Aah! Those days….. Memories forever

 

(This post is by Jeegar Modi)

Where are those days, the happiness, the joy, the sorrow, the good times and the bad times, they are stored as beautiful memories of our life.
At times it becomes just dark memories as the time passes, where there is lack of light to see them.
Those spark of light that just flashes for a moment and goes back and does not return for a long time. And those moments which don’t return again forever throughout the life time.

It is because of the busy life, people are busy making money and busy looking of temporary happiness which does not create conceit memories of our life. We look out for happiness in bigger things, than looking out for happiness in small little things which is always around us.
To achieve those bigger things of life people go mad with their life forgetting the importance of humanity. It is hard to live in such an environment.
It is also hard to forget those people in our life who have given us beautiful memories to keep it with us safely. Some memories are forgotten after a period of time, but some stay with us forever.
Those forever memories can be recalled during the hard times of life, when life is full of darkness and sorrow. Those peoples may be alive or dead but they are always alive in our memories.

At times we may have bad memories in our life which helps us to understand our difficulties and to change our self accordingly. They teach us what life is, they show us our strengths and weaknesses. They even help us to realize our mistakes and they also help us to correct it.
They transform us to a new being. But not everyone does it in such a way because they don’t make efforts to correct it or they don’t reason it out. Once they do it life takes a turn towards happiness and goodness. They transform you to a good being.
This makes you different from others. Some kill their good memories due to hate rate. But some keep them alive no matter whatever happens.

Memories of our own mistakes make us laugh at our own self, some memories makes us cry due to the previous people who where there whenever we needed them but now they are no more. They just live in our memories and our heart.
Their teachings always flashes when we make a mistake or when we are about to make a mistake, their laughter or smile flashes whenever we are sad or sorrow. We feel their presence whenever we feel lonely. These are memories which keep us alive…

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बाज़ार, व्यापार और गणतंत्र !

हम एक ‘गणतंत्र’ है
हमारा ‘अपना’ एक ‘मंत्र’ है,
हमारी अपनी ‘संस्थाओं’ के प्रति
हमारी ‘बेरूखी’ ‘अनोखी’ है,
इसीलिए देश में जो कुछ होता है
उसमे ‘अपने बाप का क्या जाता है’
‘होने दो जो होता है’
‘कौन किसके लिए रोता हैं’
‘यार सब चलता हैं’…

‘आबादी’ बढती है
‘नए शहर’ ‘पैदा’ होते हैं
‘ज़मीन’ के भाव कुलांचे मारते है
‘कंक्रीट-जंगल’ के दलाल खुश होते है,
‘रंग-बिरंगी’ सपने और
‘खोखली-जगमगाहट’ के ‘काम्प्लेक्स’ में
‘पर्यावरण’ और ‘प्रदुषण’ जैसे मुद्दे
‘फाइलों’ कि तरह गायब हो जाते है,
‘राजनीति’ इसीको ‘विकास’ कहती है

पर ‘कुदरत’ कहाँ
‘भेद’ करती है,
‘आपदा’ आती है
‘शहर’ डूब जाते हैं
‘इंसानियत’ ढूँढने से नहीं मिलती और
‘नीति-मूल्यों’ कि रूहें कांपती है,
‘लाचारी’ कों ‘बाज़ार’ निगलता है
रोते-बिलखते ‘मासूम’ ‘बिसात’ पर है
‘जिंदगी’ दम तोड़ रही है,
‘शेयर-बाजार’ में ‘सूचकांक’ बढ़ रहा है …

नो स्मोकिंग प्लीज़..

This post is by Apeksha and is re-blogged from http://nai-aash.in

जिस बेशर्मी से तुने सिगरेट उठाई,
ऐसा लगा जैसे खुद अपनी चिता जलाई।

तुझे क्या लगा? जो हवा में गया वो धुँआ है?
वो तो तेरी रूह ने टुकडो में ली तेरे जिस्म से बिदाई।

बड़ा सरल सा भविष्य है: फेफड़े का केन्सर!
पहले रोग को लगाने मे, फिर उसे मिटाने मे पूंजी उड़ाई।

ज़रा सोच के देख, अपनी पत्नी को बिधवा,
और बच्चे? उनकी खुशियों मे क्यों आग लगाई?

पर भूली मैं, तुझे खुद अपनी ही पड़ी नहीं है!
तूँ भला क्यों मिटाएगा बूढ़े माँ बाप की तन्हाई?

छोड़ दे सिगरेट और बचा ले अपनी बिखरती दुनिया,
बटोर ले वो जिंदगी जो तुने अब तक गँवाई।

(Link to the original post is http://nai-aash.in/2011/04/20/no-smoking-please/ )

मंथन जारी हैं …

एक महीने का समय गुज़र गया . . . . .

कहने का तात्पर्य यह है कि इस ‘ब्लॉग’ पर पिछला लेख ठीक एक महीने पहले १४ अगस्त को प्रकाशित हुआ था.
ऐसा नहीं है कि इस महीने भर में कोई घटना ऐसी नहीं हुयी जिसने ‘समाज-शिल्पी’ को नहीं छुआ हो या ‘आहत’ न किया हो.
और जिस ब्लॉग का उद्देश्य ही समाज कि ‘नव-रचना’ करने में योगदान देना हो, उसे तो हर रोज ही अपने आस-पास कि घटनाओं के बारे में या जिन मुद्दों ने उसे छुआ हो उसके बारे में टिपण्णी ज़रूर करनी चाहिए.
लेकिन कभी कभी लेखन प्रक्रिया में ऐसे पड़ाव आते हैं जब एक रचना से दूसरी रचना के बीच में कुछ अंतर आ जाता है.
अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल कर प्रकाशित नहीं कर पाने का दुःख तो है ही, मगर जो अच्छी-बुरी घटनाएं इस दौर में हुयी, उसने ‘विचारों’ कि प्रक्रिया को जारी रखा और ‘मंथन’ करने पर समय समय पर मजबूर किया.
इस लेख में हम मुख्य रूप से उन् सभी घटनाओंका जिक्र करेंगे, और आनेवाले लेखों में उन्ही मुद्दों का तार पकड़कर विस्तार से चर्चा करेंगे और नए मुद्दों को भी छुएंगे.

