस्या कुछ कम होने कि खुशी होती ,
जब नयी कोई परियोजना ‘मंजूर’ होती हैं ,
तो मुझे विकास कि तरफ ‘दौडता हुआ ‘भारत’ नजर आता है,
लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से मुझे सुख की अनुभूति होती है,
मुझे नव निर्माण से नयी ‘प्रेरणा’ मिलती है,
मुझे उद्योग्शील समाज से नव ‘चेतना’ मिलती है,
इस देश के संसाधनों में मेरी श्रद्धा है,

अंतरिक्ष में जब भारत नयी नयी खोज करता है,
और नए नए मक़ाम हासिल करता है,
मुझे सारा आकाश तिरंगा नज़र आता है,
बादलों के पार लगता है तिरंगा लहरा रहा हो जैसे,
गूँज रहा है नाद ‘जय हिंद’ का चारों ओर ,
मिट्टी के कण कण से उठ रही हैं ‘सुनामी’ समृद्धि की,
देश की समर्थता में मुझे विश्वास हैं,
चहूँ-ओर मुझे भारत कि पताका लहराती नजर आती है

विकास मेरे दिल कि धडकन बन गया है,
प्रगति मेरी सांस में बस गयी है,
गुजरात मेरी शिराओं में दौडता है,
और शक्तिशाली भारत मुझे दौडाता हैं,
मैं हिंदुस्तान को जीता हूँ,
मैं उठता हूँ तो इस देश की मिटटी की ताकत के साथ,
और सोता हूँ तो लेकर सपने -
समृध्दशाली, सुखी और प्रगतिशील भारत के,
सद्भावना मेरी पहचान बन गयी है,
इस देश की आन मेरी ‘जान’ बन गयी हैं,

देश के पर्यावरण कि रक्षा,
कर्त्तव्य मेरा प्रथम है,
प्रकृति में मौजूद ईश्वरीय शक्ति को
मेरा बार बार नमन है,
मुझे उत्तुंग पर्वत शिखर और अथाह सागर में
कई जन्म जीने का अनुभव होता है,
और जब नर्मदा का जल कच्छ में आता हैं
मुझे ‘भागीरथ-प्रयास’ का अर्थ समझ में आने लगता हैं,
जहां भी कोई अच्छी बात होती है
या सकारात्मकता आकार लेती है
मुझे जीवन का मर्म समझ आता है
‘मेरा जीवन’ अब ‘भारत’ है,
‘भारत’ ही अब ‘मेरा जीवन’ है !!!

(यह कविता श्री.नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी से प्रेरित है, और उनके व्यक्तितत्व, उनके विचार और उनके कार्य को समर्पित है)

नमो भारतः !!

इसमें कोई शक नहीं रह गया हैं के देश में परिवर्तन कि लहर चल रही है. और पिछले कुछ वर्षों में उत्पन्न हुई ‘राजनितिक’ शून्यता’ और ‘वैचारिक दिवालियेपन’ से देश बाहर भी निकलना चाहता है.
इसकी शुरुवात सही मायनों में अन्ना के आंदोलन से हुई थी. और देश में एक नयी उमंग का एहसास भी हुआ था. अभी हाल के चुनावो में मतदान प्रतिशत में हुई वृद्धि कों भी हम एक अच्छा संकेत मान सकते हैं कि राष्ट्र एक नव-निर्माण कि ओर अग्रेसर होना चाहता है.