सबसे पहले तो बात हमारी बढती ‘संवेदनहीनता’ कि. दिल्ली में फिर हमारे गिरते मानवीय मूल्य और समाज में ‘गहरी पैठ’ बना चुकी ‘नपुंसकता’ का उदाहरण देखने को मिला जहां एक जख्मी को बीच बाजार में लोगों ने पानी नहीं पिलाया और उस इंसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘बलात्कार’ कि घटनाओं में कोई कमी नहीं आयी और ‘गुंडे-बदमाश’ लगभग हर राज्य में ‘कानून’ कि धज्जियां उड़ाते फिर रहे है.
कुल मिलाकर नयी सरकार को अभी तक तो ‘क़ानून का राज्य’ स्थापित करने में उतनी सफलता नहीं मिली हैं जितनी उम्मीदें जनता को ‘सत्ता परिवर्तन’ के होने बाद इस नयी सरकार से थी.
‘क़ानून व्यवस्था’ के मामले तो लगता है कि जैसे अभी भी ‘युपीए’ का ही शासन चल रहा है.
और तो और जिन अपराधियों कों फांसी कि सज़ा दी जाती है पता नहीं क्यों उनकी फांसी कों बार बार मुल्तवी किया जाता है?

जहाँ प्रधानमंत्री के विदेश दौरों ने हमारे देश कि गरिमा बढ़ाई और यह सन्देश भी जाते दिखा कि हमारा देश भी दूसरे देश से ‘आँख से आँख’ मिलाकर ही चलेगा.
प्रधानमंत्री के जापान दौरे के समय जब ‘स्मार्ट सिटी’ कि बात चली तो नयी आशाएँ जगी, लेकिन जिस रस्ते पर मैं हर रोज सफर करता हूँ उस ‘एन एच – ८ ए एक्सटेंशन’ और एस एच -४६ पर हर रोज बीच सड़क पर बैठा ‘मवेशियों’ का ‘झुंड’ इस बात कि याद दिलाता रहता है कि अभी तो ‘मंजिल’ दूर ही नहीं बहुत बहुत दूर है.
अभी तो राज्य परिवहन कि बस में सफर करते समय जब चालक कों अपनी गाडी बीच सड़क पर बैठे मवेशियों के कारण ‘आडी-तिरछी’ करनी पड़ती है तो लगता है कि देश कि स्थिति भी ऐसी ही है, कहीं बहुत ज्यादा विकास हैं तो कहीं कुछ भी नहीं. और विकास अगर हुआ भी हैं तो उसका समतोल बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ रखा नहीं गया.
तभी तो वड़ोदरा जैसे शहर में लग-भग हर साल बाढ़ आती है और रिहायशी इलाकों में पानी भर जाता है.
सबसे दुखद त्रासदी ‘जम्मू-कश्मीर’ में आयी बाढ़ है, जहाँ का हाल समाचारों में देख-सुनकर कलेजा मुंह कों आता है.
इस त्रासदी से जहाँ हमारी ‘आपदा प्रबंधन प्रणाली’ कि खामियां सामने आयी, वहीँ ‘विकास’ कि दौड में प्रदुषण के खतरे और उसके दुष्परिणामों कों भांपने में हमारी नाकामयाबी का भी पता चलता है.
हर चीज़ पर ‘बाजारीकरण’ के बढते प्रभाव और पैसे कमाने कि होड में भागती दुनिया का सच हमारे सामने आता है.
विकास कि चकाचौंध में हम मानवीय मूल्य और इंसानी जिंदगी के साथ ही सौदा कर बैठे है. और हम लोगों कि जिंदगी इसीलिए हर समय ‘दांव’ पर है.
वर्षों से चली आ रही हमारी सोच के ‘अपने बाप का क्या जाता है’ , ‘सरकार से हमें क्या लेना देना’, ‘सब चलता है’ ने ही हमें आज इस मकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ ‘प्रशासन’ हमारा ‘अपना’ नहीं बन सका और हम ‘जनता’ प्रशासन के लिए केवल वोट देनेवाली मशीन बन कर रह गए.
जम्मू-कश्मीर कि बाढ़ के कुछ समाचारों में हाल ही में कुछ व्यक्ति प्रधानमंत्री श्री.मोदी जी कों कोसते हुए दिखाए गए. क्या यह सही है?
भाई, इतने सालों से जिन लोगो ने तुम्हारे ऊपर ‘राज’ किया है, कुछ उनसे भी तो पूछो. मोदी जी कों आये तो अभी तीन महीने ही हुए है. फिर भी उन्होंने वो किया जो दस सालों में तुम्हारी चुनी हुई सरकार नहीं कर पायी.
और तो और जब घाटी में सारे नियम क़ानून ताक पर रखकर अंधाधुन्द निर्माण हुआ तब आप क्यों तमाशा देखते रहे? आपने क्यों नहीं मुलभुत सुविधाओं के निर्माण के लिए अपने आवाज़ बुलंद कि?
हाँ, एक बात ज़रूर सरकार कों (चुनाव आयोग से सिफारिश कर ) करनी चाहिए थी कि ‘उप-चुनावोंको’ कुछ समय बाद कराया जाता तो अच्छा होता.
इस बीच देश के कई हिस्सों में बदलते ‘मौसम’ का मिजाज़ पता चला और ‘पर्यावरण’ में होते बदलावों का भी एहसास हुआ. कहीं भयंकर गर्मी रही, तो कहीं बाढ़ और कहीं एकदम सूखा.
इससे हम को सबक लेकर अभी से चेतने कि जरूरत हैं.
और जो मैं इससे पहले भी कहता आया हूँ कि ‘हमारे बाप का कुछ गया हो या नहीं’ मगर ‘हमारे बच्चों का और आनेवाली पीढ़ियों’ का बहुत कुछ ‘दांव’ पर है…

इस दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि पहले तो हम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंटे हुए थे, मगर आज ‘ट्विटर’ का भारत अलग है, ‘फेसबुक’ का भारत अलग है, अंग्रेजी और हिंदी समाचार पत्र पढ़ने वालों का अपना भारत है. ‘व्हाट्स-एप’ का भारत इन सबका मिश्रण है और टीवी चेनलों कि प्राथमिकताएं ‘टीआरपी’ और अलग अलग ‘ब्रांडों’ के प्रायोजक है, या फिर ‘क्रिकेट’ है.
‘क्रिकेटरों’ कों हमारे देश में इतना ज्यादा महत्व दिया गया है कि उनके सामने देश पर मर मिटनेवाले शहीदों कों भी इतना सम्मान नहीं दिया जाता.
अपने आप कों ‘न.१’ कहने का दावा करनेवाले समाचार चेनल पर तो क्रिकेट के लिए विशेष समय (आधा घंटा) दिया जाता है. जब देश इतनी समस्याओं से घिरा हो तो क्रिकेट कि बात तो होनी भी नहीं चाहिए, या फिर सभी खेलों कों उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए. क्रिकेट कि हार जीत पर भी न तो ज्यादा हंगामा होना चाहिए और न ही ज्यादा उत्तेजना होनी चाहिए. क्योंकि हर क्रिकेट खेलनेवाले देश का फ़र्ज़ है कि जीत ने के लिए खेलना और खेल का अविभाज्य अंग है ‘हार’ या ‘जीत’ इसीलिए न तो क्रिकेट में एक हार पर दुनिया भर का गम लूटाने कि ज़रूरत है और न ही जीत पर क्रिकेट के खिलाड़ियों कों ज़रूरत से ज्यादा सर पर उठाने कि ज़रूरत है.