‘राष्ट्र निर्माण’ या कहिये कि ‘राष्ट्र का नव-निर्माण’ करने के साथ ही हमें ‘राष्ट्र’ कों एक ‘जीवंत-शील’ राष्ट्र बनाना है. एक नयी ‘उर्जा’ निर्माण करनी है, जिससे लगे कि पूरा देश एक ‘आत्मा’ है एक ‘अद्बुत शक्ति’ है.
इसके लिए प्रशासनिक ‘इच्छाशक्ति’ कि तो ज़रूरत हैं ही, सामान्य जनता का भी कर्तव्य बन जाता है कि वो देश कि प्रगति और समृद्धि में अपना योगदान पूर्ण समर्पण के साथ करें.
लोगों कों ये भी मान लेना चाहिए कि सब कुछ ‘सरकार’ के भरोसे ठीक नहीं हो सकता, फिर चाहे ‘प्रधानमन्त्री’ कोई भी क्यों न हो. आम जनता कों अपने कर्तव्यों कों भली भाँती समझना होगा और उसे निभाना भी होगा.
वर्षों से हमें ये सुनने कि आदत हो चुकी हैं कि ‘अपने बाप का क्या जाता है’, ‘मजबूरी का नाम..’, ‘सब चलता है..’.
इसलिए हमारे लिए जो कुछ अच्छा या बुरा होता हैं हम उसको ‘सरकार’ का किया कराया मान लेते हैं. सार्वजनिक जीवन में ‘संवेदनहीनता’ जो पराकाष्ठा कि हद पार चुकी है वो इसी का नतीजा है. दिन ब दिन हम एक दूसरे के प्रति और राष्ट्र हितों के प्रति असंवेदनशील बनते गए और बढते गए.
लेकिन अब नए सिरे से शुरुवात करने कि ज़रूरत है. और एक संवेदनशील, जिम्मेवार, राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब हम ‘चरित्र निर्माण’ से शुरू करें और अपना सामाजिक दायित्व निभाएं, देश के प्रति अपना ‘स्वामित्व’ समझे.
लेकिन हमारी प्रशासनिक कार्य प्रणाली इस तरह कि बन गयी हैं जब तक कोई ऊपर से आदेश न दे तो ‘बाबु’ लोग मानते नहीं है.
और ऐसे नेता भी नहीं रहे जो लोगों कों इतनी छोटी छोटी –मगर बेशकीमती बातें सिखाएँ और उनका मार्गदर्शन करें.
लेकिन मैं आपके सामने कुछ प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जो आप पढ़िए और खुद ही इस नेता के बारे में अपना मन बनाईये और उनके बताए हुए नक़्शे कदम पर ज़रूर चलिए और राष्ट्र कि प्रगति में उनका साथ दीजिए.
आपने बड़े बड़े नेताओं के मुंह से बड़ी बड़ी बातें तो ढेर सारी सुनी होगी, लेकिन अब सुनिए के कैसे ‘चरित्र निर्माण’ से (जिसकी हमें सख्त ज़रूरत हैं ) ‘राष्ट्र निर्माण’ होता है;
(ये श्री नरेन्द्र मोदी जी के सन २००८ में कांकरिया तलाव के उद्घाटन समारोह में दिए गए भाषण के कुछ अंश है, इसके तीन भाग है जो यु टूब पर उपलब्ध है और जिसकी ‘लिंक’ यहाँ पर दी गयी है. जिन्हें जीवन में कुछ कर गुज़रना है और जो अपने ‘उच्चतम ध्येय कों हासिल करना चाहते वो इससे ‘सीख’ ज़रुर ले सकते है. मैनेजमेंट’ कि भाषा में कहूँ तो इसमें ‘मोटिवेशन’, ‘इंस्पीरेशन’, ‘ओवनरशिप’ और ‘सेल्फ – अक्चुव्लैजेशन’ के पाठ आप ले सकते हैं)

इन तीन भागों में जो भाग-२ हैं उसके कुछ अंश मैं अनुवाद करके (चूँकि यह भाषण गुजराती में हैं) इस लेख में जोड़ दूं उससे पहले कुछ बातों का सारांश यहाँ दिया गया हैं जो मेरे ख़याल से महत्वपूर्ण हैं .

Namo at Kankaria festival -Ahmedabad 2008 – PART – 2/3

(Bharat jodo, Ownership, ગુજરાત ગૌરવ, Make cleanliness a habbit, Vote bank politics,
Politics of development Preserve the trees, Preserve this Kankaria, Do we need Security to even preserve our Gardens and Places of Public Interest?)