और सबसे सुखद रहा दस दिनों तक चला ‘गणेशोत्सव’, ‘बाप्पा’ आते हैं तो अपने साथ कई यादें भी लेकर आते हैं. ‘गणेश उत्सव’ कि वो यादें जो मेरे बचपन से जुडी है. हो सकता है कि आनेवाले दिनों में मैं अपना पहला ‘मराठी’ लेख (जो कि १९८० के बाद आएगा) ‘गणपति-बाप्पा’ कि यादों के साथ ही लिखूं.

हम राष्ट्र के ‘नव-निर्माण’ का संकल्प लें !!!

६८ वें स्वतंत्रता दिवस कि पूर्व संध्या पर देश में रहनेवाले एवं विदेश में रहनेवाले सभी भारतवासियों कों हार्दिक शुभकामनाएं !!

कल हम लोग १५ अगस्त का पावन पर्व – अपना ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मनायेंगें.

आज जो हम खुली फिजां में सांस ले रहे हैं तो जिस बलिदान के कारण हमें यह आज़ादी नसीब हुई हैं, उसे हमें नहीं भूलना चाहिए.
देश कों स्वतंत्र करने के लिए जिन लोगों ने अपना सर्वस्व त्याग दिया, उनके सपनों कों पूरा करके हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजली दे कर अपना कर्तव्य निभा सकते हैं.
देश के इन अमर शहीदों को आज हम याद कर उन्हें नमन करते हैं और उन्हें शत शत नमन करतें हैं !

लेकिन आज हमारे देश की जो हालत हैं उसे देख के इन शहीदों की आत्माओंको जरूर ठेस पहूँचती होगी.
चारों तरफ फैली अराजकता,हर क्षेत्र में फैले भ्रष्ट्राचार, माताओं, बहनों, बच्चों और बूढों पर हो रहे अत्याचार, धर्म और जाती के नाम पर दंगे, अपनी संस्कृति –विरासत कों भूलते लोग, समाज में बढती संवेदनहीनता,राजनीति में जारी ‘नपुंसकता’, शहीदों के नाम पर राजनीति करते ‘स्वार्थी’ तत्व, शहीदों के परिवार वालों का ‘अपमान’ सहता समाज, इत्यादि देखकर वे अत्यंत दुखी होते होंगे.
उनकी आत्मा बेहद शर्मसार भी होती होगी कि लोग स्वतंत्रता के मूल्य कों भूल गए हैं.

हमारी आज कि राजनीति इतनी नपुंसक हो गयी है कि ‘दलगत राजनीति’ से ऊपर उठकर कोई भी पक्ष देश कि आत्मा कों ‘एकात्म’ करना, देश कों एकजुट करना, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य कों जागृत करना जैसे कार्यों कों न तो खुद करतें हैं और न ही ऐसी चीज़ों कों बढ़ावा देतें हैं.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश को आज़ाद करने के लिए स्वतंत्रता सेनानियोंने, शहीदों ने किन किन मुसीबतों का सामना किया एवं क्या क्या यातनाएं सहन की. चाहते तो वो भी आसान राह चुन सकते थे. सोचो कि  वह क्या कर सकते थे ; सुभाष चंद्र बोस, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव,खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजो से माफ़ी मांगकर आराम कि जिंदगी बसर कर सकते थे, उन्हें भी हक था शादी कर अपना घर बसाने का. उनके पास भी माँ-बाप-भाई-बहन सभी तो थे – एक खुशहाल जीवन बिताने के लिए.
देश स्वतंत्र होने के बाद वे बड़ी राजनितिक हस्ती भी बन सकते थें.
स्वतंत्रता संग्राम में अपने कार्यों की बार बार दुहाई देकर राजनितिक कार्यों में हस्तक्षेप कर अपनी मन मानी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने मुश्किल राह चुनी और अपने कर्तव्य को अंजाम दिया.
और याद कीजिये ऐसे अनगिनत देशभक्त जिनका हम नाम भी भूल गए या जिनके बलिदान के बारे में कभी किसी कों पता भी नहीं चला – वो अनाम – वो गुमनाम शहीद – न जाने कितने? ….

अब सोचो हमने क्या किया एवं क्या कर रहे हैं; जगह जगह इन महान नेताओं और शहीदों की मूर्तियां स्थापित कर फिर उन्हें दुर्लक्षित कर दिया.
मूर्तियों के साथ साथ दफना दिया उनके आदर्शों को और भूल गए उनके महान बलिदान को भी.
उनके विचार, उनके उद्देश्य उनकी कार्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा इन सभी को तिलांजलि देकर हम धन्य हो गए.

आज देश में पल रहे भ्रष्ट नेतओंको पदच्युत करने के लिए और राष्ट्र हित में कोई अच्छा कार्य करने के लिए सहमति बनाने में भी हम असमर्थ हो जाते हैं, क्यों ?, क्योंकि अपना हित सर्वोपरि हो गया है.
हमने अपने आस पास इतनी ऊंची ऊंची दीवारें खड़ी कर दी हैं कि हम अपने आप में से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

हमें यह निर्णय कर लेना चाहिए कि हम चाहते क्या हैं ?
किस तरह का हो हमारा समाज?
हमारा राष्ट्र इस बदलते दौर में किस तरह मजबूत होकर उभरें?
या फिर सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा?
देश कों एक नेता कि नहीं एक समाज –सुधारक कि भी ज़रूरत हैं.
जो समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ और वर्षों से चले आ रहे सड़े-गले रीती-रिवाजों के खिलाफ देश कि जनता कों जागृत करें.
भला क्यों बार बार, जब हम अपने देश कों ‘माता’ का दर्ज़ा देते हैं और फिर भी अपनी माताओं बहनों बच्चियों पर होते अत्याचारों कों ‘नपुंसक’ बनकर देखते रहते हैं?
क्यों नहीं हम सब मिलकर ऐसे ‘देश्द्रोहियोंको’ और ‘समाज-कंटकोंको’ उनके अंजाम तक पहुंचाते हैं? क्यों नहीं हम ‘गुनाहगारों’ कों सज़ा दिला पातें है?
क्यों हम बार बार ‘जात’, ‘धर्म’, ‘प्रांत’, या ‘भाषा’ के नाम पर आपस में ही लड़तें रहे?
क्यों हम तय नहीं कर पातें हैं कि ‘जो सत्य है वो सबके लिए एक जैसा हो, जो सही हैं वो सब के लिए सही हो, और जो जायज है वो सबके लिए जायज हों?
इतने विशाल ‘गण-तंत्र’ में क्यों कुछ ‘खास लोग’ अपनी मन-मानी करतें रहें?
क्या वजह हैं कि देश के कुछ हिस्सों में अभी भी ‘सत्ता’ कुछ गिने-चुने लोगों कि ‘बपौती’ बनी हुई हैं, और केवल यही लोग दिन-दुगुनी रात चौगुनी संपत्ति के मालिक बनते जा रहे हैं और भ्रष्टाचार कर, किराए के ‘बाहुबल’ से अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए ‘गरीब’, ‘अशिक्षित’ और भोली-भाली जनता कों बरगला रहें हैं?
क्या आज़ादी के ६८ साल बाद भी हम ये तय नहीं कर पा रहें कि कैसें हम ‘एक-जूट’ होकर, एक-समाज बन कर रहें?
हमें ये चीज़ भी समझ लेनी चाहिए कि हम जितने भी हैं हम सब एक हैं, हमारे बीच किसी भी प्रकार का और कोई भी भेदभाव नहीं है – और न होना चाहिए,  और हमें एकजुट होकर रहने में ही भलाई है. नहीं तो दुश्मन तो ताक में बैठा ही है.
दूसरी बात यह है कि हमारी खुशहाल जिंदगी और हमारा भविष्य, हमारी आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य हमारे ही हाथ में है. इसीलिए जो भी ‘गलत’ है उसके खिलाफ हम सब एक होकर लडें – फिर दुश्मन अंदरूनी हो या बाहर का.

हमें अपने देश कों अपनाना होगा, इससे प्यार करना होगा. यह केवल किताबी बातें करने का समय नहीं है. दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही रही और हम जो सदियों से अपने ‘महान’ होने का ढिंढोरा पीटकर अपने आप में ही ‘बे-वजह’ ‘खुश’ होतें हैं गर्त में जा रहे हैं.

हम अंदर ही अंदर खोंखले होते जा रहे हैं. हमारा समाज एक बेहद खोखला समाज बन गया हैं. जिसे जब चाहे तब कोई भी ताकत आसानी से नष्ट कर सकती हैं.
हम सबको मिलकर जो ‘गलत’ हो रहा है उसे रोकना होगा.इसके लिए हमें ‘जात-पात’,’धर्म’,’भाषा’, ‘प्रांत’ या ‘दल’ से ऊपर उठकर सोचना होगा.

हमारा ध्येय भारत कों एक सुखी, समृद्धशाली, शक्तिशाली, सुरक्षित, सौजन्यशील, शांतिप्रिय, विकासशील,प्रगतिशील, मानवता, भाई-चारा और संवेदनशीलता कों नयी ऊंचाई पर ले जानेवाला देश बनाना का होना चाहिए. यही हमारा धर्म और यही हमारा कर्म होना चाहिए.

पिछले कई वर्षों से समाज में ‘अनुशासनहीनता’ बढ़ी है, ‘लचर-पचर’ कानून व्यवस्था हावी रही है, और जो सरकारें आयी उनकी ‘लोला-पोला’ कार्यशैली ने राष्ट्र कि आत्मा कों कमज़ोर बनाने का कार्य किया.
अब लगता हैं कि एक मजबूत सरकार केंद्र में स्थापित हुई हैं (शायद ये कहना जल्दबाजी भी हो सकती हैं ), लेकिन जनता कि भागीदारी के बिना ये सरकार भी कुछ नहीं कर पाएगी, इसीलिए हर भारतवासी कों राष्ट्र के ‘पुनः निर्माण’ में अपना योगदान देना ज़रूरी है. और सब मिलकर एकजुट होकर राष्ट्र में एक नयी चेतना – एक नयी ऊर्जा का निर्माण करने का संकल्प करना चाहिए. अगर ये अब नहीं हो पाया तो फिर कभी नहीं हो पायेगा.
हम सब राष्ट्र के नव-निर्माण का संकल्प लें !!!

एक जूनून – एक जज़्बे कि तलाश में हैं देश!

देश कल ६८ वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है !
हम सब के लिए एक पावन दिन और उत्सव मनाने का दिन.
साथ ही साथ इन ६८ वर्षों में हमने क्या पाया इसका मंथन भी इस दिन हमें कर लेना चाहिए. देश कों मजबूत बनाने के लिए हमने क्या रास्ता अपनाया और विविधता में एकता साधने के प्रयास में हम कितने सफल हुए इसका भी आकलन करना चाहिए.
अपने समाज कों एकात्म बनाने के लिए हमने क्या प्रयास किये और आगे भी इसे बरकरार रखें के लिए, इसमें एक नया जोश और एक नयी उमंग भरने के लिए हम सबको साथ मिलकर काम करने कि ज़रूरत अब पहले ज्यादा है. क्योंकि देश के दुश्मन फिराक में है कि कब इसको तबाह किया जाए. इसमें देश कों अंदर से खोखला करनेवाले अपराधी-असामाजिक तत्व भी देश के दुश्मन ही है.
ऐसे में १२० करोड कि जनता महज़ एक भीड़ के रूप में नज़र आये ये हम लोगों के लिए सबसे बड़ी शर्म कि बात है.

हमारे देश में भीड़ कि कोई कमी नहीं है. चारों तरफ, जिधर देखो, भीड़ ही भीड़ है.
कुछ दिन पहले, भीड़ द्वारा एक चोर कों पिट-पिट कर मार देने कि घटना हुई. हमारे देश में समय समय पर ऐसी घटना होती रहती है और खबरें आती रहती है.
भीड़ चाहे तो कुछ भी कर सकती है. हमारे देश में जैसे लोक तंत्र या प्रजा तंत्र, ‘घूस-तंत्र’, ‘परिवार-वादी-सत्ता-तंत्र’ या और भी कई ‘यन्त्र-तंत्र’ काम करते हैं, उसी प्रकार से ‘भीड़ तंत्र’ की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका समय समय पर सामने आती है, और भीड़ अपनी तरीके से कई मामलों में फैसले करती रहती हैं.
लेकिन ज्यादातर गंभीर मामलों में या समाज से सरोकार रखने वाले मामलों में भीड़ खामोश रहती है और जब-जब हमें लगता है कि अब तो ‘जनता ‘ जरूरू कुछ करेगी या एक ‘जन-सैलाब’ जैसे उमड़ेगा या फिर वह निर्णायक घडी अब आ गयी है – अब ‘क्रांति’ होनेवाली है, तब-तब ऐसा नही होता है, और मेरे वतन कि १२० करोड की भीड़ का तब पता ही नही चलता है, तब उसके ‘अस्तित्व’ का एहसास ही नहीं होता है. यह एक बहुत ही गंभीर विषय है और इस पर चर्चा ज़रूरी है. जिन मुद्दों पर हम सबको मिलकर लड़ने कि ज़रूरत है, वो मुद्दे तय होने चाहिए और उनको लागू करने के लिए समाज हित युद्ध स्तर पर काम होना चाहिए.