(Start from 04:28 in the YT link)

भाइयों और बहनों, यह कांकरिया तलाव अपना है. यह अहमदाबाद मुनिसिपल कॉरपोरशन का नहीं. यह केवल भारतीय जनता पार्टी का नहीं, यह कांग्रेस पार्टी का भी नहीं. यह कर्णावती समग्र जनता कि है. इन सबकी मालिक जनता जनार्दन हैं. और जिसकी मालिक खुद जनता हो, हम खुद हो, तो इसको कोई खराब करें क्या हम वो बर्दाश्त कर सकते है. कोई यहाँ के संसाधनों को तोडें, जनता कि संपत्ति का नुक्सान करें, क्या हम उसे बर्दाश्त कर सकते हैं. इन सबके प्रति एक जिम्मेवारी हम सबकी हैं और ऐसा वातावरण निर्माण करने कि जिम्मेदारी भी हमारी हैं. उसकी रक्षा भी जनता को करनी चाहिए. और कोई इसे नुक्सान पहुँचाने कि हिमाकत करता हैं तो उसे रोकने के लिए भी हमें ही आगे बढ़ना चाहिए. यहाँ किसी पार्टी या किसी दल का कोई सवाल नहीं हैं. यह राष्ट्र कि संपत्ति है. यह भूमि हमारी हैं. इसकी रक्षा करना, इसका रख रखाव करना और स्वच्छता बनाए रखना हम सब का फ़र्ज़ हैं.
- जहां तक मुझे याद पड़ता हैं, शायद ही किसी नेता ने ऐसी चीज़ें कभी अपने भाषण में कही होंगी. अगर पिछले ४० वर्षों में भी किसी नेता ने ऐसी बातें कहीं हो तो जानकार और वरिष्ठ इस लेख में जोड़ सकते हैं और इसी प्रकार से किसी ने समाज प्रबोधन किया हो तो हम जनता के सामने ला सकते हैं.

Links for Part-1 and Part -3 (and the ‘highlighted’ points as I find out in them)

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 1/3

(Continual improvement, keep moving, remove the obstacles, pollution,
Environment, Awakened citizens, cleanliness, plastics, polythene, civic sense, above party level, Living standards, Standard of living

Namo at Kankaria festival 2008- PART – 3/3

(Nirmal Gujarat)

१२५ साल पुरानी पार्टी

(A party that would have been ‘different’)

अप्रैल ७ से लेकर मई १२ तक चले मतदान के पूरा होते ही सबको चुनावों के नतीजों का इंतज़ार है.
१६ मई कों चुनावों के नतीजों के आने के साथ ही देश में नयी सरकार के गठन कि प्रक्रिया शुरू हो जायेगी.
आम आदमी (मतलब हम सब = जनता) यही उम्मीद करता है कि जो पार्टी जीतें वो पूर्ण बहुमत से जीते और जो सरकार बने या जिसकी भी सरकार बने वो एक स्थायी सरकार हो और पांच साल वह सरकार जनता कि भलाई के लिए और जनता के कल्याण के लिए काम करे.
देश कों एक नयी प्रेरणा दे. देश कों एक नयी दिशा दे. देश कों एकात्म करें !!
देश में विकास का और भाईचारे का, चैन और अमन का वातावरण निर्माण करे.
देश में चली आ रही सड़ी गली राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें और कानून का राज्य स्थापित करने में मदद करें.

२०१४ के चुनावोंके लिए मतदान शुरू होने से पहले तक सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी अपना ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ होने का राग अलापती रही. और सबसे पुरानी पार्टी होने कि दुहाई देती रही. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इस बात कों उन्होंने ज्यादा तव्वजो नहीं दी या इस मुद्दे कों ज्यादा उछाला नहीं. पता नहीं क्यों?
लेकिन जब जब कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब चुनाव से पहले हर बार, अपनी खास लच्छेदार भाषा में इस बात का उल्लेख करते रहते तो मुझे बहुत पीड़ा होती थी और अब भी होती है, क्यों कि कांग्रेस १२५ साल पुरानी पार्टी होने के बावजूद भी जनता कि नब्ज़ नहीं पकड़ पायी. शासन कों प्रभावशाली बनाए रखने के लिए नए नए तरीके नहीं ढूँढ पायी.
देश में एक नव-चेतना का वातावरण निर्माण नहीं कर पायी. बल्कि लोग दिन ब दिन उदासीनता कि खायी में धंसते चले गए और ‘सरकार’ से – शासन प्रणाली से- यहाँ तक कि लोकतंत्र कि सभी ‘संस्थाओं से – उनका ‘मोह-भंग’ होता गया.