हमारे देश में भीड़ चाहे तो बहुत ही छोटी से छोटी बात पर ‘इंसान’ की जान तक ले सकती है, पर गंभीर से गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साधे खामोश भी रह सकती है और कभी कभी तो ऐसे भी लगने लगता है कि हमारे शरीर में खून बहता भी है या नहीं?
क्योंकि जब उसे उबलना चाहिए या यूँ कहे कि खौलना चाहिए तो वैसा होता नहीं है.

भीड़ चाहे तो मामूली चोरी या छोटे से छोटा जुर्म करनेवाले आदमी को , या ‘बटुआ’ उडाकर भागते हुए चोर को पकड़कर पीट पीट मार सकती है, साईकिल चोर को पकड़कर पिट पिट कर अधमरा तक कर देती है, पर यही भीड़ ‘नाकारा’ और ‘नालायक’ राजनेताओं को कुर्सी से उतार नहीं सकती.
यहाँ तक कि पुलिस भी एक छोटे बदमाश कों तो सड़क पर घुमा घुमा कर पिटती है लेकिन बलात्कारियों कों ‘मुंह’ ढांक कर बहुत ही सुरक्षा के साथ चुपके से ले जाती है, और पीड़ित जनता हाथ पे हाथ रखकर अपनी बर्बादी का तमाशा लाचारी से देखती रहती है.

‘भीड़’ बच्चों पर जुल्म ढाने वालों को भी बक्श देती है. ईमानदार अफसरों को जिन्दा जलानेवालों के खिलाफ, भ्रष्ट अफसरों या नौकरशाहों के खिलाफ भीड़ की आवाज़ दब जाती है.
देश लुटता रहता है तो भीड़ की परछाई भी नज़र नहीं आती.

हमारा देश, हमारा समाज , हमारी संस्कृति पर धब्बा लगाने वाली कई घटनाएं हर रोज होती रहती है, पर भीड़ खामोश रहती है.
जिस देश में देवी की पूजा होती हैं वहीँ हर रोज बलात्कार की कई वारदातें होती है, यहाँ तक कि नारी के टुकड़े टुकड़े कर मार दिया जाता है, उसे सरे बाज़ार नंगा कर घुमाया जाता है, भीड़ खामोश रहती है,
बड़ी बड़ी डकैती होती है, लोगों को गाडियों के निचे कुचला जाता हैं, निरपराध बालकों को बलि चढ़ाया जाता हैं, भीड़ सुस्त रहती है,
इस भीड़ का जोश तो तभी कुलांचे मारता है जब कोई साईकिल चोर पकड़ में आये या फिर कोई कमजोर पकड़ में आये, नहीं तो सरेआम होते जुर्म को देखने वाले तमाशबीन हमारे यहाँ कम नहीं है.

पिछली कई घटनाओंको लीजिए, ऐसे कई उदहारण दिन प्रतिदिन हमारे यहाँ हैं.

‘गैर जरुरी’ और ‘विध्वंसक’ मामलों में भीड़ अपनी भूमिका जरुर निभाती हैं, बजाय इसके कि कोई रचनात्मक कार्यों में या कोई सकारात्मक गतिविधि में ‘मानव-उर्जा’ का उपयोग किया जाये.
जब चुनाव आतें हैं तो भीड़ घरों में सिमट कर रह जाती है, (अभी हाल के चुनावों में ज़रूर मतदान के प्रतिशत में वृद्धि हुई जो एक अच्छा संकेत है, लेकिन अभी भी एक जूनून कि कमी हैं ).

ये जूनून ज़रूरी है. देश में एक सामाजिक क्रान्ति जगाने के लिए ‘जूनून’ बहुत ज़रूरी है.

अभी हाल ही ऑस्ट्रेलिया में हुई एक घटना जिसमे कि रेल और प्लेटफोर्म के बीच फंसे एक व्यक्ति कों सब लोगों ने मिलकर बचाया यह बताने के लिए काफी है कि हम कहाँ हैं ! वहाँ का समाज कितना जिंदादिल हैं और हम कितने मुर्दादिल !
हमारे यहाँ दिल्ली में या फिर लगभग हर जगह मानवीय असंवेदनशीलता कि पराकाष्ठा कि कई घटनाएं है. जिनेह पढकर-सुनकर हमारा सर शर्म से झुक जाता है.

हम आपसी सद्भाव कों भूल गए है. सामाजिक सरोकार से कट चुके है. विकास कों हमने केवल भौतिक सुखों से जोड़ लिया है. संस्कृति, सभ्यता, समाज इन सबसे हमने किनारा कर लिया है, नहीं तो आये दिन बच्चियों पर हो रहे अत्याचारों कों देश यूं मूक-दर्शक बन कर न देखता रहता.
हमें तय करना चाहिए कि किस तरह का समाज, किस स्तर का जीवन हम जीना चाहते हैं.
हमारा जीवन स्तर क्या होना चाहिए, हमारे जीवन जीने का ‘गुणवत्ता स्तर’ क्या हो ?
पिछले दिनों देश हुई कई घटनाओं कों लीजिए और उनके गाम्भीर्य कों घटाती व्यवस्था कों देखेयी, ‘सामाजिक संवेदनहीनता’, ‘ मानवीय संवेदनशीलता’ कों भूलता, और एक ‘निष्क्रिय नपुंसकता’ कि तरफ बढ़ता हमारा देश साफ़ नज़र आएगा.

हमें तय करना चाहिए कि हम हमारी बर्दाश्त करने कि हद कहाँ तक होगी? हम कितना अत्याचार सहते रहेंगे और कब तक राजनेताओं के जाल में फंसकर आपस में लड़ते रहेंगे? नैतिक मूल्यों के प्रति, सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रति हमारे कर्तव्य क्या हैं? कब तक हम घिसे-पिटे तरीके अपनाकर अपने आप कों बर्बादी कि गर्त में ले जाते रहेंगे? कब तक हम नाकारा व्यवस्था कों अपनी मन-मानी करने देते रहेंगे?

कब हम ‘जागरूक’ नागरिक’ अपनी ‘कुम्भकर्णी’ निद्रा से जागेंगे?
कब हम एक ‘तमाशा’ देखनेवाली भीड़ कि जगह एक ‘राष्ट्र’ कहलाने लायक बनेंगे?

सुहाना सफर …. Suhaanaa Safar

This is poem is dedicated to the magical blog – ‘atul’s bollywood song a day – with full lyrics’

Congratulating Atul ji and his team on reaching 10,000 songs on atulsongaday.me and wishing a very happy musical journey ahead …

गाडी आयी गाडी आयी
अतुल जी कि गाडी आयी
सात सुरों का सागर लायी
मन में उमंगें हज़ार लायी

इसका इंजन समय का पहिया
डिब्बे सारे बदलती घड़ियाँ
इन डिब्बों में कई कहानियां
यादों कि कई जिंदगानियाँ

सुख दुःख के खजाने से
गहरी समय कि धारा से
किस्से अनगिनत कलाकारों के
मनोरंजन,त्याग और तपस्या के

तेरे मेरे कितने सपने
बचपन के वो दिन सुहाने
जवानी के वो दिन दीवाने
गाएँ मिलकर जो तराने

अपना स्टेशन आये तो उतरना
देख मुसाफिर भूल न जाना
फिर इस गाडी में आना
प्यार हमारा साथ ले जाना
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Gaadi aayi gaadi aayi
Atul ji ki gaadi aayi
Saat suron ka saagar laayi
Man mein umangen hazaar laayi

Iska Engine samay ka pahiyaa
Dibbe saare badalti ghadiyaan
In dibbon mein kayi kahaaniyaan
Yaadon ki kayi zindagaaniyaan

Sukh dukh ke khazaane se
Gehri samay ki dhaara se
Kisse angeenat kalaakaaron ke
Manoranjan, tyaag aur tapasyaa ke

Tere mere kitne sapne
Bachpan ke wo din suhaane
Jawaani ke wo din deewaane
Gaayen milkar jo takraane

Apna station aaye to utarna
Dekh musaafir bhool na jaana
Phir  is gaadi mein aana
Pyaar hamaara saath le jaana
***

Aaya hai mujhe phir yaad wo zaalim…Songs that bring back memories

He he he he he he
La la la la la la la la la la
Pyaar hua hai jabse

Whenever I listen to this song from ‘Abhilasha-1968’, I am thrilled, I get goose-bumps, its music makes me delighted and it takes back to me where I am kid and playing with an inflatable rainbow color beach ball, which my Father have brought for me…

That is how our mind starts relating memories with.

A strange feeling runs through my heart every time I hear Kishore Kumar’s
he he
he he
ha ha
hmm hmm
hmm hmm
aha ha
ha ha ha
ha
ha ha
hmm hmm
(In the song -kora kaaghaz thha yeh man mera)

Then I just cannot escape this, it stirs my heart
Hmm hmm hmm hmm
hmm hmm hmm hmm
he he he he
ho ho ho ho

(In phoolon ka taaron ka)

And in the same line an altogether different world starts calling me when I tune into these;

ho
he he he
ha ha ha

(From mere sapnon ki raani kab aayegi tu)

Hai haan ..sachchaai chhup nahin sakti, banaawat ke asoolon se …

And this Lata-Kishore’s

o ho ho
ho ho ho
o ho ho
hmm hmm hmm

And just listen to this ‘hmm hmm hmm’ by Kishore Kumar and the pause before Lata takes of to ‘Karwatein badalte rahe’..

For years together this all have been very fascinating and it will be as long as we are there …

***

I believe that all of us, the ‘music lovers’ have our own reasons for being attached to ‘music’.
Some of us definitely have some specific reasons that keep us to be continuously in pursuit of ‘songs’, and some of us have some special memories to cherish with, and cherish those special moments with some sort of ‘musical memories’ attached with.

We always like to mention about the ‘songs that bring back memories’.

We fondly cherish and remember such songs and enjoy them and try to revive those memories.

Trying to find out these special songs, that I hear up while growing, was the main reason that I started to contributing lyrics of the songs that were still to be posted on Atul ji’s blog.
But when I noticed that many songs from my list of ‘Aaya hai mujhe phir yaad wo zaalim’ (title I thought to give to this compilation when I record them, and which now is the tilte for this post also) were still to make on this blog, I became uncomfortable and was eager to see these very special songs on the blog, because ultimately this was a ‘unique’ blog and the songs I mentioned definitely deserved place on the blog – since these were the songs from the very special period of the Hindi cinema – ‘the Seventies’….

In this post I have tried to find out those special songs, that I hear up while growing,.

This post is dedicated to those special songs that have indelible and permanent mark on our mind and have remain evergreen as well as immortal for us.

***
Now talking of the memories, that some songs triggers, we actually do not know how some songs remain constant in our mind and become the part of our life at various stages.

Like, my parents told me that, when I was a child, my uncles and aunts tease me with the song ‘Wo pari kahaan se laaun – ye gangaram ki samajh mein naa aaye’ from the Manoj Kumar starrer ‘Pehchaan’
Given my physique at that time must have provoked them to give me this name ‘Gangaram’.
Then these songs ‘deewaana mujhsa nahin’, ‘baiyaan na dharo’, ‘duniya mein logon ko’, bring this ‘Gramohpone’ and ‘LP’ records to my mind.
Because my Uncle had brought this LP record player then, and these songs were regularly played on them and were favorites (I think so).

And I do not know how this song ‘teri galiyon mein ham aaye, dil armaanon bharaa laaye’ became part of my permanent memory, even though I have not watched this film ‘Minoo’ then and to till date. May be because, it was frequently played on the Radio then.

As far Memories related with the musical programmes on Radio is concerned, one is of the programme – ‘ Fauji bhaaiyon ke liye …’Jaimaala’ ‘ on Vividh Bharati, presented by Dharmendra. I remember this talking about that ‘main ek kisaan ka beta hoon’ and this song ‘apni kahaani chhod ja.. Mausam beeta jaaye’ I listened it first time then was taken over by this song.

Then there was ‘Bianca Geetmala’ the most favorite of film songs’ program of everybody in the family.
Listening the annual programs of ‘Binaca Geetmala’ was also an event which is a part of our beautiful memories.
One memory to share related with this is that on the annual program of 1979 I was given the responsibility to listen and note down the rankings and final results since my parents had to go for their ‘drama rehearsals’. That year ‘dafli waale dafli bajaa’ from ‘Sargam’ topped the charts.

From ‘All India Radio-Urdu Service’ programmes my favorites were ‘bheega bheega pyaar ka samaa bataa de tujhe jaana hai kahaan’, ‘raahi matwaale’ and ‘ham pyaar mein jalnewaalon ko’….

And if you are fortunate enough to have been fallen in love with someone at an early age,  may be a one sided crush and an unexpressed love (‘apun ki zindagi mein bhi ek ‘memsaab’ thi , kya ! aayen!) and if you are separated from this ‘childhood’ love for some reasons , you have plenty of songs in our Hindi films that we can relate to our real life situations and where one can fall and swim in the depth of the ‘poetic beauty’ of the lyrics.