एक ऐसी पार्टी जो अपने आप कों बार बार ‘१२५ साल पुरानी पार्टी’ बता रही हो और जो करीब ६० साल तक देश में सत्ता के केंद्र में रही हो वो चाहती तो बहुत कुछ कर सकती थी.
उनके पास लीक से हटकर काम करने का पूरा मौका था. जरुरत थी तो सत्ता कि लालसा कों त्यागकर, तुष्टिकरण और जात पात कि राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में कार्य करने की. कांग्रेस ने हमेशा अपने आप कों सबसे ज्यादा ‘सेकुलर’ बताने कि कोशिश कि, और असल में कांग्रेस ने ही हमेशा कभी धर्म के नाम पर, कभी जाती के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम पर लोगों कों बांटने कि राजनीति की.
कांग्रेस ने ‘सेकुलरिस्म’ जैसे शब्द कि भी ‘गरिमा’ घटा दी.

कांग्रेस चाहती तो ‘जातिगत’ आरक्षण कों खत्म कर ‘आर्थिक’ आधार पर आरक्षण कों लागू कर सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो धरा ३७० कों भी कबका खत्म कर सकती थी.
कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाकर दोषियों कों सज़ा दिलवा सकती थी.
कांग्रेस चाहती तो अन्ना हजारे के आंदोलन के समय कई महत्वपूर्ण निर्णय लेकर देश में ‘परिवर्तन’ कि शुरुवात कर सकती थी.
कांग्रेस १६ दिसम्बर के दोषियों कों (नाबालिग आरोपी सहित) तत्काल फांसी दिलाकर देश में एक नया सन्देश दे सकती थी.
गुनाहगारों कों पनाह देना भी कांग्रेस राज कि एक बहोत बड़ी खासियत रही है . कांग्रेस के राज़ में हमेशा एक ‘लोला-पोला’ सरकार का आभास रहा है (खास कर पिछले दस वर्षों में )

एक ऐसी पार्टी जिसने ६५ साल तक ‘सत्ता’ का ‘ज़हर’ पीया हो, वह तो ‘नीलकंठ’ बन ही चुकी होगी, तो फिर उसे तो हर बदलती परिस्थिति के अनुसार रूप बदलकर खुले दिल से, इस देश के ‘राज-पटल’ पर ‘तांडव’ करना चाहिए था !

लेकिन सत्ता में बने रहने कि चाह और ‘गठबंधन’ कि ‘मजबूरियों’ ने उसे ऐसा करने नहीं दिया.
अन्ना हजारे का अनशन, १६ दिसम्बर कि दिल्ली बलात्कार कि घटना के बाद का जनाक्रोश, नित नए घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले, सीमा पर कुर्बान होते सिपाही, पडोसी देश कि हिमाकत, चीन का देश कि सीमा के अंदर घुस जाना, नक्सली हमले, महंगाई, और बिगड़ती ‘कानून’ व्यवस्था के भी अनगिनत मौके – जिन मौकों पर सरकार आगे बढ़कर अगुवाई कर सकती थी, ये १२५ साल पुरानी पार्टी कि सरकार ‘मौन’ धारण कर बैठी रही. और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि लग रहा था जैसे इस देश में सरकार नाम कि कोई चीज़ बची ही न हो.
यहाँ ज़रूरत थी एक नयी सोच की. घिसे-पिटे तरीकों से हट कर नए तौर-तरीके आजमाने की.