***
Some songs trigger memories, while some real life situations sometimes spontaneously bring some songs to our lips…

‘Naao kaaghaz ki gehra hai paani, zindagi ki yahi hai nishaani,
phir bhi har haal mein muskuraake, duniyaadari padegi nibhaani…’

With the advent of new technologies have opened up a vast treasure for music lovers like us and I can list out the following from my experience of searching songs online; according to me this is how this ‘journey of life through songs’ takes place;

Some songs those get stored in our very early memory,
Some songs that trigger memories when we review the above category songs,
Some songs that are not in our memory but related to that period and hidden in our vague memory,
Songs that strike us on situational, seasonal basis, incident basis, on changing weather conditions, time, and/or our mental and physical condition given at a time.
Some songs are in our permanent memory and they live with us, they grow with us (here growing meaning the understanding of the verses, relating our emotions to it and the physical properties of the song i.e.its tune, its singing, its recording, its picturisation etc etc).
Some songs are that get stored in our sub-conscious memory and some carried over through our conscious day to day life experiences.
Our personal likings for some actors, actresses, stars, of any film personality,
And last but not the least is the ‘nostalgia’ that we all love – and looking for something that have been left back over the years,

***

Seasons and Festivals also trigger some musical memories, like;

During Ganesh festival this song ‘he gajvadan Ganesh ji , meri binti suniyo re’ keeps haunting me, and I searched it for many many years, finally thinking that it must be a NFS, I started searching that way. But later on came to know that this is from the film Pujarin when it was shared on Atul ji’s blog by our beloved Prakash ji.

Every Janmashtami I am automatically reminded of these songs;
Kanhaiyya kanhaiyaa tujhe aana padega (Maalik- 1972)
Shor mach gaya shor dekho aaya makhan chor (Badlaa-1974)
Krishna Krishna bolo Krishna (Naya Din Nayi Raat-1974)
Govind bolo hari gopal bolo (chhup chhup meera roye..- Johny Mera Naam-1970)

Every monsoon I am haunted by these song;
Saawan ka mahina aa gaya ho (Nehle Pe Dehla)
Jhoomta saawan dekho aaya (Do Khilaadi-1976)
Barkha raani zara jam ke barso(Sabak-1973)

Around Diwali festival, I used to get feeling of Diwali vacations that we enjoy during our childhood and these songs start haunting me;
Main na bhoolunga, Ye jo public hain, Ye hai mera premi

May be because I would have get to watch these films during Diwali festivals. Though here in the case of these films the above songs belong to they actually were released at the same time in the month of October, so must be around Diwali time as I could presumed.

Over the years I cannot escape the magic of ‘Sun jaa aa thhandi hawaa’ and ‘Jaadugar tere naina, dil jaayega bach ke kahaan’, ‘tum mile pyaar se mujhe jeena gawaara hua’ and ‘waada karo jaanam, na chhodoge ye daaman’, whenever I listen to it.

With ‘ya garmi yon ki raat jo purvaiyya chale, thhandi safed chaadaron pe jaage der tak’..  I try to find the ‘fursat ke raat dins of our ‘childhood’, in our today’s life wherein we get very less time to unwind ourselves.

And the all time favorite ‘zindagi ke safar mein guzar jaate hain jo makaam’…. Whenever I feel like going back to the memories and places, which I have been and left behind later.

One born in that period of ‘seventies’ cannot forget these quawaalis, which also were the favorites in Orchestra programs;
Jhoom baraabar jhoom sharaabi, Raaz ki baat kehdoon to, ‘chadhta sooraj dheere dheere dhalta hain dhal jaayega’, ‘taarif teri nikli hain dil se’….

And I remember that almost all orchestras then compulsorily have these numbers;

O door ke musaafir hamko bhi saath le le re
Chhotisi umar mein hain lag gaya rog
Kuhu kuhu bole koyaliya
Mora nadaan baalma na jaane dil ki baat
Aap jaisa koyi meri zindagi mein aaye
Ishwar satya hain.. satyam shivam sundaram
Aapke shehar mein aayi hoon shauq se
Dariyaa kinaare ek bunglow ga pori
Mungda mungda main gud ki dalli
Jhoom baraabar jhoom sharaabi

From the mythological I cannot forget ‘manwa re manwa, jeewan hai sangram (Jai Barjrangbali-1976) and ‘yahaan wahaan jahaan tahaan mat puchho kahaan kahaan (Jai Santoshi Maa-1975) and ‘Janam janam ke phere (1957)

***

So when our beloved Atul ji  discussed this in his numerous posts about the ‘best age i.e. 8 to 14 yrs, of which the memories we carry with us,  piqued my interest and I thought to analyze this ‘science’ in my case.
And I would like to share the results here.

For this I decided to list out all the songs that straightway take to the nerves, whenever I get to listen to them, they touched my heart; a strange feeling of going back to those days brings goose bumps to me and left me in state of mind that cannot be expressed in words.

These are the songs which give me an altogether different feeling whenever I listen to them and they remind me of the special memorable time of our life i.e. childhood which will not come back again.

Looking back now it feels like that was a ‘different world’ altogether!

Just have a look at the following list of songs;

Song
Aaya hai mujhe phir yaad wo zaalim – ‘Devar-1966’

Paayal ki jhankaar raste raste-Mere Lal-1966

Phool tumhe bheja hai khat mein-Saraswatichandra-1967

Aayi hain bahaaren mitey zulmo sitam-Ram Aur Shyam-1967

Pankh hote to ud aati re- Sehra-1963

Dheere dheere machal ae dile beqaraar-Anupama-1965

All these songs are from the films that belong to the period before I was born.

I do not know but these songs have captivated my mind since I was a child.

Also, while going through Atul ji’s post on the blog (for those songs already posted from the list) I find it interesting that many of these songs (in my list) are common favorites of both of us.
As Atul ji is elder to me by six years it would be interesting to know – what emotions and feelings he goes through listening the same songs.

The timeline in my case is from 1968 (I was born) to 1982.

I was also interested to find what exactly the results are in my case. And while I started with focusing on the prominent songs that bring back memories, I finished with listing all the songs, to get a better picture.(and later on I might add some more songs to the list, if I find that has been missed now).

The list of my Songs that bring back memories is here.

Out of these songs links for those already posted on Atul ji’s blog are given therein.
And for the balance ones they will be updated whenever these songs are posted on the blog.
Where I have multiple songs from the same film, I have considered only one for this analysis’s purpose. So from the total of 211 songs I have considered 174 only with one each from a film.
Now in many cases even the movies that these songs are from have not been watched by me. And I am trying to get these now like I watched ‘Pehchaan’ in 2007, ‘Abhilaasha’ in 2011 by getting their VCD/DVDs. I don’t know if now VCD/DVD for those movies that failed at the box-office, would be available or not.

This list of songs that I started writing down in 1994 (in my diary and separate notes prepared time to time) was there with me and it was last updated in 1998.

Getting back into it was very enjoyable and interesting.

I have put the total list and links here

And while doing the analysis I find years like 1974, 1976 having more songs that I like, so I have put them separately and spread over the age range in more categories and not covering all of them in one range of 8 to 14 yrs.

Years
Age range    Up to 1967    1968-72    1973-1974    1975-1976    1977-1982    Total
0    12                    12
0-4 yrs        51                51
5-6 yrs            31            31
7-8 yrs                29        29
9-14 yrs                    51    51
12    51    31    29    51    174

The maximum numbers are from 1976-1982 – 68 songs (i.e. 39%), and the highest from a single year are 17 from 1974, 1976 & 1977, then 14 from 1973 and 12 each from 1975, 1971 and 1970 and 11 from 1978, making a total of 112 (from rest years the figure is less than 10).

So, enjoy this list and take a trip down memory lane in your childhood to find out your favorite songs and ‘songs that bring back memories’

***
(You can also enjoy this post with the beautiful song ‘tere mere yaraane ho’ from the 1976 film Naagin here)

उम्मीद

कहते हैं कि ‘उम्मीद’ पे दुनिया कायम हैं,
इसलिए है उम्मीद तुझसे ही मेरी, कि जैसे है,
सृष्टि को नियम से,
नियम को परिश्रम से,
तपिश को ठंडक से,
रेगिस्तान को हरियाली से,
क्षुधा को खुराक की,
तृषा को जल से ,
लहर को किनारेसे,
निराशा को है आशा से,
धरती को सूरज से,
अग्नि को वायु से,
इंसान को इंसानियत से,
आत्मा को परमात्मा से,
और रिश्तों को ‘विश्वास’ की है उम्मीद !
यह रिश्ता टूट न जाये कभी,
बंधी रहे डोर पंचतत्व की इस जीवन से,
चलता रहे कारवां जिंदगी का यूँही,
यही सोचकर,
आज,
फिर ‘उम्मीद’ के ‘बादल’ घिर आये है,
और छायी है ‘घटा’ ‘विश्वास’ की,
लुटा दे हम पर तेरी ‘दया’ का ‘सागर’,
……… बरस जा अब तो !

(This poem was earlier posted on nai-aash.in and somehow it missed here, so re-blogged today with a hope that all these prayers reach to the God and he showers his blessing on us – on all of us)

इक ऋतू आये , इक ऋतू जाए …

मेरे अब तक के जीवन में शायद पहली बार ऐसा हुआ के सूखे कि आशंका से मैं काँप उठा. इससे पहले भी कभी बारिश कम हुई होगी या सूखा या अकाल पड़ा होगा, लेकिन तब भी मैं जिन जिन जगहों रहता पर था वहाँ पर बारिश ज़रूर हुई थी.
यह अलग बात हैं कि बारिश कम हुई होगी, और जब ज़रूरत थी तब नहीं होकर आगे पीछे हुई होगी. लेकिन बारिश होती थी. भयंकर गर्मी और तपिश के बाद बारिश ज़रूर होती थी !
लेकिन इस बार महसूस हो रहा हैं के हालात कितने खराब हैं.
एक दिन पहले बिलकुल ‘साफ़’ आसमान देखकर अचानक मेरा मन घबरा गया. बादलों का कोई नामोनिशान नहीं था. एकदम साफ़ आसमान!
क्या सचमुच बारिश नहीं होगी?

‘प्यासी बंजर धरती
किसका पेट भरे
भूखे प्यासे बच्चे
खेती कौन करे’

और गर्मी तो दिन ब दिन बढती ही जा रही है? कब इस तपिश से हमें राहत मिलेगी?
कब सूखी-बंजर-बिखरती ज़मीन कों बारिश कि बूँदें अपने प्यार से नहला देंगी?
मैं हर रोज ‘टक-टकी’ लगाए आसमान कों देखता रहता हूँ कि बादल आये और ‘उमड़-घुमड़’ कर बरस जाएँ. और हमें कईं मुश्किलों से बचाएं !
हो सकता हैं आज जो कुछ बादल इकठ्ठा हो रहे हैं कल वे बरसेंगे ज़रूर…
और बरसात के बाद जब माहोल खुशनुमा हो जाएगा उसकी अनुभूति कों कौन भूल सकता हैं भला?

वैसे तो समय समय पर मैं अपनी कविताओं में ‘पर्यावरण परिवर्तन’ ( Climate Change ), प्रदुषण के दुष्परिणाम, बढते उद्योग – घटते संसाधन, ऋतू चक्र में परिवर्तन इत्यादि कि बातें करता आया हूँ.
लेकिन उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा. क्योंकि ‘प्रकृति’ अपना ‘समतोल’ बनाए रखती हैं और अभी तक यही एक ऐसा ‘चक्र’ था जिस पर विश्वास बना हुआ हैं और रहेगा.
पर इतना ज़रूर हैं कि अब आबोहवा बदल गयी हैं.

ऐसे में मुझे एक गीत कि ये पंक्तियाँ याद आयी ;

‘तक तक सूखे परबत
आँखें तरस गयीं
बादल तो न बरसे
आँखें बरस गयीं ‘ …
‘बरस बरस दुःख बढ़ता जाए’

***

संयोग से आज ही अपने देश का आम बजट पेश हुआ. टीवी पर जोर शोर से बजट के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं चल रही हैं .
किसको कितना फायदा हुआ यह तो कुछ समय पश्चात ही पता चल पायेगा.
लेकिन देश स्वतंत्र होने के बाद से लेकर अब तक, कितने – मौसम बदले – मतलब कितने बजट पेश हुए. लेकिन क्या बजट में किये गए वादे पुरे हुए?
क्या गरीबों के जीवन में कुछ सुधार हुआ.
क्या बरस दर बरस ‘दुःख’ कम हुआ या बढ़ता ही गया?
हमारी ‘समस्याएं’ कम हुई ?
जिन लोगों ने देश कों आज़ाद होते हुए देखा या जो आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पैदा हुए थे, वे देश के हालात के बारें क्या राय रखते हैं? क्या, जो सपने उन्होंने देखें थे वो पुरे हुए?

क्या सचमुच मौसम बदला?
नसीब बदले?
या फिर …
‘प्यार न सीखा
नफरत करना सीख लिया
सब लोगों ने लड़ना मरना सीख लिया’
और अंत में हमें ये न कहना पड़ जाए कि ,
‘इक बजट आये, इक बजट जाए.. गरीबी मिटे ना ..
हाँ, मिट गए गरीब…’
(यहाँ पर ‘मुश्किलों’ का मतलब हमारी रोज़मर्रा कि समस्याएँ, और ‘रकीब’ हैं = हमारी ‘सिस्टम’या हमारी ‘व्यवस्था’…)

***

खैर आप भी सत्तर के दशक के इस हृदयस्पर्शी गीत का आनंद उठाईये और महसूस कीजिये कि क्या बदला और क्या नहीं.
आदरणीय अतुल जी के ब्लॉग पर इस गीत कि ये कड़ी आपके लिए प्रस्तुत हैं !

इक ऋतू आये

आनंद बक्षी साहब के शब्दों को किशोर कुमार ने बहुत ही दिल से गाया हैं और इसे स्वरबद्ध किया हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’ जी ने !

***