और सबसे बड़ा काम कांग्रेस कर सकती थी वो ये कि देश कि जनता कों एक सूत्र में बांधने का, एक जज्बा पैदा करने का. विकास का सपना दिखाने का, नौजवानों कों एक नयी राह पर चलने और कुछ करने का आह्वान कर उनमे जोश पैदा करने का. राष्ट्र कि आत्मा में एक नयी चेतना फूंकने का.
वह लोगों में इस देश के प्रति अपने ‘अधिकारों’और अपने ‘स्वामित्व’ कि भावना को जगा सकती थी. साथ ही ‘राष्ट्र’ के प्रति अपने ‘कर्तव्यों’ का आभास भी करा सकती थी.
लेकिन ‘कुछ कर गुजरने कि इच्छाशक्ति’ कांग्रेस में रही ही नहीं.
यह १२५ साल पुरानी पार्टी अपने ही अहंकार में डूब कर रह गयी. और जनता कों अपने पैरों कि ‘जूती’ समझकर जनता से नाता तोड़ लिया, जनता से जैसे इसे कोई सरोकार रहा ही नहीं.
यह बात शत प्रतिशत सही है कि अपने अहंकार में डूबी कांग्रेस पार्टी एक ‘वैचारिक दिवालिएपन’ के कगार पर पहुँच चुकी है. और उसे इस स्थिति में पहुंचाने के लिए वास्तविकता कों दरकिनार कर लोगों कों गुमराह करने कि कोशिश करनेवाले, गलत-बयानी करनेवाले और चाटुकारिता कि पराकाष्ठा करनेवाले उसके नेता ही जिम्मेवार है.

पिछले कुछ वर्षों में हमारी ‘संस्कृति’ का जो पतन हुआ, ‘निति-मूल्यों’ का र्हास हुआ, ‘नैतिकता’ ताक पर रखी गयी(याद कीजिये ‘संसद’ में क्या क्या हुआ), यही १२५ साल पुरानी पार्टी ‘मौन’ धारण कर अपने ‘ऐशो-आराम’ में मशगुल रही.इसके नेता, आदतन अपने स्वार्थ-पूर्ति में लगे रहे.

जबकि कांग्रेस चाहती तो युवाओं के ‘चरित्र निर्माण’ के साथ ही ‘राष्ट्र के नव-निर्माण’ का बीड़ा उठा सकती थी. (ऐसा करने कि कोशिश किसी ने की ?, मेरे अगले लेख में ज़रूर पढ़िए)

जो राजनितिक शून्यता पिछले कुछ वर्षों में निर्माण हुयी उसे दूर करने के लिए एक ऐसे नेता कि ज़रूरत थी जो ‘लीडर’ तो हो ही, और ‘फकीर’ भी हो, जिसका अपना जीवन ही ‘फकीरी’ में बीता हो जो खुद सत्ता में हो पर जिसके करीबी उसका नाजायज़ तो छोड़ ही दो जायज़ फायदा भी नहीं उठाना चाहते हो

अच्छा ये भी सोचा जाए के कांग्रेस कुछ फैसले लिक से हट कर कर लेती तो नुकसान क्या होता?
ज्यादा से ज्यादा कुछ साल सत्ता से दूर हो जाते?
फिर कांग्रेस पार्टी के पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था.
पार्टी कि संपत्ति (पार्टी फंड) अपनी प्रमुख विपक्षी पार्टी से तीन गुना ज्यादा है.
सालों से उसके प्रतिनिधि सत्ता का सुख भोग चुके है. तो कुछ वर्ष अगर जनता के बीच में गुजारते तो क्या फर्क पड़ता? इसी बहाने समाज-सेवा कर लेते! लेकिन उनमे कुछ नया करने कि ‘इच्छाशक्ति’ मर चुकी थी.
किसी हाल में वे सत्ता से दूर नहीं रहना चाहते.
‘एक्सिट-पोल’ के अनुमान आने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्षा मैडम सोनिया गाँधी का ये बयान कि ‘हम क्षेत्रीय दलों के संपर्क में है’ का क्या मतलब निकाला जाए?
वही ‘जोड़-तोड़’ फिर से?
या ‘खरीद-फरोक्त’?
क्या आप, अगर सीटें कम मिलती हो तो, एक सशक्त विपक्ष का रोल नहीं अदा कर सकते?
जिन क्षेत्रीय दलों ने ‘राजनीति’ में आ कर देश को इस ‘रसातल’ में पहुँचाया आप फिर उन्ही से संपर्क में हैं, इसका क्या मतलब?